तेल संकट पर श्रीलंका का फार्मूला

अर्से से चले आ रहे मध्य-पूर्व में तनाव, खासकर ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल के संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसका सबसे बड़ा असर उस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, हॉर्मुज जलडमरूमध्य, पर पड़ा है, जहां से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस संकट का सीधा असर एशियाई देशों पर दिखने लगा है, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में श्रीलंका ने एक असाधारण कदम उठाते हुए हर बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया है, ताकि ईंधन की खपत को कम किया जा सके। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश को “सबसे बुरे के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन उम्मीद सबसे अच्छे की करनी चाहिए।” यह बयान न केवल वर्तमान संकट की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि आने वाले समय की अनिश्चितता का भी संकेत देता है। श्रीलंका का यह फैसला अकेला नहीं है। पूरे एशिया में सरकारें ऊर्जा बचाने के लिए सख्त कदम उठा रही हैं। थाईलैंड में लोगों को एयर कंडीशनिंग के उपयोग को कम करने के लिए औपचारिक कपड़ों के बजाय हल्के कपड़े पहनने की सलाह दी जा रही है। वहीं म्यांमार में निजी वाहनों को वैकल्पिक दिनों में चलाने की अनुमति दी गई है।बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए विश्वविद्यालयों में छुट्टियों को पहले ही लागू कर दिया है और पूरे देश में नियोजित बिजली कटौती शुरू कर दी है। दूसरी ओर, फिलीपींस में सरकारी कर्मचारियों के लिए सप्ताह में कम से कम एक दिन वर्क-फ्रॉम-होम अनिवार्य कर दिया गया है। राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने गैर-जरूरी सरकारी यात्राओं पर भी रोक लगा दी है और प्रभावित वर्गों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है।वियतनाम भी इस संकट से निपटने के लिए नागरिकों को सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और कारपूलिंग अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
इन कदमों से स्पष्ट है कि ऊर्जा संकट अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक और जीवनशैली से जुड़ा विषय बन चुका है।श्रीलंका के भीतर भी हालात गंभीर हैं। सरकार ने ‘नेशनल फ्यूल पास’ प्रणाली लागू की है, जिसके तहत ईंधन की खरीद पर सख्त सीमा तय की गई है। हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर आम जनता में असंतोष भी देखा जा रहा है, क्योंकि तय की गई मात्रा कई लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है।तेल की कीमतें भी इस संकट के चलते आसमान छू रही हैं, जो करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी हैं। यह स्थिति केवल वर्तमान की चुनौती नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है कि दुनिया को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और टिकाऊ जीवनशैली की ओर तेजी से बढ़ना होगा। अंततः, यह पूरा घटनाक्रम हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी वर्तमान जीवनशैली इतनी टिकाऊ है कि वह ऐसे वैश्विक संकटों का सामना कर सके? एशियाई देशों के ये कदम भले ही अस्थायी लगें, लेकिन वे एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं, जहां ऊर्जा बचत अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



