लेखक की कलम

ओडिशा में भी भाजपा का करिश्मा

चुनाव संख्या बल से नहीं, तिकड़म से लड़े जाते हैं। गत 16 मार्च को कई राज्यों में राज्य सभा के चुनाव सम्पन्न हुए। बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास पर्याप्त संख्या बल था लेकिन इतना भी नहीं कि वह पांच की पांचों सीटें जीत जाता। इसके साथ ही उसे अपनी कमजोर नसें भी पता थीं। इसके बावजूद मुख्य विपक्षी दल राजद के नेता तेजस्वी यादव को चकमा देते हुए भाजपा ने पांचवी सीट भी जीत ली। इसी प्रकार ओडिशा में भाजपा की सरकार है। राज्य की 147 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 79 विधायक हैं और मुख्य विपक्षी दल बीजू जनता दल (बीजद) के पास भी 51 सीटें हैं। यहां पर तीसरे नम्बर पर कांग्रेस है जिसके पास 14 विधायक हें और सीपीआईएम का भी एक विधायक है। इस प्रकार विपक्ष के पास भी खासा संख्या बल है। यहां राज्य सभा की चार सीटों पर चुनाव होना था। दो सीटें तो भाजपा आसानी से जीत सकती थी लेकिन चैथी सीट पर उसने तिकड़म से जीत हासिल कर ली। बीजद के 8 विधायकों की कथित क्रास वोटिंग ने नतीजों को प्रभावित किया। यहां बीजद के साथ कांग्रेस और सीपीएम ने मिलकर डा. दत्तेश्वर होता को मैदान में उतारा था। यही स्थिति बिहार की रही।
ओडिशा में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया। चार सीटों के लिए हुए चुनाव में बीजेपी समर्थित तीन उम्मीदवार और बीजेडी का एक उम्मीदवार विजयी रहा, जबकि बीजेडी-कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार डॉ. दत्तेश्वर होता को हार का सामना करना पड़ा। सबसे ज्यादा चर्चा निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप राय की जीत को लेकर रही, जिसे बीजेपी का समर्थन प्राप्त था। इस जीत के पीछे बीजेडी विधायकों की कथित क्रॉस-वोटिंग को बड़ा कारण बताया जा रहा है। ओडिशा की चार राज्यसभा सीटों के लिए कुल पांच उम्मीदवार मैदान में थे। परिणाम इस प्रकार रहे-मनमोहन सामल (भाजपा) जीत, सुझीत कुमार (भाजपा) जीत, संत्रुप्ता मिश्रा (बीजद) जीत, दिलीप राय (निर्दलीय, (भाजपा समर्थित) जीत, डॉ. दत्तेश्वर होता (बीजद-कांग्रेस समर्थित) हार।
बीजेडी के डिप्टी चीफ व्हिप प्रताप केशरी देव ने दावा किया कि बीजेडी के आठ विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग करते हुए दिलीप राय के पक्ष में मतदान किया। सूत्रों के मुताबिक छह बीजेडी विधायक और दो निलंबित विधायक दिलीप राय के समर्थन में वोट करते देखे गए। इस क्रॉस-वोटिंग ने चैथी सीट के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया। क्रॉस-वोटिंग के बाद बीजेडी
अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने चुनाव में हॉर्स-ट्रेडिंग और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की भूमिका का आरोप लगाया। पटनायक ने कहा, जिन लोगों ने क्रॉस-वोटिंग की है, उनका आपराधिक रिकॉर्ड है। यहां तक कि उनके माता-पिता भी पहले जेल जा चुके हैं। यह कहने में मुझे शर्म आती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी और उसके सहयोगियों ने विधायकों को अपने पक्ष में करने के लिए कई तरह की कोशिशें कीं। इस चुनाव में बीजेडी के युवा विधायक देवी रंजन त्रिपाठी और सौविक बिस्वाल ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने क्रॉस-वोटिंग की है। दोनों विधायकों के परिवार का नाम पहले हजारों करोड़ रुपये के चिटफंड घोटाले में सामने आ चुका है, जिसमें उनके पिता को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था।
मतदान के दौरान नवीन पटनायक ने चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता का भी आरोप लगाया। उनका कहना था कि एक विधायक को दूसरा बैलेट पेपर जारी किया गया, जो चुनाव नियमों के खिलाफ है।
राज्यसभा की चार सीटों के लिए हुए इस चुनाव में असली मुकाबला दिलीप राय और डॉ. दत्तेश्वर होता के बीच था। बीजेपी ने अपने दो उम्मीदवारों के साथ दिलीप राय को समर्थन दिया था। वहीं, बीजेडी, कांग्रेस और सीपीएम ने मिलकर डॉ. होता को संयुक्त उम्मीदवार बनाया था हालांकि क्रॉस-वोटिंग के कारण अंततः दिलीप राय ने यह सीट जीत ली। इस परिणाम के बाद ओडिशा की राजनीति में बीजेपी और बीजेडी के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह चुनाव परिणाम विधानसभा के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और भविष्य की रणनीति का संकेत भी माना जा रहा है।
उधर, बिहार में राज्यसभा चुनाव में भी वोटिंग के दौरान महागठबंधन के 4 विधायकों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया और उनकी इस अनुपस्थिति की वजह से पांचवीं सीट भी सत्तारुढ़ एनडीए के खाते में चली गई। अगर ये चारों अपना वोट डालते तो संभवतः एक सीट विपक्षी दलों के महागठबंधन के खाते में आ जाती। इन विधायकों का वोटिंग से गायब रहना जहां प्रदेश की सियासत में चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं ये विधायक अपनी अनुपस्थिति की अलग-अलग वजहें भी बता रहे हैं। वोटिंग से दूरी बनाए रखने वाले
4 विधायकों में से 3 विधायक कांग्रेस के थे, जबकि एक विधायक राष्ट्रीय जनता दल का था। कांग्रेस की ओर से
3 विधायक मनिहारी से मनोहर सिंह, वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र कुशवाहा, और फारबिसगंज से मनोज विश्वास जबकि आरजेडी के ढाका से विधायक फैजल रहमान वोटिंग से दूर रहे। अपनी अनुपस्थिति के बारे में कांग्रेस के विधायक मनोहर प्रसाद सिंह का कहना है, मैं अपने सिद्धांत पर काम करता हूं और मेरा सिद्धांत यह है कि जो निचले तबके के लोग हैं, उन्हें मौका मिलना चाहिए था लेकिन राज्यसभा चुनाव में जो उम्मीदवार उतारे गए थे वो हमारे सिद्धांत के अनुरूप नहीं थे। अमेंद्रधारी वैसे भी आरजेडी के उम्मीदवार थे न कि महागठबंधन के। यह वो वजह है जिसके लिए मैंने वोट नहीं किया। राज्यसभा चुनाव के दौरान वोटिंग से गायब रहने वाले फारबिसगंज के कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास ने भी वोटिंग से दूरी बनाए रखी और इसके पीछे वजह बताते हुए उन्होंने कहा, “इस चुनाव में कांग्रेस की घोर उपेक्षा हुई और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को भी इग्नोर कर दिया गया, इसीलिए उन्होंने वोट नहीं किया। उनका दावा है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को एक दिन पहले ही यह बता दिया था कि वो राज्यसभा चुनाव में वोट डालने नहीं जा रहे हैं।
बिहार की वाल्मिकीनगर सीट से कांग्रेस के एक अन्य और तीसरे विधायक सुरेंद्र कुशवाहा भी अपने फैसले का बचाव कर रहे हैं। उनका कहना है कि आरजेडी उम्मीदवार जिस समुदाय से आते हैं वो हमारा आधार वोटबैंक नहीं है, इसीलिए उन्होंने वोट नहीं किया। सुरेंद्र कुशवाहा कभी उपेंद्र कुशवाहा के बेहद करीबी हुआ करते थे। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में वह उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से चुनाव भी लड़ चुके हैं।
इससे पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो गए। सत्तारूढ़ एनडीए ने द्विवार्षिक चुनाव में बिहार की सभी पांचों सीटों पर कब्जा जमा लिया। हालांकि चुनाव में पांचवीं सीट सबसे अधिक चर्चा में रही, क्योंकि मुकाबला बेहद कांटे का माना जा रहा था। इस सीट को जीतने के लिए एनडीए को
3 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत थी, जबकि महागठबंधन को 6 विधायकों के वोट चाहिए थे। महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव ने संख्या जुटाने के लिए रणनीति बनाई थी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के 5 विधायकों और बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक का समर्थन भी हासिल कर लिया था लेकिन वोटिंग के समय महागठबंधन के 4 विधायक गायब हो गए और वो वोट देने ही नहीं आए। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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