ताइवान-चीन की राजनीति में मोड़

ताइवान जो चीन से सीधे टकराने की बात कर रहा है। उससे चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती कूटनीतिक हलचल के बीच ताइवान की प्रमुख विपक्षी पार्टी कुओमिनतांग (केएमटी) की नई अध्यक्ष चेंग ली-वुन की प्रस्तावित चीन यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई दिलचस्पी पैदा कर दी है। अप्रैल में होने वाली यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब कुछ ही हफ्तों बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी बीजिंग जाने वाले हैं। इस घटनाक्रम ने ताइवान जलडमरूमध्य (क्रॉस-स्ट्रेट) की राजनीति को फिर से वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब एक व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप लेता जा रहा है, जिसका असर न केवल संबंधित देशों पर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देने लगा है।
चेंग ली-वुन, जो अक्टूबर 2025 में केएमटी की अध्यक्ष बनीं, अपने पूर्ववर्ती एरिक चू की तुलना में चीन के प्रति अधिक सकारात्मक रुख रखती हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने बीजिंग के साथ संवाद और सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निमंत्रण पर चेंग का अप्रैल में चीन दौरा तय हुआ है, जिसमें वे बीजिंग, शंघाई और जियांगसू जैसे प्रमुख शहरों का दौरा करेंगी। केएमटी की ओर से जारी बयान के अनुसार, चेंग ली-वुन ने इस निमंत्रण को “खुशी-खुशी” स्वीकार किया है और उम्मीद जताई है कि यह यात्रा दोनों पक्षों के बीच शांति, सहयोग और लोगों के कल्याण को बढ़ावा देगी। यह बयान इस बात का संकेत देता है कि केएमटी चीन के साथ रिश्तों को तनाव की बजाय संवाद के जरिए संभालने के पक्ष में है।
दूसरी ओर, ताइवान की मौजूदा सरकार, जिसका नेतृत्व राष्ट्रपति लाई चिंग-ते कर रहे हैं, चीन के प्रति सख्त रुख अपनाए हुए है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और लाई चिंग-ते को “अलगाववादी” कहता है, इसलिए वह उनकी सरकार से सीधे संवाद करने से बचता है। इसके विपरीत, केएमटी जैसे विपक्षी दलों के साथ चीन लगातार संपर्क बनाए रखता है, जिससे ताइवान की आंतरिक राजनीति में भी विभाजन साफ दिखाई देता है। इस पूरे घटनाक्रम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। 1949 में माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट सेना से हार के बाद केएमटी सरकार ताइवान चली गई थी। तब से लेकर आज तक चीन और ताइवान के बीच कोई औपचारिक शांति समझौता नहीं हुआ है। दोनों ही एक-दूसरे को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं देते, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर संपर्क जारी रहता है।
चेंग ली-वुन की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और चीन के बीच भी तनाव बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा, जो पहले अप्रैल में प्रस्तावित थी, अब मई के मध्य में होने की संभावना है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या चेंग की यात्रा अमेरिका और चीन के बीच होने वाली उच्चस्तरीय बातचीत को प्रभावित कर सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि चेंग ली-वुन खुद को एक “सेतु” के रूप में स्थापित करना चाहती हैं। जो बीजिंग और वाशिंगटन के बीच संतुलन बना सके। हालांकि, उनके इस रुख की ताइवान के भीतर आलोचना भी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि यह रुख ताइवान की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है, जबकि समर्थकों का मानना है कि संवाद ही तनाव कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
कुल मिलाकर, चेंग ली-वुन की चीन यात्रा सिर्फ एक राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि ताइवान, चीन और अमेरिका के त्रिकोणीय संबंधों में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है।
हाल ही में ईरान द्वारा कुवैत के एक बिजली और जल विलवणीकरण संयंत्र पर किए गए हमले में एक भारतीय कामगार की मौत ने इस संघर्ष को और संवेदनशील बना दिया है। यह घटना इस बात का संकेत है कि अब यह टकराव सीमाओं से बाहर निकलकर आम नागरिकों और प्रवासी श्रमिकों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। कुवैत के बिजली मंत्रालय के अनुसार, हमले में संयंत्र की एक सर्विस बिल्डिंग को निशाना बनाया गया, जिससे न केवल एक भारतीय नागरिक की जान गई, बल्कि बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा। यह घटना उस समय हुई है जब
क्षेत्र में पहले से ही तनाव चरम पर है और कई देश सीधे या परोक्ष
रूप से इस संघर्ष में शामिल हो चुके हैं।
इस पूरे संकट की पृष्ठभूमि में इजराइल, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी टकराव है, जो 28 फरवरी से लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल के दिनों में हवाई हमलों के कारण तेहरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई है। ईरान के ऊर्जा मंत्रालय ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि बिजली ढांचे पर हमलों के कारण व्यापक स्तर पर कटौती हुई है।
उधर, डोनाल्ड ट्रंप ने पहले चेतावनी दी थी कि यदि ईरान शांति समझौते के लिए तैयार नहीं होता है, तो उसके बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया जा सकता है। वहीं, ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालिबाफ ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि किसी भी जमीनी हमले का जवाब बलपूर्वक दिया जाएगा। इस बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने मध्यस्थता की पेशकश की है और कहा है कि वह वाशिंगटन और तेहरान के बीच “सार्थक बातचीत” की मेजबानी करने के लिए तैयार है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए कूटनीतिक समाधान की राह फिलहाल कठिन नजर आ रही है। दूसरी ओर, इजराइल भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका को और मजबूत कर रहा है। देश की संसद में 2026 के बजट पर चर्चा के दौरान रक्षा खर्च में 10 अरब डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे सैन्य बजट 45 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच सकता है। साथ ही, दक्षिणी लेबनान में ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह के खिलाफ अभियान भी जारी है।
इस पूरे संकट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि अब यह संघर्ष खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होरमुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को प्रभावित करने की कोशिशों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। कुवैत में भारतीय कामगार की मौत केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक अस्थिरता का प्रतीक है जो इस समय पश्चिम एशिया में फैल रही है। यदि जल्द ही कोई ठोस कूटनीतिक पहल नहीं की गई, तो यह संघर्ष और गहरा सकता है, जिसके परिणाम न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी गंभीर होंगे।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



