आदिवासियों की बेटियों से साजिश!

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद सुमेर सिंह सोलंकी ने गत 17 मार्च को एक गंभीर मामला उठाया था। यह मामला आदिवासियों से जुड़ा है। आदिवासियों की बेटी के साथ सुनियोजित साजिश की जा रही है। एक तरफ हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारे लोकतंत्र ने एक आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाया है, वहीं केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के ही सांसद ने आदिवासियों की बेटियों से शादी कर उनकी जमीन हड़पने का आरोप लगाया है। भाजपा सांसद सोलंकी कहते हैं कि पूरे देश मंे आदिवासी बेटियों के साथ गैर आदिवासी विवाह करके उनके नाम की जमीन हड़पने का खेल कर रहे हैं। वह कहते हैं कि झारखंड मंे ऐसे हजारों मामले हैं। उन्होंने यह मामला राज्यसभा मंे उठाया और केन्द्र सरकार से मांग की इस पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। सोलंकी के धर्मांतरण और आदिवासियों का आरक्षण समाप्त करने संबंधी बयान पर मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल होने लगी। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने तीखी बयानबाजी की। दरअसल, झारखंड मंे आदिवासी नेता हेमंत सोरेन की सरकार है। यहां पर आदिवासी धर्मांतरण एक जटिल मुद्दा बन गया है। राज्य मंे सरना आदिवासी अपनी परम्पराओं को बचाने के लिए सरना धर्म कोड की मांग कर रहे हैं क्योंकि उनके समूह के ज्यादातर लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं। हालांकि यहां आदिवासियों का सबसे बड़ा समूह संथालों का है। दूसरी सबसे बड़ी जनजाति उरांव है।
मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद डॉ सुमेर सिंह सोलंकी ने राज्यसभा में आदिवासियों के धर्मांतरण और जो ईसाई बन चुके हैं उनको एसटी कैटेगरी से बाहर करने की मांग उठाई है। सोलंकी के धर्मांतरण और आदिवासियों का आरक्षण खत्म करने संबंधी बयान पर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। इस मुद्दे पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और प्रदेश के मंत्री विश्वास सारंग के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली। भाजपा के सुमेर सिंह सोलंकी ने कहा कि प्रलोभन और दबाव के जरिए धर्मांतरण की घटनाएं हो रही हैं, जिसे रोकने के लिए कड़े प्रावधान जरूरी हैं। उन्होंने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण की भी बात कही। मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ध्यान भटकाने की राजनीति करती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि प्रदेश में धर्मांतरण हो रहा है तो उसे रोकने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर भाजपा सरकार की है. सिंघार ने कहा कि आरक्षण के मामले में यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी कोई व्यक्ति लाभ ले रहा है, तो इस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए और स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
सुमेर सिंह सोलंकी के बयान को लेकर मंत्री विश्वास सारंग ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सांसद ने जो कहा है, वह सुप्रीम कोर्ट के विस्तारित फैसले की भावना के अनुरूप है। सारंग ने कहा कि यह तथ्य है कि यदि किसी धर्म में एससी/एसटी वर्ग की व्यवस्था ही
नहीं है, तो कोई व्यक्ति उस धर्म को अपनाने के बाद आरक्षण का लाभ क्यों ले। मंत्री सारंग ने आरोप लगाया कि कांग्रेस हर विषय पर राजनीति करती है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म विशेष के कुछ लोग लालच देकर धर्मांतरण कराते हैं और कांग्रेस इस पर चुप्पी
साधे रहती है।
बहरहाल आरक्षण की सुविधा पर धर्मांतरित लोग डाका डाल रहे हैं। इस पर सख्त कानून बनाने की मांग की गई है। एमपी के बीजेपी सांसद सुमेर सिंह सोलंकी ने सदन में इसके लिए आवाज उठाई। उन्होंने मांग की कि धर्मांतरण पर आरक्षण का लाभ नहीं मिले। भाजपा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी ने राज्यसभा में आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह मांग रखी। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण किया तो आदिवासी का आरक्षण खत्म कर डी-लिस्टिंग हो, सरकार को ऐसा कानून लाना चाहिए। मप्र से भाजपा सांसद सुमेरसिंह सोलंकी ने राज्यसभा में धर्मांतरण का यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने शून्य काल में यह मुद्दा उठाकर कहा कि देश में सबको धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार तो है, परंतु छल, बल और प्रलोभन द्वारा धर्मांतरण कानूनी अपराध है। धर्मांतरण रोकने के लिए संविधान में संशोधन होना चाहिए।
सांसद सुमेर सिंह सोलंकी ने कहा कि इसके तहत आदिवासी समाज का जो व्यक्ति धर्मांतरित हो चुका है, उनका आरक्षण खत्म होना चाहिए। उन्हें डी-लिस्टिंग भी कर देना चाहिए। यह लोग जनजाति समाज के हक को मार रहे हैं।राज्यसभा में सोलंकी ने कहा कि कई राज्यों में धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, फिर भी पूरे देश में एक कठोर कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इससे आदिवासी के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की जा सकती है। उन्होंने कहा 24 मार्च 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी वर्ग के मामले में जो फैसला दिया गया है कि धर्म बदला तो आरक्षण खत्म, इस फैसले का स्वागत करता हूं। इस प्रकार की व्यवस्था या कानून जनजाति समाज के धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए भी होना चाहिए और उनकी घर वापसी होना चाहिए।सांसद सुमेर सिंह ने कहा कि आज धर्मांतरण हमारे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका है, जिस पर हमें सोचना पड़ेगा। आदिवासी समाज सनातन धर्म, संस्कृति और परंपराओं को मानने वाला रहा है, लेकिन धर्मांतरण के कारण आज जनजाति समाज की पहचान खतरे में है, जिसकी हम सबको चिंता करनी चाहिए। आज छल एवं डरा धमकाकर धर्मांतरण किया जा रहा है। आर्थिक लालच देकर, नौकरी, इलाज और शिक्षा का लालच देकर, अंधविश्वास भ्रम फैलाकर धर्मांतरण किया जा रहा है।शादी विवाह के माध्यम से धर्मांतरण किया जा रहा है, सामूहिक धर्मांतरण किया जा रहा है जो संगठित अपराध की श्रेणी में आता है। यह खेल कई राज्यों में चल रहा है। इससे जनजाति संस्कृति, परंपराएं, रीति रिवाज, पूजा पद्धति और मेरे आदिवासी की पहचान धीरे-धीरे खत्म करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने और हमारे आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने लगातार धर्मांतरण रोकने की मांग की है।
झारखंड में आदिवासी धर्मांतरण एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जहाँ सरना (मूल धर्म) अनुयायी ईसाई धर्म अपना रहे हैं। आदिवासी संगठन इसे बहला-फुसलाकर किया गया परिवर्तन बताते हैं, जबकि सरना और ईसाई आदिवासियों के बीच तनाव बढ़ रहा है। आरोप है कि धर्मांतरित लोग आरक्षण और सरकारी योजनाओं का दोहरा लाभ ले रहे हैं, जिससे मूल सरना आदिवासियों के अधिकार कम हो रहे हैं। सरना आदिवासी अपनी परंपराओं को बचाने के लिए सरना धर्म कोड की मांग कर रहे हैं और धर्मांतरण का विरोध कर रहे हैं। आदिवासी समूहों का तर्क है कि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से हटा दिया जाना चाहिए ताकि मूल आदिवासियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिले।
आदिवासियों के धर्मांतरण के कारणों में स्वास्थ्य, शिक्षा, और सामाजिक प्रतिष्ठा में सुधार की इच्छा बताई जाती है। झारखंड उच्च न्यायालय ने आदिवासियों के धर्मांतरण पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है, यह चिंता जताते हुए कि धर्मांतरण के कारण मूल आदिवासी समुदाय की संख्या घट रही है। छोटानागपुर क्षेत्र में 19वीं सदी के मध्य (लगभग 1845-1850) से ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन की शुरुआत मानी जाती है। संथाल झारखंड की जनजातियों में सबसे बड़ी जनजाति है, जिनकी जनसंख्या अधिक है। झारखंड की अन्य प्रमुख जनजातियों में कोल, मुण्डा, माहली, हो, भूमिज, उरांव, बिरहोर आदि शामिल हैं। संथाल झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति है, वे मुख्य रूप से संथाली भाषा बोलते हैं। उरांव झारखंड की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



