लेखक की कलम

सीज फायर से बची ट्रम्प की इज्जत

ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच सीज फायर की घोषणा से पूरी दुनिया राहत महसूस कर रही है। यह युद्ध विराम फिलहाल 14 दिन के लिए घोषित किया गया है लेकिन संभावना यही है कि मध्य-पूर्व एशिया का महासंग्राम थम जाएगा। इस सीज फायर ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इज्जत बचा ली है। उन्होंने एक दिन पहले ही धमकी दी थी कि आज रात अर्थात 7 अप्रैल की रात पूरी सभ्यता का अंत जो जाएगा जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा था कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो लेकिन शायद ऐसा ही होगा। डोनाल्ड ट्रम्प इस तरह की धमकियां पहले भी दे चुके थे और ईरान ने जिस बहादुरी से उनको जवाब दिया उससे इजरायल की कम और अमेरिका की ज्यादा किरकिरी हो रही थी। उधर, सुरक्षा परिषद में अमेरिका के इशारे पर बहरीन की तरफ से ईरान के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था उस पर रूस और चीन ने वीटो कर दिया। अमेरिका की जनता भी डोनाल्ड ट्रम्प के विरोध में आवाज उठायी थी। इसलिए अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को यही प्रयास करना चाहिए जिससे युद्ध विराम स्थायी रूप ले सके। निश्चित रूप से ईरान को बहुत गहरे जख्म लगे हैं। उसके शीर्ष नेता और अफसर इस युद्ध में मारे गये सम्पत्ति का अलग नुकसान हुआ है। ईरान को संभलने का मौका अमेरिका दे तो बेहतर रहेगा क्योंकि उसकी मंशा वहां सत्ता परिवर्तन की है और अप्रत्यक्ष तौर पर ईरान के यूरेनियम पर भी उसकी कुदृष्टि है। अमेरिका अपनी जनता का गुस्सा शांत करे। इसी तरह इजरायल को भी अपनी जनता को समझाना पड़ेगा कि ईरान के प्रति उसकी सुरक्षा की आशंका निर्मूल है। व्यर्थ की आशंका ने ही मध्य-पूर्व एशिया में यह तबाही मचाई जिसकी तपिश पूरी दुनिया को झेलनी पड़ी है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच घोषित 14 दिन का युद्धविराम फिलहाल राहत लेकर आया है, लेकिन यह शांति कितनी स्थायी होगी, इस पर सवाल बरकरार है। हालात बेहद संवेदनशील हैं और आने वाले दिनों में तीनों देशों की रणनीति ही तय करेगी कि क्षेत्र युद्ध की ओर बढ़ेगा या कूटनीति की दिशा में आगे बढ़ेगा। इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में वार्ता के लिए आमंत्रण देकर एक नई कूटनीतिक पहल की है। पाकिस्तान की यह कोशिश क्षेत्रीय स्थिरता लाने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है। हालांकि, यह देखना अहम होगा कि अमेरिका, ईरान और इजरायल इस पीस ऑफर को किस रूप में लेते हैं, क्योंकि बातचीत तो 28 फरवरी से पहले भी इन देशों के बीच हो रही थी।
जंग में सबसे ज्यादा नुकसान ईरान को हुआ है। अली हुसैनी खामेनेई समेत ईरान का पूरा शीर्ष नेतृत्व अमेरिका और इजरायल के हमलों में मारा जा चुका है। नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई जिंदा हैं या नहीं, इसको लेकर भी अमेरिका और इजरायल सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में युद्धविराम के दौरान ईरान की पहली प्राथमिकता अपने घरेलू मोर्चे को मजबूत करना होगी। जंग में हुए बुनियादी ढांचे और सैन्य नुकसान की भरपाई करना तेहरान के लिए बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही जिन शीर्ष सैन्य और रणनीतिक नेताओं की मौत हुई है, उनके स्थान पर नई नियुक्तियां करना भी जरूरी होगा। ईरान को अपने नागरिकों के बीच विश्वास बहाल करना होगा और यह दिखाना होगा कि वह बाहरी दबावों के बावजूद स्थिर और सक्षम है। साथ ही, वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ संबंधों को भी फिर संतुलित करने की कोशिश करेगा, ताकि भविष्य में किसी संभावित संघर्ष के लिए बेहतर स्थिति में रह सके।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध को जितना आसान समझा, उतना था नहीं। जंग में जाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को अपने देश में ही आलोचना का सामना करना पड़ा। ऐसे में अमेरिका के लिए यह युद्धविराम एक अवसर भी है और चुनौती भी। डोनाल्ड ट्रंप को अपनी जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस जंग में अमेरिका ने रणनीतिक बढ़त हासिल की है। घरेलू राजनीति को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन को मजबूत नेतृत्व और निर्णायक कार्रवाई का संदेश देना होगा। साथ ही, अमेरिका को यह भी तय करना होगा कि वह आगे कूटनीतिक रास्ता अपनाए या दबाव की नीति जारी रखे। सीजफायर के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने भी कई चुनौतियां हैं। एक तरफ उन्हें अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाना है कि इजरायल ने ईरान के खिलाफ अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की है, वहीं दूसरी ओर उन्हें भविष्य के खतरों से निपटने के लिए सतर्क रहना होगा। इजरायल का एयर डिफेंस सिस्टम आयरन डोम बेहद मजबूत माना जाता रहा है, लेकिन इस जंग में देखने को मिला कि ईरान की कई मिसाइलों ने इसे भेद दिया। ईरान की कई मिसाइलें इजरायल के रिहायशी इलाकों में जाकर फटी और नुकसान पहुंचाया।
यह फैसला उस समय हुआ जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को पूरी तरह नष्ट करने के लिए दी गई डेडलाइन खत्म होने में सिर्फ लगभग एक घंटा बाकी था। इस समझौते के तहत ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल देगा। अमेरिका और इजराइल की तरफ से एक महीने से ज्यादा समय तक हुए तेज हमलों के बाद, ईरान ने कहा कि वह वॉशिंगटन के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हो गया है। यह बातचीत पाकिस्तान में शुरू होगी, जिसका उद्देश्य इस संघर्ष को खत्म करने का रास्ता
ढूंढना है। चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने तीन ईरानी अधिकारियों के हवाले से एक रिपोर्ट छापी है। इसके अनुसार ईरान ने पाकिस्तान के दो हफ्ते के युद्ध-विराम प्रस्ताव को आखिरी समय में चीन के हस्तक्षेप के बाद स्वीकार किया। चीन ईरान का महत्वपूर्ण सहयोगी है। चीन ने ईरान सेलचीलापन दिखाने और तनाव कम करने के लिए कहा। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान से आर्थिक तबाही के बारे में बढ़ती चिंताओं के बीच ईरान ने पाकिस्तान के दो सप्ताह के संघर्ष विराम प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
इस जंग ने दुनिया के बहुत से देशों को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। मिसाइलें और ड्रोन से सिर्फ जानी नुकसान ही नहीं हो रहा बल्कि आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया है। पिछले एक महीने से ज्यादा समय से चल रहे युद्ध की वजह से जमकर बर्बादी हो रही थी। दोनों देशों के बीच सीजफायर पर अब सहमति बनी है। अब तक चली जंग से सिर्फ ईरान-इजरायल और अमेरिका ही नहीं अन्य खाड़ी देशों को भी जमकर नुकसान उठाना पड़ रहा है। दुनिया की जीडीपी को अब तक करीब 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इस तबाही से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक हर तरफ हाहाकार मचा है। जंग की सबसे ज्यादा कीमत
ईरान चुका रहा है। अमेरिका और इजरायल के मिसाइलों और हवाई हमलों से ईरान को न सिर्फ इंसानी बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी तोड़ कर रख दिया है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button