लेखक की कलम

बालेन शाह का सुशासन की ओर साहसिक कदम

नेपाल की राजधानी काठमांडू के पूर्व मेयर और मौजूदा प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह अपने अनोखे और सख्त प्रशासनिक फैसलों के लिए लगातार चर्चा में रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद हाल ही में उन्होंने “जीरो फाइल” पहल को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है, जिसका उद्देश्य सरकारी दफ्तरों में लंबित फाइलों की समस्या को समाप्त करना और प्रशासन को अधिक तेज, पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाना है।
“जीरो फाइल” पहल का सीधा अर्थ है कि किसी भी सरकारी विभाग में एक भी फाइल लंबित न रहे। यह पहल केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक सुधार का मॉडल है, जो सरकारी कामकाज में वर्षों से चली आ रही सुस्ती और देरी को खत्म करने का सराहनीय प्रयास भी है।
काठमांडू महानगरपालिका में अक्सर यह देखा गया कि कई महत्वपूर्ण फाइलें महीनों, कभी-कभी वर्षों तक लंबित रहती थीं। इससे न केवल आम जनता को परेशानी होती थी, बल्कि विकास कार्य भी प्रभावित होते थे। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए बालेन्द्र शाह ने “जीरो फाइल” नीति को लागू करने का निर्णय लिया।
इस पहल के तहत सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे अपने-अपने लंबित मामलों की सूची तैयार करें और एक तय समयसीमा के भीतर उन्हें निपटाएं। इसके साथ ही अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई। यदि कोई फाइल अनावश्यक रूप से लंबित पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।
“जीरो फाइल” पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल सिस्टम का उपयोग है। बालेन्द्र शाह के प्रशासन ने फाइलों के डिजिटलीकरण पर जोर दिया, जिससे हर फाइल की स्थिति को ट्रैक किया जा सके। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार की संभावनाओं में भी कमी आई है। जब हर फाइल का रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध होता है, तो किसी भी तरह की हेराफेरी या देरी को छिपाना आसान नहीं रहता।
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ आम नागरिकों को मिला है। पहले जहां एक साधारण काम के लिए लोगों को कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब वही काम अपेक्षाकृत कम समय में पूरा हो रहा है। इससे लोगों का सरकार पर विश्वास भी बढ़ा है।
हालांकि, इस पहल को लागू करना आसान नहीं था। कई अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह एक बड़ा बदलाव था, क्योंकि उन्हें पुरानी कार्यप्रणाली से बाहर निकलकर नई प्रणाली को अपनाना पड़ा। शुरुआत में कुछ विरोध और असंतोष भी देखने को मिला, लेकिन सख्त निगरानी और स्पष्ट निर्देशों के कारण धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हुआ।
बालेन्द्र शाह की कार्यशैली इस पहल में स्पष्ट रूप से झलकती है। वे तकनीक के उपयोग, पारदर्शिता और त्वरित निर्णय लेने पर जोर देते हैं। उनका मानना है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रिया सरल और तेज होगी, तो विकास कार्यों में भी तेजी आएगी और जनता को बेहतर सेवाएं मिलेंगी।
“जीरो फाइल” पहल केवल काठमांडू तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अन्य शहरों और देशों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है। भारत सहित कई देशों में सरकारी फाइलों के लंबित रहने की समस्या आम है। ऐसे में यह पहल एक प्रेरणा बन सकती है कि किस तरह मजबूत इच्छाशक्ति और सही नीति के जरिए इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इसके अलावा, यह पहल सुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जब प्रशासन पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध होता है, तो भ्रष्टाचार में कमी आती है और जनता को बेहतर सेवाएं मिलती हैं।
हालांकि, इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे लंबे समय तक कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। केवल शुरुआत में फाइलों को निपटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि भविष्य में भी यह सुनिश्चित करना होगा कि नई फाइलें लंबित न रहें। इसके लिए निरंतर निगरानी, तकनीकी सुधार और प्रशासनिक इच्छाशक्ति आवश्यक है।
अंततः, बालेन्द्र शाह की “जीरो फाइल” पहल यह दिखाती है कि यदि नेतृत्व मजबूत और दूरदर्शी हो, तो प्रशासनिक सुधार संभव हैं। यह
पहल न केवल काठमांडू के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए
एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जहां सरकारी कामकाज को तेज, पारदर्शी और जनता के अनुकूल बनाने की आवश्यकता है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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