आदिवासियों का जल सत्याग्रह

सामाजिक समस्याओं का समाधान समाज शास्त्रीय तरीकों से ही निकाला जा सकता है। मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना दीर्घकालीन लाभ के लिए बनायी गयी है लेकिन आदिवासी समुदाय इससे सांस्कृतिक रूप से जुड़ा है। विपक्षी दल राजनीतिक रोटियां भी सेंक रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मध्य प्रदेश सरकार इस सामाजिक समस्या को राजनीतिक रूप से सुलझाना चाहती है। भाजपा की केन्द्र सरकार हालांकि आदिवासियों के हित में कई योजनाएं चला रही है और इस बात पर गर्व भी करती है कि उसकी सरकार के दौरान ही राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू विराजमान हैं। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में छतरपुर जिले में मोहन यादव की सरकार आदिवासियों की शंका का समाधान नहीं कर पा रही है। गत 15 अप्रैल को आदिवासियों ने कई मोर्चों पर उग्र रूप धारण कर लिया। आदिवासियों ने परियोजना के विरोध में जल सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया। उन्होंने पानी में खड़े रहकर यह संदेश दिया कि जिस नदी को विकास का आधार बताया जा रहा है, वही इनके अस्तित्व का संकट बन गयी है। आंदोलनकारी सामूहिक रूप से भूख हड़ताल कर रहे हैं। ग्रामीण अपने खेत की मिट्टी हाथ में लेकर यह संकल्प कर रहे हैं कि वे अपने पूर्वजों की जमीन किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि आंदोलनकारियों ने सांकेतिक फांसी जैसे विरोध-प्रदर्शन की धमकी दी है। मोहन यादव की सरकार को तत्काल इस मामले में सहानुभूति पूर्वक प्रयास करना चाहिए और आंदोलनकारियों को केन-बेतवा लिंक परियोजना का महत्व समझाना चाहिए और उन्हें इस बात का विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि जहां भी उनका पुनर्वास होगा। वह जमीन भी उनके पुरखों की ही है।
ध्यान रहे कि केन-बेतवा लिंक भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना है। इसके लिए बांध और नहर बनेगी।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के चलते विस्थापन का सामना कर रहे आदिवासी समुदाय का धैर्य अब टूटने लगा है। लंबे समय से चल रहे विरोध ने 15 अप्रैल को कई मोर्चों पर एक साथ उग्र रूप ले लिया, जिससे प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। प्रभावित ग्रामीणों ने केन नदी में उतरकर जल सत्याग्रह किया और घंटों पानी में खड़े रहकर यह संदेश दिया कि जिस नदी को विकास का आधार बताया जा रहा है, वही आज उनके अस्तित्व पर संकट बन गई। इसके साथ ही मिट्टी सत्याग्रह का सिलसिला दूसरे दिन भी जारी रहा। ग्रामीणों ने अपने खेतों की मिट्टी हाथ में लेकर यह संकल्प दोहराया कि वे अपने पूर्वजों की जमीन किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। पिछले दस दिनों से जारी चिता आंदोलन भी अब और अधिक गंभीर हो गया है। लोग प्रतीकात्मक चिताओं के पास बैठकर अपने दर्द और आक्रोश को जाहिर कर रहे हैं। आंदोलन के समर्थन में कई गांवों में चूल्हा बंद रखा गया है। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से भोजन त्याग दिया है। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भूखे रहकर अपनी मांगों के प्रति एकजुटता दिखा रहे हैं, इस उम्मीद में कि उनकी आवाज राज्य और केंद्र सरकार तक पहुंचेगी। प्रभावित आदिवासियों और किसानों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि परियोजना के लिए जिन ग्राम सभाओं का हवाला दिया जा रहा है, वे पूरी तरह फर्जी हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि इन सभाओं को सार्वजनिक किया जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। उनका आरोप है कि प्रशासन बिना उचित प्रक्रिया अपनाए लोगों को उनके घरों से बेदखल करने की कोशिश कर रहा है। कार्यकर्ताओं ने धारा 31 और विस्थापन कानून का हवाला देते हुए कहा कि जब तक पूर्ण मुआवजा और पुनर्वास सुनिश्चित नहीं होता, तब तक किसी को हटाया नहीं जा सकता। इसके बावजूद प्रशासनिक कार्रवाई जारी है, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि गांवों में दलाल सक्रिय हैं, जो मुआवजे की राशि में कटौती कर रहे हैं और विभिन्न दस्तावेजों के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है। माना जा रहा है कि अधिकारी जमीनी हकीकत से दूर रहकर केवल कागजी कार्रवाई पूरी कर रहे हैं। प्रशासन और प्रभावितों के बीच बातचीत भी बेनतीजा रही है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांगों में पारदर्शी सर्वे, कानूनी दायरे में जनसुनवाई और बिना कटौती के सीधे मुआवजे का भुगतान शामिल है। आंदोलन अब और उग्र होने की ओर बढ़ रहा है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है, जिसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को यूपी और एमपी के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र में बेतवा नदी के माध्यम से स्थानांतरित करना है। इस 44,605 करोड़ रुपए की परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व का हिस्सा प्रभावित हो रहा है। बुंदेलखंड में पानी की कमी दूर करना, सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन इसका मुख्य लक्ष्य है। पन्ना जिले में केन नदी पर दौधन बांध और 221 किमी लंबी नहर का निर्माण होगा।
मध्य प्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर और यूपी के झांसी, बांदा, महोबा सहित अन्य जिले इससे लाभांवित होंगे और 10.62 लाख हेक्टेयर में सिंचाई तथा 62 लाख लोगों को पेयजल और 103 मेगावाट जलविद्युत का उत्पादन होगा।
पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 98 वर्ग किमी क्षेत्र और लाखों पेड़ डूबने की आशंका, जिस पर विवाद भी है। परियोजना दो चरणों में पूरी होगी। प्रथम चरण के तहत दौधन बांध का निर्माण कार्य प्रगति पर है और इस पर विशेष जोर दिया जा रहा है। केन नदी पर 77 मीटर ऊँचा एक बांध, दाउधन, प्रस्तावित है, जो मौजूदा गंगाऊ बांध से लगभग 2.5 किलोमीटर ऊपर की ओर स्थित है। जलाशय का पूर्ण जल स्तर क्रमशः 240 मीटर और 288 मीटर है। इसकी पूर्ण जल भंडारण क्षमता क्रमशः 169 माइक्रोमीटर और 2853 माइक्रोमीटर है। बिजली उत्पादन के लिए दो विद्युत केंद्र भी प्रस्तावित हैं, एक बांध के निचले हिस्से में और दूसरा निचले स्तर की सुरंग के निकास द्वार पर 2 किलोमीटर सुरंग सहित लिंक नहर की कुल लंबाई 221 किलोमीटर होगी।
दूसरे चरण में राजघाट बांध पर मध्य प्रदेश को आवंटित जल के भीतर बेतवा बेसिन के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों की जल आवश्यकता को पूरा करने के लिए लोअर ऑर्डम, कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स परियोजनाओं को शामिल किया गया। इस परियोजना से प्रतिवर्ष 10.62 लाख हेक्टेयर (मध्य प्रदेश 8.11 लाख हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश 2.5 लाख हेक्टेयर) भूमि की सिंचाई, लगभग 62 लाख (मध्य प्रदेश 41 लाख, उत्तर प्रदेश 21 लाख) लोगों को पेयजल की आपूर्ति और 103 मेगावाट जलविद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन होने की उम्मीद है। बिजली उत्पादन का एक हिस्सा परियोजना में सूक्ष्म सिंचाई के विकास के लिए उपयोग किया जाएगा। केबीएलपी का मुख्य उद्देश्य मध्य प्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, विदिशा, सागर, शिवपुरी, दतिया और रायसेन जिलों तथा उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा, झांसी और ललितपुर जिलों जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों को सिंचाई और घरेलू जल आपूर्ति सुविधाएं प्रदान करना है। यह परियोजना दो चरणों में 8 वर्षों की अवधि में निर्मित की जाएगी।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



