लेखक की कलम

आकस्मिक नहीं है मजदूरों का आक्रोश

देश की राजधानी से सटे यूपी के औद्योगिक नगर नोएडा में आंदोलन बन कर सुलगा मजदूरों का आक्रोश आकस्मिक नही है। इसके पीछे जिम्मेदार अधिकारियों की श्रमिक हितों की अनदेखी, अधिक काम के घंटे कम मजदूरी, साप्ताहिक अवकाश का न होना समेत कई दमनकारी व्यवहार हैं पहले से बदहाल श्रमिकों को हाल ही में एलपीजी की कमी होने पर खाना बनाने के लिए एलपीजी ब्लैक में खरीदने, खुदरा राशन पर दाम बढ़ने से जीवन यापन करना असहज हो गया और उनका आक्रोश सड़कों पर आ गया। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यूनतम वेतन दरों में संशोधन को मंजूरी दे दी है। नोएडा में कर्मचारियों के उग्र प्रदर्शन के बाद योगी सरकार ने यह फैसला लिया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार ये नई अंतरिम दरें 1 अप्रैल से लागू कर दी गई हैं। नोएडा में 13 अप्रैल को हुए श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन के बाद दिल्ली-एनसीआर में हाई अलर्ट है। मजदूरों के गुस्से को देख कर सरकार आनफुट आ गयी है। केंद्र सरकार मामले की मानिटरिंग कर रही है, वहीं यूपी हरियाणा राजस्थान की प्रदेश सरकारें अपने-अपने स्तर पर मजदूरों के आंदोलन के शमन और मजदूरों को भड़काने वाले लोगों की पहचान करने में लगी हैं। सरकार का मानना है कि यह समिति संवाद और आपसी सहमति के जरिए विवादों को सुलझाएगी, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सके और औद्योगिक माहौल स्थिर बना रहे। उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में वेतन बढ़ोत्तरी समेत सामाजिक सुरक्षा के कई बिंदुओं को लेकर मजदूरों के आंदोलनों व उग्र प्रदर्शनों ने केंद्र तक को सतर्क कर दिया है। दरअसल, हरियाणा से शुरू हुई आग उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है। हरियाणा से सटे राजस्थान के इक्के दुक्के स्थानों पर छिटपुट घटना होकर फिलहाल शांति है।
दिल्ली से सटे नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों का गुस्सा अब एक शहर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे दिल्ली-एनसीआर में फैला हुआ एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। वेतन वृद्धि, महंगाई और श्रम सुविधाओं को लेकर शुरू हुआ यह विरोध अब कई जिलों में असर दिखा रहा है। नोएडा में चल रहे इस आंदोलन की शुरुआत 7 अप्रैल को गुरुग्राम के मानेसर इलाके से हुई थी, जहां मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन शुरू किया था। इसके बाद यह विरोध धीरे-धीरे नोएडा और फिर ग्रेटर नोएडा पहुंचा। अब इस आंदोलन का असर गाजियाबाद, बुलंदशहर और हापुड़ तक में भी दिखाई दे रहा है। बड़ी संख्या में बुलंदशहर और गाजियाबाद में श्रमिकों ने प्रदर्शन किया और सड़कों को जाम कर दिया। गाजियाबाद में स्थिति इतनी खराब हो गई कि नोएडा-गाजियाबाद बॉर्डर पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया।
जान लीजिए नोएडा में यह आंदोलन 9 अप्रैल को फेस-टू थाना क्षेत्र में मौजूद होजरी कंपलेक्स से शुरू हुआ। शनै-शनै मजदूरों के आंदोलन की ने 12 अप्रैल को बड़ा मोड़ लिया। ग्रेटर नोएडा के इकोटेक थर्ड इलाके में प्रदर्शन के दौरान मिंडा कंपनी के पास हालात अचानक बिगड़ गए। इस दौरान पुलिस कार्रवाई में गोली चलने की घटना सामने आई, जिसमें एक महिला मजदूर को गोली लग गई। यह घटना पूरे आंदोलन के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। जैसे ही गोलीकांड की खबर फैली, मजदूरों में भारी आक्रोश फैल गया और आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। अगले ही दिन 13 अप्रैल यानी सोमवार की सुबह नोएडा के फेस-2, सेक्टर-62 और एनएच-9 जैसे प्रमुख इलाकों में हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए। इससे यातायात पूरी तरह ठप हो गया। कई वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। इससे पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। पुलिस और मजदूर आमने-सामने आ गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। भारी पुलिस बल की तैनाती के बाद किसी तरह हालात को काबू में लाया गया, लेकिन
तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
इस आंदोलन का सीधा असर नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक ढांचे पर पड़ा। फेस-2 के होजरी काम्पलेक्स में करीब 500 कंपनियां संचालित होती हैं। वहीं, इकोटेक थर्ड के औद्योगिक क्षेत्र में भी करीब 400 से अधिक फैक्ट्रियां और निजी कंपनियां हैं। इनमें सैकड़ों की संख्या में मजदूर काम करते हैं। दोनों प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हुआ और कई कंपनियों को अस्थायी रूप से काम बंद करना पड़ा। गाजियाबाद, बुलंदशहर और हापुड़ जैसे जिलों में भी मजदूर सक्रिय हो गए हैं, जिससे आने वाले दिनों में आंदोलन और व्यापक होने की आशंका है।
मजदूरों की प्रमुख मांगों में न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 26,000 रुपये प्रति माह करना, ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से करना, साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित करना, समय पर वेतन भुगतान, सैलरी स्लिप देना और बोनस को सीधे बैंक खाते में समय पर भेजना शामिल है। उनका कहना है कि महंगाई के इस दौर में मौजूदा वेतन से गुजारा संभव नहीं है। प्रदर्शन के दौरान नोएडा-गाजियाबाद बॉर्डर पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया, जिससे ट्रैफिक पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा। यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा और कई जगह एंबुलेंस फंसने की घटनाएं भी सामने आईं।
आपको बता दें राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में न्यूनतम वेतन देश में सबसे अधिक है ऐसे में भाजपा के लिए परेशानी बढ़ेगी क्योंकि ये चारो राज्य भाजपा शासित हैं। ऐसे में अगर जरूरत महसूस हुई तो औपचारिक- अनौपचारिक रूप से केंद्रीय स्तर पर इन राज्यों की बैठकें कर स्थिति
को संभालने की कोशिश होगी।
उद्योगों को भी साथ लेकर चलने की जरूरत है और मजदूरों का ध्यान रखने की भी। मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए लेकिन उद्योगों की भी सुरक्षा होनी चाहिए।
पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में जिस तरह आग फैली है उसमें राजनीतिक मंशा देखी जा रही है क्योंकि अगले साल की शुरूआत में ही वहां चुनाव है। राजस्थान में भी न्यूनतम वेतन अपेक्षाकृत कम है लेकिन वहां भिवाड़ी के अलावा किसी स्थान पर कोई घटना नहीं हुई और अब शांत है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर राज्य सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य मजदूरों के हितों
की सुरक्षा के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्रों में शांति और संतुलन बनाए रखना है।(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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