बेहतर संवाद का माध्यम बना जी-7 शिखर सम्मेलन

फ्रांस के अल्पाइन शहर एवियन-ले-बैंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ। यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया था। इस युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजशकियान ने समझौते पर डिजिटल हस्ताक्षर किये। फ्रांस में चल रहा जी-7 शिखर सम्मेलन उस पल का गवाह बना, जब ट्रंप ने वर्साय के महल में ईरान समझौते पर हस्ताक्षर किए। ट्रंप ने इस समझौते पर उस डिनर के दौरान साइन किए जिसकी मेजबानी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ऐतिहासिक महल के अंदर की थी। यह पल अमेरिका और ईरान के बीच टकराव को खत्म करने की दिशा में महीनों तक चली बातचीत के बाद एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि साबित हुआ।
एक वीडियो सामने आया है, जिसमें मैक्रों और अन्य मेहमानों के साथ डिनर टेबल पर बैठे ट्रंप पीस एग्रीमेंट की हार्ड कॉपी पर दस्तखत करते देखे जा सकते हैं। ट्रंप के हस्ताक्षर करते ही वहां मौजूद मेहमानों ने ताली बजाकर शांति के इस कदम का स्वागत किया।
सम्मेलन के दौरान एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी देखने को मिला कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो अक्सर बहुपक्षीय मंचों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों के आलोचक रहे हैं, इस बार अपने सहयोगी देशों के बीच अपेक्षाकृत सहज और सकारात्मक दिखाई दिए। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच हुआ प्रारंभिक शांति समझौता था, जिसे जी 7 देशों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
कुछ सप्ताह पहले तक ट्रंप अपने यूरोपीय सहयोगियों से नाराज थे क्योंकि उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इजरायली सैन्य अभियान में भाग लेने से इनकार कर दिया था। ट्रंप का मानना था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए कठोर सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी लेकिन युद्ध के बाद जब अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय शांति समझौते का मसौदा सामने आया, तो वही सहयोगी देश इस पहल के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। जी 7 नेताओं ने न केवल इस समझौते का स्वागत किया बल्कि संयुक्त बयान में ट्रंप के मजबूत नेतृत्व की भी प्रशंसा की।
यह घटनाक्रम ट्रंप की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है। सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा कि जी 7 में उन्हें अभूतपूर्व एकता देखने को मिली। उनका मानना था कि सभी देशों की प्राथमिकता अब क्षेत्रीय स्थिरता और तेल कीमतों को नियंत्रित करना है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ था और कई देशों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए ईरान समझौते को केवल राजनीतिक सफलता नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम माना गया।
हालांकि इस समझौते की सफलता को लेकर अभी भी कई प्रश्न बने हुए हैं। दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने स्वयं इस समझौते की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पर डाल दिया। वेंस इस समझौते के प्रमुख वार्ताकारों में शामिल रहे हैं और वे लगातार मीडिया में इसकी वकालत करते रहे हैं। जब पत्रकारों ने ट्रंप से पूछा कि यदि समझौता सफल होता है तो क्या वे इसका श्रेय लेंगे और असफल होने पर वेंस को दोष देंगे, तो ट्रंप ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उन्हें यह विचार पसंद है। यह बयान ट्रंप की राजनीतिक शैली को दर्शाता है, जिसमें सफलता का श्रेय लेने और असफलता की जिम्मेदारी दूसरों पर डालने की प्रवृत्ति अक्सर देखी जाती है।
जी-7 सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यूक्रेन युद्ध को लेकर सामने आया। पिछले कुछ वर्षों में ट्रंप और यूरोपीय नेताओं के बीच यूक्रेन को लेकर मतभेद रहे हैं। ट्रंप बार-बार यह कहते रहे हैं कि यूक्रेन के पास रूस के खिलाफ लड़ाई में कोई मजबूत पत्ता नहीं है और उसे समझौते की दिशा में बढ़ना चाहिए। लेकिन इस बार उन्होंने संयुक्त बयान में यूक्रेन के लिए अटूट समर्थन व्यक्त किया। जी-7 देशों ने यूक्रेन को अतिरिक्त वायु रक्षा प्रणाली, इंटरसेप्टर मिसाइलें और लंबी दूरी की सैन्य क्षमताएँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया। यह संकेत देता है कि यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप को यूक्रेन की स्थिति और उसके रणनीतिक महत्व को लेकर कुछ हद तक प्रभावित किया है।
सम्मेलन में चीन भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने चीन पर वैश्विक आर्थिक असंतुलन पैदा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चीनी उद्योगों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी, अत्यधिक उत्पादन क्षमता और कमजोर घरेलू मांग के कारण विश्व बाजारों में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है। जी-7 देशों ने संयुक्त बयान में आर्थिक दबाव और व्यापारिक असंतुलन के खिलाफ समन्वित कार्रवाई की बात कही।
हालांकि चीन को लेकर ट्रंप का दृष्टिकोण अपने सहयोगियों से कुछ अलग दिखाई दिया। सम्मेलन के समापन पर उन्होंने चीन और रूस दोनों का धन्यवाद किया कि उन्होंने ईरान संघर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया। ट्रंप ने विशेष रूप से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रशंसा करते हुए कहा कि चीन ने ईरान को हथियार उपलब्ध नहीं कराए, जिससे संघर्ष और जटिल नहीं हुआ। यह बयान जी-7 देशों की चीन-विरोधी चिंताओं और ट्रंप की व्यवहारिक कूटनीति के बीच अंतर को दर्शाता है।
इस सम्मेलन का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने ट्रंप को पूरे सम्मेलन में बनाए रखने में सफलता हासिल की। पिछले वर्ष ट्रंप जी-7 सम्मेलन समाप्त होने से पहले ही वापस लौट गए थे लेकिन इस बार मैक्रों ने उन्हें वर्साय के ऐतिहासिक महल में रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया। फ्रांसीसी अधिकारियों के अनुसार यह केवल औपचारिक भोज नहीं था, बल्कि फ्रांस और अमेरिका के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीकात्मक उत्सव भी था। माना जा रहा है कि इस व्यक्तिगत कूटनीतिक पहल ने ट्रंप को सम्मेलन में सक्रिय बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुल मिलाकर जी 7 शिखर सम्मेलन 2026 ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संवाद और व्यक्तिगत कूटनीति आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ईरान समझौते ने ट्रंप को अपने सहयोगियों के साथ संबंध सुधारने का अवसर दिया, जबकि यूक्रेन और चीन जैसे मुद्दों पर भी कुछ हद तक साझा समझ विकसित होती दिखाई दी। हालांकि कई चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं और ईरान समझौते का भविष्य अनिश्चित है, फिर भी यह सम्मेलन इस बात का संकेत देता है कि वैश्विक संकटों के समाधान के लिए बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि जी-7 में दिखाई गई यह एकता केवल कूटनीतिक बयानबाजी थी या वास्तव में विश्व राजनीति में एक नए सहयोगात्मक दौर की शुरुआत। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



