परसाई होने का मतलब

वर्ष 2007 में हरिशंकर परसाई का ‘माटी कहे कुम्हार से‘ का द्वितीय संस्करण प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ‘करंट‘ समाचार-पत्र में प्रकाशित होने वाले स्तम्भ ‘माटी कहे कुम्हार से‘के व्यंग्य लेखों का संग्रह किया गया है, जिसका प्रथम संस्करण वर्ष 2001 में और द्वितीय संस्करण 2007 में प्रकाशित हुआ। करंट के स्तम्भ की तरह ही यह पुस्तक ंभी बहुत चर्चित रही। पुस्तक की भूमिका में परसाई जी लिखते हैं, ‘‘इस लेखन के बारे में मुझे ग़लतफ़हमी नहीं है। अनुभव ने सिखाया है कि लेखक का अहंकार व्यर्थ है। हम कोई युग प्रवर्तक नहीं है। हम छोटे-छोटे लोग हैं। हमारे प्रयास छोटे-छोटे हैं। हम कुल इतना कर सकते हैं कि देश, समाज और विश्व के हम हैं और जिनसे हमारा सरोकार है, उनके उस संघर्ष में भागीदार हों, जिससे
बेहतर व्यवस्था और बेहतर इन्सान
पैदा हो। पाठक के हाथों इस संग्रह को इस आश्वासन के साथ सौंपता हूं कि बुद्धि और विवेक ने जो कहा, वही लिखा है, डर और लोभ से कुछ नहीं लिखा गया।‘‘
उनके इस वक्तव्य से ही उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व और उसकी आभा का आभास मिल जाता है। प्रेमचंद के बाद सबसे अधिक पढ़े जाने वाले व्यंग्यकार हैं परसाई जी। जमानी होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में 22 अगस्त, 1924 को जन्में हरिशंकर परसाई हिन्दी के ऐसे पहलेे रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को हल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से बाहर लाकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा तथा उसे एक विधा का दर्जा दिलाया। परसाई का रचना संसार कभी न घटने वाला अथाह सागर है उनकी प्रांसगिकता कभी ख़त्म नहीं होती। वे एक ऐसे रचनाकार हैं जिनके पास समाज को देखने परखने का अपना एक दृष्टिकोण था। अपने एक लेख ‘अपील का जादू‘ में वे लिखते हैं-‘‘एक देश है! गणतन्त्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फँूक, टोना-टोटका से हल कर लिया जाता है। गणतन्त्र जब चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-कांटे में कुछ गड़बड़ आ गयी है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतन्त्र ठीक चलने लगता है। सारी समस्यायें मुहावरों, नारों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। साम्प्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर दिया गया है-हिन्दू-मुस्लिम, भाई-भाई!‘‘ उनके लेखन में इस तरह के अनेक मास्टर पीस हैं जो दोबारा किसी रचनाकार द्वारा नहीं लिखे गये। उनकी व्यंग्य रचनाएं फिर चाहे वे कहानियाँ हों, कविताएं हों अथवा निबन्ध वे अपनी पहचान छोड़ते चलते हैं। लगातार खोखले होते समाज को उन्होंने बारीकी से पढ़ा और समाज के मध्यम वर्ग की हक़ीकत को बड़ी स्पष्टता के साथ अपनी रचनाओं में मुखरता दी। सामाजिक पाखण्ड उन्हें सख़्त नापसंद था तभी तो वे अपने एक निबन्ध में एक स्थान पर लिखते हैं, हम अपनी महान संस्कृति पर गर्व करते हैं पर आचरण मंे वह संस्कृति गायब है। सुसंस्कृत आदमी का एक लक्षण यह है कि वह दूसरे की तकलीफ़ का ध्यान रखता है। वह अपने कारण दूसरे को कष्ट नहीं देता।‘‘
एक सच्चे ईमानदार इन्सान की तरह उन्होंने जीवन जिया। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने वन विभाग में नौकरी की। खंडवा में 06 महीने अध्ययन किया। 1941-43 दो वर्षों तक जबलपुर में स्पेस टेªनिंग काॅलेज में शिक्षण की उपाधि ली पर जब लगा कि सरकारी नौकरी और जिस तरह का विद्रोही लेखन वे करते थे दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते हैं तो सन् 1942 में उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़कर स्वतंत्र लेखन की शुरूआत की। जबलपुर में ‘वसुधा‘ नाम की साहित्यिक मासिकी निकाली, ‘नई दुनिया’ में ‘सुनो भई साधो‘ ‘नई कहानियों‘ में ‘पांचवा काॅलम‘ और ‘उलझी-उलझी‘ तथा कल्पना में ‘और अन्त में‘ इत्यादि कहानियां, उपन्यास एवं निबन्ध लेखन करने के बावजूद वे अन्ततः व्यंग्य लेखक के रूप में सुप्रसिद्ध हुए।
परसाई जी मुख्यतः व्यंग्यकार हैं उनका लेखन मात्र मनोरंजन के लिए नहीं है वे समय-समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से समाज की अनेक कुरीतियों-विसंगतियों की तरफ सभी का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते नज़र आते हैं। उन्होंने सामाजिक कमजोरियों और भ्रष्टाचार एवं शोषण पर करारा व्यंग्य किया है वे ‘विकलांग ़श्रद्धा का दौर’ में कहते हैं, ‘‘अभी-अभी एक आदमी मेरे चरण छूकर गया है। मैं बड़ी तेजी से श्रद्धेय हो रहा हूं, जैसे कोई चलतू औरत शादी के बाद बड़ी फुर्ती से पतिव्रता होने लगती है। यह हरकत मेरे साथ पिछले कुछ महीनों से हो रही है कि जब-तब कोई मेरे चरण छू लेता है। कई साल पहले एक साहित्यिक समारोह में मेरी ही उम्र के एक सज्जन ने सबके सामने मेरे चरण छू लिए। मैंने आस-पास खड़े लोगों की तरफ़ गर्व से देखा-तिलचट्टों देखो मैं श्रद्धेय हो गया। तुम घिसते रहो कलम।….पर तभी उन श्रद्धालु ने मेरा पानी उतार दिया । उसने कहा,‘‘अपना तो नियम है कि गौ, ब्राह्मण, कन्या के चरण जरूर छूते हैं।‘‘ यानी उसने मुझे बड़ा लेखक नहीं माना था। बम्हन माना था।‘‘
-(प्रेमचन्द के फटे जूते से)
हरिशंकर परसाई जबलपुर-रायपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बार ‘देशबन्धु‘ में पाठकों द्वारा पूछे जाने वाले अनेक प्रश्नों के उत्तर देते थे। अख़बार में इस स्तम्भ का नाम था-‘‘पूछिये परसाई से‘‘। शुरूआत में इस स्तम्भ में हल्के और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे लेकिन बाद में परसाई जी ने लोगों को गम्भीर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। कुछ ही वक्त में इसका दायरा अन्तर्राष्ट्रीय हो गया। यह उनके द्वारा दी गयी सहज जन-शिक्षा थी। लोग उनके सवाल जवाब पढ़ने के लिए अख़बार का बड़ी बेचैनी से इंतजार करते थे।
हरिशंकर परसाई की पहली रचना ‘‘स्वर्ग से नरक जहां तक‘‘ मई 1948 में ‘प्रहरी‘ समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास के विरोध में खुलकर अपने विचार व्यक्त किये थे। यह उनका प्रिय विषय था जिस पर प्रहार करने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया। हरिशंकर परसाई के बारे में कहा जाता है कि वे कार्लमाक्र्स से अधिक प्रभावित थे। उनकी ‘सदाचार का ताबीज़‘ प्रसिद्ध रचनाओं में से एक थी, जिसमें उन्होंने रिश्वत लेने देने के मनोविज्ञान को प्रमुखता से उकेरा है। पाखण्ड, बेईमानी आदि पर वे अपनी रचनाओं में गहरी चोट करते हैं। वे बोलचाल की सामान्य भाषा और देशज शब्दों का प्रयोग करते हैं। उन्होंने हिन्दी के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। उनकी भाषा में ध्वन्यात्मक शब्दों के प्रयोग से तीखे व्यंग्य उभरते हैं। ‘राजा रंक फकीर‘ में सूफियाना अंदाज़़ है तो वहीं दूसरी ओर ठेठ आमजन की भाषा का यह अंदाज भी निराला है,‘‘निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा ख़ून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं। निंदा पायरिया का शर्तिया इलाज है।‘‘
हरिशंकर परसाई उन महान बड़े लेखकों में से थे जिन पर आज भी एक गम्भीर विमर्श की आवश्यकता है। ‘प्रेमचंद के फटे जूते‘ की भूमिका में ज्ञानरंजन जी कहते हैं कि-‘‘परसाई को सत्ता-संस्कृति का बहिष्कार शुरू से सहना पड़ा। मैं चाहता हूं कि हम इस सच्चाई का सामना करें कि परसाई को ‘परिमल’ ने अस्वीकार किया। ‘भारत भवन‘ ने अस्वीकार किया। समाजवादियों ने अस्वीकार किया। हिन्दूवादियों ने अस्वीकार किया। गांधीवादियों ने और प्रबल कट्टर कामरेड भैरव प्रसाद गुप्त ने भी अस्वीकार किया। इस इलेस्ट्रेशन में मैं जाना नहीं चाहता। मेरा संकेत यह है कि जनप्रिय और स्टैण्ड लेने वाले लेखक की हमारे समाज में यह ट्रेजडी है। सब उसे अपनी तरफ चाहते हैं और ऐसा न होने पर टूट पड़ते हैं।‘‘
उनकी प्रकाशित पुस्तकों में, ‘हंसते हैं रोते हैं‘, ‘जैसे उनके दिन फिरे‘, ‘दो नाक वाले लोग‘, ‘रानी नागफनी की कहानी‘ (कहानी संग्रह), ‘तट की खोज‘ (उपन्यास), ‘तब की बात और थी‘, ‘भूत के पांव पीछे‘, ‘बेइमानी की परत‘, ‘पगडण्डियों का ज़माना‘, ‘सदाचार का ताबीज़‘ ‘वैष्णव की फिसलन‘, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर‘, ‘माटी कहे कुम्हार से‘, ‘और अन्त में‘, ‘हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं।‘ (निबन्ध-संग्रह) ‘प्रेमचन्द के फटे जूते‘, ‘कहत कबीर‘ आदि हैं।
वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के निदेशक रहे। 1982 में मध्यप्रदेश सरकार के शिखर सम्मान ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार‘ से सम्मानित, जबलपुर विश्वविद्यालय से डी0लिट् की मानद उपाधि से विभूषित हुये। उन्हें शरद जोशी सम्मान भी दिया गया।
10 अगस्त, 1995 को जबलपुर,
मध्यप्रदेश में इस महान रचनाकार ने दुनिया से विदा ले ली। उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन से जिस तरह से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है, वह अतुलनीय है साहित्य-जगत इसके लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा।(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



