लेखक की कलम

संवर रही आदिगंगा गोमती

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंका विजय और रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार पतित पावन आदि-गंगा गोमती नदी में स्नान किया था एवं अपने धनुष को भी यहीं पर धोया था। इस प्रकार स्वयं को ब्राह्मण की हत्या के पाप से मुक्त किया था। इससे बहुत पहले गोमती नदी का उल्लेख मिलता है। भागवत पुराण के अनुसार, यह भारत की पांच दिव्य नदियों में से एक है। एकादशी के दिन इसके जल में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं, ऐसी मान्यता है। इसी के किनारे नैमिषारण्य में 33 कोटि देवी-देवताओं ने तपस्या की थी। इस नदी में प्राकृतिक रूप से गोमती चक्र पाए जाते हैं, जो आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हिंदू धर्म में इसे गंगा जी से भी प्राचीन माना गया है, इसलिए कई स्थानों पर इसे आदि गंगा भी कहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कालजयी रचना रामचरित मानस में उल्लेख है कि महाराज मनु, जिनके वंशज होने के नाते ही हम मनुष्य कहे जाते हैं, उन्होंने अपनी पत्नी शतरूपा के साथ गोमती के तट पर द्वादश अक्षर महामंत्र का जाप करते हुए महाकठिन तपस्या की थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर परमब्रह्म ने दर्शन दिये थे। मनु और शतरूपा ने भगवान से पुत्र बनने का वरदान मांगा था। उसी वचन को पूरा करने के लिए निराकार ब्रह्म ने साकार रूप राम का धारण किया था। इस प्रकार यह नदी अपने ऐतिहासिक गौरव के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मध्य गंगा के मैदानों की एक प्रमुख जीवन रेखा है। लखनऊ, सुल्तानपुर और जौनपुर जैसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतें इसी नदी के किनारे स्थित हैं।इसके घाटों पर बने मंदिरों में कितने वेद मंत्र गुंजित हुए हैं, कितने घंटे निनादित हुए हैं, कितने ऋषियों ने घनघोर तप किया? इस सरिता के जल उनका पुण्य घुला। वस्तुतः गोमती एक नदी ही नहीं संस्कृति की संवाहिका भी है। नदियां मानव सभ्यताओं एवं संस्कृतियों की जीवनरेखा रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने नदियों के उद्गम स्थलों को भी पर्यटन के मानचित्र पर विकसित करने का लक्ष्य बनाया है। इसी क्रम में योगी आदित्यनाथ की सरकार गोमती के उद्गम स्थल को गंगोत्री और यमुनोत्री जैसा पवित्र तीर्थ धाम बनाना चाहती है। पुराणों और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, गोमती को महर्षि वशिष्ठ की पुत्री माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जनपद की पूरनपुर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत कलीनगर तहसील स्थित गोमती उद्गम स्थल को पर्यटन सुविधाओं से सुसज्जित कर पर्यटन एवं आस्था केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। परियोजना पर 104.81 लाख रुपए व्यय होंगे, जिसकी पहली किस्त के रूप में 78 लाख रुपए जारी किये गये हैं। प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि आस्था की प्रतीक गोमती नदी का उद्गम पीलीभीत जनपद के माधोटांडा ग्राम के समीप गोमत ताल (पूर्व नाम फुलहर झील) से होता है।
सनातन परंपरा में आदि गंगा के रूप में प्रतिष्ठित गोमती नदी प्रदेश के विशाल भूभाग को सिंचित करते हुए करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। पर्यटन विभाग द्वारा गोमती उद्गम स्थल को एक प्रमुख आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित किया जाएगा। नदी आधारित पर्यटन को भी बढ़ावा देने की योजना है। परियोजना के तहत मल्टीपर्पज हाल के निर्माण पर 48.69 लाख रुपए, शौचालय ब्लाक पर 13.44 लाख रुपए तथा शेड निर्माण पर 9.45 लाख रुपए खर्च होंगे। यात्री सुविधाओं के विकास, इंटरलॉकिंग, उद्यान एवं सौंदर्यीकरण (हार्टिकल्चर), क्यूआर-बारकोड युक्त साइनेज तथा सोलर आधारित सुविधाओं का विकास किया जाएगा।कार्यदायी संस्था के रूप में उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (यूपीएसटीडीसी) को जिम्मेदारी दी गई है। गोमती नदी लगभग 960 किलोमीटर की यात्रा के दौरान पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर और जौनपुर सहित अन्य जनपदों से होते हुए। गाजीपुर-वाराणसी के निकट गंगा में विलीन हो जाती है।दरअसल गोमती अवध को परमेश्वर से वरदान के रूप में मिली नदी है। शिवपुराण में नदी को आदेश दिया गया है कि वह मां बनकर जनता का लालन-पालन करे। गोमती, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी माता की भूमिका निभा रही है, यह बात दीगर है कि हम लोग अपनी भूमिका भूल चुके हैं। ऋग्वेद के अष्टम और दशम मण्डल में गोमती को सदानीरा बताया गया है। शिव महापुराण में भगवान आशुतोष ने नर्मदा और गोमती नदियों को अपनी पुत्रियां स्वीकारा है।
गोमती नदी ने देखा है कि किस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुज ने लखनपुरी इसके तट पर बसायी थी। बाद में उसी को लखनऊ के नाम से जाना गया। गोमती ने यह भी देखा है कि कैसे दो बच्चों ने उनसे अपनी माता के परित्याग का प्रतिकार लिया था। किस प्रकार उसके तट पर अनेक ऋषियों ने अपने आश्रम स्थापित किये, किस प्रकार इस क्षेत्र में कथाओं का सूत्रपात हुआ किस भांति इस क्षेत्र में पौरोहित्य का विश्वविद्यालय स्थापित हुआ? श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया। किस तरह से तथागत ने इसके तट पर विश्राम किया और धम्म पद के उपदेश दिये? कैसे एक विदेशी पर्यटक ह्वेनसांग धम्म सभा में सम्मिलित होने के लिए थेरी गाता हुआ यहां से गुजरा था। यह भी कहा जाता है। मुगल सम्राट अकबर ने यहां पर वाजिपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये यहां के ब्राह्मणों को दिये और गोमती का तट यजुरवेद की ऋचाओं से गूंज उठा। इसी काल में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास ने अपनी प्रिय नदी धेनुमती के जल से मार्जन किया था। भारशिवों ने श्रीहर्ष की धम्म सभा में उपद्रव करने के बाद नदी को पार करके उत्तरांचल की ओर प्रस्थान किया था। श्रीहर्ष की सेनाएं नदी के तट पर आकर उनकी खोज में काफी समय भटकती रह गयी थीं। राजा जयचन्द ने प्रसिद्ध वीर आल्हा-ऊदल को पासी और भारशिवों का दमन करने के लिए यहां भेजा था।
गोमती को हिन्दू एक पवित्र नदी मानते हैं और भागवत पुराण के अनुसार यह पाँच दिव्य नदियों में से एक है लेकिन उपेक्षित हो गयी। आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है। इतना ही नहीं यूपी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी ने तो इस नदी में प्रदूषण को लेकर सबसे कठोर टिप्पणी की थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि गोमती की हालत ऐसी हो गई है कि इसमें डुबकी लगाने से लेकर इसके किनारों पर टहलने तक से परहेज करने की जरूरत है। इस कमेटी ने नदी के आस पास की जगह को बेहद प्रदूषित करार देते हुए नदी के 150 मीटर के दायरे में किसी तरह के निर्माण कार्य नहीं होने देने की ताकीद की थी। इस सिलसिले में नदी के किनारे बसे 11 जिलों के डीएम को इस कमेटी ने नोटिस जारी कर कहा था वे जितनी जल्द हो सके इसे प्रदूषण से बचाने के लिए जरूरी इंतजाम करें। इसके साथ ही अनुपालन गारंटी के रूप में प्रदेश सरकार से 100 करोड़ रुपये जमा कराने के लिए एनजीटी से सिफारिश की गई। योगी आदित्यनाथ ने 2017 में सत्ता संभालने के बाद धार्मिक स्थलों के साथ ही नदियों और पवित्र कुंडों के विकास का प्रयास किया है। गोमती के उद्गम स्थल का विकास इसी की एक कड़ी है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button