लेखक की कलम

पाकिस्तान पर अन्तरराष्ट्रीय दबाव

पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारों के मुद्दे को लेकर चर्चा के केंद्र में है। यूरोपीय संसद में एक प्रस्ताव लाया गया है, जिसमें पाकिस्तान से उसका जीएसपी प्लस व्यापारिक दर्जा वापस लेने की मांग की गई है। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं, बच्चों और राजनीतिक विरोधियों के अधिकारों का पर्याप्त संरक्षण नहीं हो रहा है। यदि भविष्य में यह प्रस्ताव स्वीकृत होकर लागू होता है, तो इसका पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और यूरोपीय संघ के साथ उसके व्यापारिक संबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
जीएसपी प्लस यानी जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंसेज प्लस यूरोपीय संघ की एक विशेष व्यापारिक व्यवस्था है। इसके अंतर्गत विकासशील देशों को यूरोपीय बाजार में अनेक उत्पादों के निर्यात पर शुल्क में छूट या शून्य शुल्क का लाभ मिलता है। इस सुविधा का उद्देश्य विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, लेकिन इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी जुड़ी होती हैं। लाभार्थी देशों को मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करना होता है।
पाकिस्तान को वर्ष 2014 में यह विशेष दर्जा मिला था। इसके बाद यूरोपीय संघ पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बन गया। विशेष रूप से वस्त्र और परिधान उद्योग को इस व्यवस्था से काफी लाभ हुआ। पाकिस्तान के कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों में जाता है। इसलिए यदि भविष्य में यह सुविधा समाप्त होती है, तो पाकिस्तान के निर्यात, विदेशी मुद्रा आय और औद्योगिक क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
यूरोपीय संसद में प्रस्तुत प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र के सत्यापित आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं विशेष रूप से कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के विरुद्ध अधिक देखने को मिलती हैं। प्रस्ताव में राजनीतिक उत्पीड़न के अलावा धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की नाबालिग लड़कियों के कथित अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और कम उम्र में विवाह जैसे मामलों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
मानवाधिकार संगठनों की विभिन्न रिपोर्टों में भी समय-समय पर पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। हालांकि पाकिस्तान सरकार अक्सर इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती रही है कि उसका संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और सरकार कानून के शासन को मजबूत करने के लिए लगातार कदम उठा रही है।
यूरोपीय संघ लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि जीएसपी प्लस केवल आर्थिक सुविधा नहीं, बल्कि मूलभूत मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के पालन से जुड़ी व्यवस्था है। इसलिए यदि किसी देश में इन मानकों के पालन को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो उसकी समीक्षा की जा सकती है। हालांकि किसी देश का जीएसपी प्लस दर्जा समाप्त करने की प्रक्रिया लंबी और संस्थागत होती है तथा इसके लिए केवल राजनीतिक प्रस्ताव पर्याप्त नहीं होता।
यदि पाकिस्तान का यह विशेष व्यापारिक दर्जा भविष्य में समाप्त किया जाता है, तो उसका सबसे अधिक प्रभाव वस्त्र उद्योग पर पड़ सकता है। यूरोपीय बाजार में पाकिस्तानी उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम हो सकती है, जिससे निर्यात में गिरावट आने की आशंका रहेगी। इससे उद्योग, रोजगार और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ सकता है। पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक चुनौतियों, महंगाई और विदेशी ऋण के बोझ का सामना कर रहा है। ऐसे में व्यापारिक सुविधाओं में किसी भी प्रकार की कमी उसके लिए अतिरिक्त कठिनाइयाँ पैदा कर सकती है।
दूसरी ओर, यूरोपीय संसद के इस कदम को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यह एक राजनीतिक और नैतिक संदेश भी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ मानवाधिकारों के पालन को भी महत्व देता है। लोकतंत्र, कानून का
शासन और नागरिक स्वतंत्रता आज वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।
हालांकि यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि यूरोपीय संसद में किसी प्रस्ताव के आने का अर्थ यह नहीं होता कि वह तुरंत लागू हो जाएगा। अंतिम निर्णय यूरोपीय संघ की संस्थागत प्रक्रिया, सदस्य देशों की राय और यूरोपीय आयोग की समीक्षा के बाद ही लिया जाता है। इसलिए वर्तमान स्थिति को एक संभावित नीति-परिवर्तन के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि अंतिम निर्णय के रूप में।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करना है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को भी बेहतर बनाना है। यदि वह मानवाधिकार, न्यायिक सुधार, महिलाओं की सुरक्षा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के क्षेत्र में प्रभावी कदम उठाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विश्वास मजबूत हो सकता है।
भारत सहित दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। यूरोपीय संघ आज दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है और वह अपने व्यापारिक समझौतों में मानवाधिकार तथा सुशासन जैसे मुद्दों को लगातार अधिक महत्व दे रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में केवल आर्थिक प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और नागरिक अधिकारों की स्थिति भी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों को प्रभावित करेगी।
अंततः, पाकिस्तान के जीएसपी प्लस दर्जे को लेकर यूरोपीय संसद में उठी मांग वैश्विक राजनीति में मानवाधिकारों की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यूरोपीय संघ इस विषय पर क्या अंतिम निर्णय लेता है और पाकिस्तान इन चिंताओं का समाधान करने के लिए क्या कदम उठाता है। यदि सुधारों की दिशा में ठोस प्रयास किए जाते हैं, तो यह न केवल पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करेगा, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिरता और वैश्विक व्यापारिक साझेदारियों को भी दीर्घकालिक लाभ पहुँचा सकता है।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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