लेखक की कलम

हार्मुज संकट का भारत पर भी प्रभाव

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में फिर से भारी संकट खड़ा हो गया है। अमेरिकी हवाई हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद स्थिति बेहद गंभीर हो गई है, जिसका सीधा असर ई ग्लोबल सप्लाई और भारत पर पड़ना शुरू हो गया है। राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर अमेरिका की सैना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर भीषण मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। होर्मुज से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर भी हमले हुए हैं जैसे साइप्रस के जहाज पर हमला, जिसमें भारतीय नाविक भी सवार थे। तनाव के चलते इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन ने जहाजों की सुरक्षित निकासी को फिलहाल स्थगित कर दिया है। दुनिया का लगभग 20 फीसद कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। होर्मुज के अस्थिर होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल-गैस के दाम बढ़ने लगे हैं और भारत में ईंधन की कीमतों और महंगाई पर सीधा दबाव देखने को मिल सकता है।इस स्थिति को लेकर विशेषज्ञ भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण को बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं ताकि तेल संकट से निपटा जा सके
अमेरिका और ईरान के बीच कुछ समय पहले बनी संघर्ष विराम की
स्थिति से दुनिया ने राहत की सांस ली थी और यह उम्मीद जगी थी कि कूटनीति सैन्य टकराव पर विजय पा सकती है और पश्चिम एशिया धीरे-धीरे स्थिरता की ओर लौटेगा, लेकिन हाल की घटनाओं ने इन उम्मीदों को गहरा झटका दिया है। दोनों देशों के बीच फिर से सैन्य कार्रवाई तेज हो गई है और ईरान ने सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा कर दी है। हालांकि समुद्री निगरानी से जुड़े कुछ संगठनों का कहना है कि इसके दक्षिणी हिस्से से सीमित यातायात जारी है, लेकिन जहाजों की आवाजाही अत्यंत जोखिमपूर्ण और सामान्य से बहुत कम हो गई है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा और उसके बाद अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई तेज किए जाने से पूरी दुनिया में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। इस संकट का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। भारत सहित दुनिया की लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मागों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का बड़ा हिस्सा इसी संकरे रास्ते से एशिया, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंचता है। इस मार्ग पर थोड़े समय की रुकावट भी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा कर देती है। यदि यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता घट सकती है। इससे न केवल तेल की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि समुद्री माल दुलाई, बीमा और परिवहन की लागत भी कई गुना बढ़ सकती है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। देश अपनी आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। भारत को मिलने वाले तेल, एलपीजी और एलएनजी का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और उसका परिवहन होमुंज के रास्ते होता है। इस मार्ग में बाधा आने का सीधा अर्थ है कि आपूर्ति में देरी, परिवहन लागत में वृद्धि और ऊर्जा कीमतों पर दबाव। भारत के पास रणनीतिक तेल भंडार जरूर हैं, लेकिन किसी लंबे संकट की स्थिति में वे स्थायी समाधान नहीं हो सकते। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों को एक साथ प्रभावित कर सकती है। सबसे पहला असर रुपये पर पड़ेगा। तेल आयात का बिल बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ेगी और रुपया कमजोर हो सकता है। कमजोर रुपये से केवल तेल ही नहीं, बल्कि मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, उर्वरक और अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी होंगी। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ सकता है और सरकार के आर्थिक प्रबंधन पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। महंगे तेल का दूसरा बड़ा प्रभाव महंगाई के रूप में सामने आएगा। डीजल की कीमत बढ़ने से ट्रकों, बसों और मालवाहक वाहनों का परिचालन महंगा हो जाता है। देश में अनाज, सब्जियां, फल, दूध और उपभोक्ता वस्तुओं का अधिकांश परिवहन सड़क मार्ग से होता है। ऐसे में परिवहन की बढ़ी हुई लागत अंततः आम उपभोक्ता को ही चुकानी पड़ती है। पेट्रोल और डीजल के साथ एलपीजी और औद्योगिक ईंधन महंगे होने से परिवारों के घरेलू बजट और उद्योगों की उत्पादन लागत, दोनों पर असर पड़ेगा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर भारी दबाव बन सकता है। कीमतों में वास्तविक बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय दरों, रुपये की विनिमय दर, केंद्रीय और राज्य करों तथा सरकार की नीति पर निर्भर करेगी। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि ऐसी स्थिति में सरकार को या तो उपभोक्ताओं पर बोझ डालना पड़ेगा अथवा करों में कटौती और सब्सिडी के माध्यम से अपने राजस्व का त्याग करना होगा।
होर्मुज संकट का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दे सकता है। विदेशी निवेशक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती महंगाई के समय जोखिम वाले बाजारों से पूंजी निकालने लगते हैं। तेल महंगा होने से विमानन, परिवहन, पेंट, रसायन, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इससे उनके मुनाफे पर दबाव पड़ेगा और शेयरों में बिकवाली बढ़ सकती है। वहीं तेल खोज और उत्पादन से जुड़ी कुछ कंपनियों को ऊंची कीमतों का लाभ मिल सकता है, लेकिन व्यापक बाजार के लिए महंगा कच्चा तेल सामान्यतः नकारात्मक संकेत होता है। तकनीकी दृष्टि से निफ्टी के लिए 23,800 से 24,000 का दायरा महत्वपूर्ण समर्थन क्षेत्र माना जा रहा है। यदि सूचकांक इसके नीचे जाता है, तो बिकवाली बढ़कर उसे 23,650 के स्तर तक ले जा सकती है। दूसरी ओर, बाजार को फिर मजबूत तेजी पकड़ने के लिए 24,400 से 24,600 का स्तर पार करना होगा। यह दायरा पार होने पर 25,000 की दिशा में बढ़ने की संभावना बन सकती है। बैंक निफ्टी अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दे रहा है, लेकिन उसकी दिशा भी महंगाई, ब्याज दरों और विदेशी निवेश के रुख पर निर्भर करेगी। इसलिए छोटे निवेशकों को अफवाहों के आधार पर जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचना चाहिए।
वैश्विक स्तर पर भी संकट के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। विमानन, शिपिंग, कृषि, निर्माण और विनिर्माण जैसे क्षेत्र ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर हैं। तेल महंगा होने से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ेंगे। कई देशों के केंद्रीय बैंकों को महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है। इससे निवेश और आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। विकासशील और तेल आयातक देशों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा। होमुंज को किसी देश के राजनीतिक या सैन्य दवाव का स्थायी हथियार नहीं बनाया जा सकता। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की साझा जीवनरेखा है। इसे सुरक्षित और खुला रखना केवल अमेरिका, ईरान या खाड़ी देशों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के हित में है। सैन्य कार्रवाई से कुछ समय के लिए दबाव बनाया जा सकता है, लेकिन स्थायी समाधान केवल कूटनीति, सुरक्षा गारंटी और पारस्परिक विश्वास से ही निकलेगा। आज दुनिया इस बात का इंतजार कर रही है कि होमुंज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात कब सामान्य होगा।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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