मौलिक अधिकारों पर सुप्रीम गंभीरता

देश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा को और प्रभावी बनाने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई को संकेत दिया कि वह ऐसे मामलों में, जो किसी व्यक्ति के ’’जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हों, दिन-रात किसी भी समय न्यायालय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक ’’मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने पर विचार करेगा। यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो अवैध हिरासत, देर रात गिरफ्तारी, घरों पर अचानक बुलडोजर कार्रवाई, निर्वासन, पुलिस हिरासत में हिंसा तथा राज्य की अन्य आपात कार्रवाई से प्रभावित नागरिक किसी भी समय न्यायिक राहत प्राप्त कर सकेंगे।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस संबंध में अधिवक्ता महेराविश रीन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया कि वर्तमान समय में कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें देर रात गिरफ्तारियां, सुबह-सुबह ध्वस्तीकरण अभियान, सप्ताहांत या सार्वजनिक अवकाश के दौरान प्रशासनिक कार्रवाई जैसी घटनाएं होती हैं। ऐसी परिस्थितियों में प्रभावित व्यक्ति नियमित न्यायालय समय का इंतजार नहीं कर सकता, क्योंकि तब तक उसके मौलिक अधिकारों का अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी हर समय उपलब्ध होने चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी नागरिक की स्वतंत्रता या जीवन संकट में हो, तो न्याय केवल अदालत खुलने तक स्थगित नहीं रह सकता। संविधान का संरक्षण दिन और रात के आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकता। न्यायपालिका का दायित्व है कि वह हर परिस्थिति में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।
याचिका में यह भी कहा गया कि वर्तमान न्यायिक व्यवस्था मुख्यतः निर्धारित कार्य दिवसों और न्यायालय के नियमित समय तक सीमित है। हालांकि अवकाशकालीन पीठ और कुछ विशेष व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, लेकिन वे पूरे देश में एक समान और व्यवस्थित रूप से लागू नहीं हैं। परिणामस्वरूप अनेक नागरिकों को रात, सप्ताहांत या अवकाश के दौरान तत्काल न्यायिक राहत प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि न्याय तक पहुंच के लिए कार्यालय समय और उसके बाद की व्यवस्था में अंतर होना स्वाभाविक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालतों की नियमित कार्यप्रणाली और आपातकालीन न्यायिक व्यवस्था को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल युग में न्यायालय पूरी तरह बंद नहीं होते। ई-फाइलिंग, ईमेल, पत्र अथवा टेलीफोन के माध्यम से भी न्यायिक प्रक्रिया को सक्रिय किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि आज तकनीक ने न्यायपालिका को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ बना दिया है। किसी गंभीर और आपात मामले में केवल एक ईमेल, पत्र या फोन कॉल भी न्यायिक प्रणाली को सक्रिय करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस पूरी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत स्वरूप देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
याचिकाकर्ता महेराविश रीन ने भी माना कि डिजिटल तकनीक ने न्याय तक पहुंच को आसान बनाया है। ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाओं ने न्यायपालिका को आधुनिक बनाया है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक इन तकनीकी सुविधाओं को एक समान राष्ट्रीय व्यवस्था के रूप में विकसित नहीं किया गया है, जिसके तहत जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत तक 24 घंटे तत्काल पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार की जा सकती है, जिससे आपात मामलों में न्यायिक प्रतिक्रिया का समय काफी कम हो सके। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी नागरिक द्वारा जीवन और स्वतंत्रता से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला प्रस्तुत किया जाता है, तो अदालत की ओर से एक घंटे के भीतर प्रारंभिक प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। उनका यह सुझाव न्यायपालिका को और अधिक उत्तरदायी तथा नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुनवाई के दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि इस प्रकार की एसओपी तैयार करना सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में किया जाना चाहिए, न कि न्यायिक आदेश के माध्यम से। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत की संघीय व्यवस्था में विभिन्न उच्च न्यायालय प्रशासनिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय के अधीन नहीं आते। इसलिए यदि पूरे देश के लिए एक समान व्यवस्था बनानी है, तो संभव है कि इस विषय पर न्यायिक आदेश के माध्यम से ही दिशा-निर्देश जारी करने पड़ें।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की एसओपी लागू होती है, तो भारतीय न्याय व्यवस्था में यह एक ऐतिहासिक सुधार होगा। इससे नागरिकों को किसी भी समय अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। विशेष रूप से अवैध गिरफ्तारी, पुलिस हिरासत, बुलडोजर कार्रवाई, निर्वासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप संभव हो सकेगा।
यह पहल डिजिटल न्याय प्रणाली को भी नई दिशा दे सकती है। यदि एकीकृत ऑनलाइन पोर्टल, आपातकालीन न्यायिक हेल्पलाइन, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और त्वरित न्यायिक समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जाती हैं, तो न्यायपालिका की पहुंच देश के दूर-दराज क्षेत्रों तक भी प्रभावी रूप से सुनिश्चित की जा सकेगी। इससे न्याय केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहकर प्रत्येक नागरिक के लिए अधिक सुलभ बनेगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह विचार भारतीय लोकतंत्र में संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यदि जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों के लिए चैबीसों घंटे न्यायिक पहुंच की व्यवस्था विकसित होती है, तो यह भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी
सुधार साबित हो सकता है। आने वाले समय में इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय देश की न्यायिक व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, त्वरित और नागरिकों के अधिकारों के प्रति उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



