विधायकों की खरीद-फरोख्त

हमारे जनप्रतिनिधि बिकते हैं ? इसमें कितनी सच्चाई है, कहना मुश्किल है लेकिन राज्यों में विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) के आरोप एक गंभीर राजनीतिक समस्या है। यह कथित हॉर्स ट्रेडिंग चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के उल्लंघन के लिए अक्सर विवादों में रहती है। हालांकि दल बदल करने वाले विधायक और सांसद इस बात को कभी स्वीकार नहीं करते। वे जब दल बदलते हैं तब उसे आत्मा की आवाज बताते हैं लेकिन जब उस पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ते हैं तब उसके कसीदे पढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। उनकी पार्टी सरकार बनाने में अगर असफल रहती है अथवा उनको मंत्री पद नहीं मिल पाता अथवा उनकी कोई कमजोर नस केंद्र में बैठी विरोधी दल की सरकार दबाने की धमकी देती है अथवा इसी तरह का कोई और कारण होता है तभी उनकी अंतरात्मा जाग उठती है। सबसे पहले यह अंतरात्मा हरियाणा में जागी थी और आयाराम गयाराम की कहावत शुरू हुई। आयाराम-गयाराम भारतीय राजनीति में दलबदल (पार्टी बदलने) की संस्कृति को दर्शाने वाला एक लोकप्रिय मुहावरा है। इसकी उत्पत्ति 1967 में हरियाणा विधानसभा के तत्कालीन विधायक गया लाल के नाम से हुई थी। गया लाल ने 1967 के चुनावों के बाद केवल 9 घंटे के भीतर तीन बार अपनी पार्टी बदली थी- वे पहले कांग्रेस में शामिल हुए, फिर यूनाइटेड फ्रंट (संयुक्त मोर्चा) में गए और फिर से कांग्रेस में लौट आए। हरियाणा के होडल (हसनपुर) से निर्दलीय विधायक गया लाल ने बार-बार दल बदलकर सरकारों के गिरने और बनने का सिलसिला शुरू किया था। गया लाल के इस व्यवहार पर तत्कालीन कांग्रेस नेता राव वीरेंद्र सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुटकी लेते हुए कहा था कि गयाराम अब आयाराम है। भारतीय राजनीति में लगातार हो रहे इस आयाराम-गयाराम (दलबदल) को रोकने के लिए, अंततः 1985 में राजीव गांधी सरकार के दौरान संविधान में 52वां संशोधन करके दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। इस कानून में दो-तिहाई का प्रावधान कर दलबदल पर सख्ती की गयी। इस सबके बावजूद , दलबदल की प्रथा आज भी भारत में राज्य विधानसभाओं में पाई जाती है, हालांकि पहले की तुलना में अब यह थोकभाव में हो रही है। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। केंद्र से इतर दल की सरकारें हमेशा चैकन्नी रहती हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी ऐसी ही चिंता सता रही है। हालांकि उनके आरोप पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताने के साथ कानूनी नोटिस भी भेजा है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों पर सियासत तेज हो गई है। बीजेपी ने आरोपों को झूठा बताते हुए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है और सात दिनों के भीतर बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग की है।जम्मू-कश्मीर भाजपा के अध्यक्ष सतपाल शर्मा ने हाईकोर्ट के वकील परिमोक्ष सेठ के जरिए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को कानूनी नोटिस भेजा है। यह नोटिस हाल ही में उमर द्वारा लगाए गए आरोपों पर भेजा गया है। उमर ने कहा था कि बीजेपी नेताओं ने सरकार गिराने की कोशिश में नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक को 20-30 करोड़ रुपए और मंत्री पद की पेशकश की थी। उमर अब्दु्ल्ला ने यह टिप्पणी पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए की थी। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में विधायकों को तोड़ने और सरकार गिराने के आरोपों पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला घिर गए हैं।
भाजपा ने उमर अब्दुल्ला से अपने आरोपों को वापस लेने को कहा है। इसके साथ ही, नोटिस मिलने के 7 दिनों के अंदर बिना किसी शर्त के सबके सामने माफी मांगने को भी कहा है। बीजेपी ने चेतावनी दी है कि वे दोबारा इस तरह के आरोपों को नहीं दोहराएं। बीजेपी ने नोटिस में उमर अब्दुल्ला को 100 करोड़ रुपए के मानहानि के मुकदमे की भी चेतावनी दी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भेजे गए कानूनी नोटिस में कहा गया है कि 11 जुलाई को श्रीनगर में एक सम्मेलन के दौरान आपने (उमर अब्दुल्ला) बीजेपी पर झूठे, बेबुनियाद और मानहानिपूर्ण आरोप लगाए। आपने कहा कि बीजेपी के किसी पदाधिकारी ने जम्मू क्षेत्र के कुछ नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों से संपर्क किया और उन्हें बीजेपी में शामिल होने के बदले 20-30 करोड़ रुपए और मंत्री पद का लालच दिया। आपने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी और सुप्रीम कोर्ट के वकील ने विधायकों को रिश्वत की पेशकश की।
नोटिस में सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि आपके लगाए ये आरोप बिना किसी आधार, बिना किसी साक्ष्य और पूरी तरह झूठे हैं। इन्हें आपने जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा से पार्टी की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को धूमिल करने के उद्देश्य से लगाया है। पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की नीयत से झूठे आरोप लगाना कानूनन अपराध है और इसके लिए आप विधिक परिणामों के उत्तरदायी होंगे। आपके ये बयान और कृत्य मानहानि की श्रेणी में आते हैं। इनके विरुद्ध दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
इससे पहले चेन्नई में कथित कैश फॉर डिफेक्शन मामले ने तमिलनाडु की राजनीति में हलचल मचा दी थी। पूर्व मंत्री वी सेंथिल बालाजी को पूछताछ के लिए समन भेजा गया। पुलिस ने सरकार गिराने की कथित साजिश और करोड़ों रुपये के लेनदेन के आरोपों की जांच की।तमिलनाडु के पूर्व मंत्री वी सेंथिल बालाजी से चेन्नई पुलिस ने पूछताछ की। उनसे मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार को अस्थिर करने की कथित साजिश के सिलसिले में पूछताछ की गयी। यह घटनाक्रम उन आरोपों की जांच के बाद सामने आया, जिनमें दावा किया गया था कि राज्य सरकार को गिराने के उद्देश्य से विधायकों को भारी धनराशि का लालच देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई। कृष्णागिरि जिले की उथंगरई विधानसभा सीट से टीवीके विधायक डॉ. इलैयाराजा ने चेन्नई पुलिस आयुक्त अमलराज से शिकायत की थी। विधायक ने आरोप लगाया कि सरकार गिराने की बड़ी साजिश के तहत उन्हें राजनीतिक निष्ठा बदलने के बदले 35 करोड़ रुपये की पेशकश की गई थी। शिकायत के आधार पर पुलिस की एक विशेष टीम ने जांच शुरू की और बाद में कथित साजिश से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों में चुनावी सर्वेक्षण संस्था आईपीडीएस के संस्थापक तिरुनावुक्करासु, थियागराजन और नरेश शामिल हैं, जिन्हें सेंथिल बालाजी का करीबी सहयोगी बताया जा रहा है। इसके अलावा करूर के डीएमके पदाधिकारी रमेश, कार्ति और सेल्वन, मनापक्कम के एआईएडीएमके पदाधिकारी श्रीनिवासन और अस्तीनापुरम के राजेश को भी गिरफ्तार किया गया । जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, आरोपियों ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि टीवीके विधायकों को दल बदलने के लिए कथित तौर पर करीब 180 करोड़ रुपये खर्च करने की व्यापक योजना बनाई गई थी।
उधर, डीएमके ने भी 1 जुलाई को सतर्कता और भ्रष्टाचार विरोधी निदेशालय (डीवीएसी) और तमिलनाडु के राज्यपाल को एक औपचारिक शिकायत सौंपी, जिसमें मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के खिलाफ राजनीतिक दलबदल कराने के कथित प्रयासों के संबंध में एफआईआर दर्ज करने और व्यापक जांच की मांग की गई। डीएमके के संगठन सचिव आर.एस. भारती द्वारा दायर एक याचिका में, पार्टी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री विजय ने मरुमलार्ची द्रविड़ मुन्नेत्र कजगम (एमडीएमके) के महासचिव वाइको के साथ मिलकर दो मौजूदा डीएमके विधायकों- टी.एम. राजेंद्रन (कडायनल्लूर) और एस. सेंथिल सेल्वन (सिरकाझी)- को भ्रष्ट और अवैध तरीकों से अपने विधानसभा पदों से इस्तीफा देने के लिए उकसाने का प्रयास किया।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



