अध्यात्म

सामाजिक सरोकार से जुड़ी देवशयनी एकादशी

भारतीय परम्परा: पर्व और त्यौहार-हमारी भारतीय परम्परा के अनुसार समय-समय पर तीज-त्यौहार मनाए जाते हैं। बदलते मौसम की बात हो या नई फसल का आगमन हो हमारे समाज में हर बदलते वक्त में उत्सव मनाने की संस्कृति रही है। इन पर्व और त्यौहारों को धर्म से जोड़कर नियमानुसार मनाए जाने के पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि लोग इन नियमों का सख्ती से पालन करें। भारत को त्यौहार की भूमि भी कहा जाता है। सह-अस्तित्व की गौरवशाली परम्परा वाले हमारे देश के प्रत्येक राज्य, धर्म और समुदाय विभिन्न त्यौहार मनाते हैं जो देश की सांस्कृतिक विविधता में एकता को दर्शाता है। यह एकादशी हिन्दू माह अषाढ़ के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं चंद्र तिथि को मनाई जाती है। इस एकादशी को विष्णु को मनाने वाले वैष्णव पवित्र तिथि मानते हैं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इसी दिन से विष्णु जी की निद्रा शुरू होती है जो फिर देवोत्थान एकादशी पर जाग्रत होते हैं। प्रत्येक वर्ष में 24 एकादशी होती हैं। अधिक मास में इनकी संख्या 26 हो जाती है। इस तिथि को ‘पद्यनाभ’ भी कहा जाता है।
प्रत्येक त्यौहार के पीछे वैज्ञानिक आधार- यहाँ हम हरिशयनी एकादशी पर विस्तृत चर्चा करेंगे। हमारे सभी त्यौहार मौसम से जुड़े होते हैं। हरिशयनी या देवशयनी एकादशी जुलाई यानी बरसात के मौसम में होती है। कहते हैं सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है। इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं तथा फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें उठाया जाता है। इसी को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। इसके बीच के अन्तराल को चातुर्मास कहा जाता है। इन्हीं चार महीनों में बरसात के मौसम को देखते हुए खान-पान और यात्रा के प्रति सचेत किया जाता है। इस मौसम में पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है इसीलिए पेट की बीमारियां जल्दी पकड़ती हैं। यही कारण है कि इस मौसम में कुछ खास पदार्थों का सेवन करने की मनाही होती है तथा अनावश्यक यात्राओं से भी रोका जाता है। इन दिनों में क्योंकि हरि सो रहे हैं अतः शुभ कार्य करने का भी इस समय में निषेध होता है। इसके पीछे भी यही कारण है क्योंकि हमारे संरक्षक विष्णु भगवान सोए हैं अतः हमारी रक्षा के लिए पृथ्वी पर कोई नहीं है। इस तरह आस्था और धर्म से जोड़कर हमें नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है। भगवान के वामन अवतार और राजा बलि से उसका कुछ भोग लेने पर पाताल निवास करने तथा पाताल में भगवान विष्णु का चैकीदार बनकर रहने की कथा सामाजिक सरोकारों का पालन करने के लिए ही सृजित की गई है। इन दिनों में तपस्वी भी भ्रमण नहीं करते हैं बल्कि वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं। इन दिनों में केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है। क्योंकि मान्यता है कि इन चार महीनों में भू-मण्डल के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं।
हरिशयनी एकादशी से जुड़ी कुछ लोक कथाएं-पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से देवशयनी एकादशी के महत्व के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि सतयुग में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। उनके राज्य में बारिश न होने के कारण अनेक वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ गया था जिसके परिणाम स्वरूप प्रजा तो दुःखी हुई ही साथ ही अन्न के अभाव में यज्ञ कर्म भी बंद हो गए। प्रजा को कष्ट में देखकर राजा व्याकुल हो गए और इस संकट को दूर करने का उपाय खोजते हुए महर्षि के आश्रम में पहुंचे। ऋषि ने राजा मान्धाता को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी हरिशयनी एकादशी का व्रत रखने के लिए कहा। ऋषि के निर्देशानुसार राजा ने विधि-विधान से इस व्रत को किया। कहते हैं श्रृद्धा और आस्था के साथ किये गए इस व्रत के परिणामस्वरूप राज्य में खूब बारिश हुई और चारों ओर खुशहाली लौट आई।
चातुर्मास के महत्व की एक और कथा-देवशयनी एकादशी से सम्बन्धित एक और महत्वपूर्ण प्रसंग पुराणों में मिलता है। एक बार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर असुरराज बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी, तब भगवान विष्णु के आग्रह पर दैत्यराज बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया था। प्रभु दैतराज बलि के त्याग और समर्पण से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा। राजा बलि ने वरदान के रूप में भगवान से हमेशा अपने सामने रहने की प्रार्थना की। वचनबद्ध होने के कारण हरि पाताल लोक में बलि के द्वार पर पहरा देने लगे। इससे माँ लक्ष्मी चिन्तित हो गईं और उन्होंने इसका कारण जानना चाहा। लक्ष्मी जी को उत्तर देते हुए भगवान ने बताया कि वे आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधनी एकादशी) तक चार माह के लिए राजा बलि के यहां पाताल लोक में चले जाते हैं और वहां विश्राम करते हैं। इसे प्रभु की योगनिद्रा भी कहते हैं। कहा जाता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वार गये आदेश का पालन करते हुए तीनों देवता चार-चार माह पाताल में निवास करते हैं। भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक, भगवान शिव महाशिवरात्रि तक तथा ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवोत्थानी एकादशी तक पाताल में निवास करते हैं।
व्रत और नियम-संयम का महत्व-लोक मान्यता है कि इस दिन उपवास करके श्री हरि विष्णु की सोना, चांदी, तांबा या पीतल की मूर्ति बनवाकर उसका षोडशोपचार सहित पूजन करके पीताम्बर आदि से विभूषित कर सफेद चाद से ढके गद्दे, तकियए वाले पलंग
पर उन्हें शयन करवाना चाहिये।
श्रद्धालुओं को चाहिये कि इन चार महीनों के लिए अपनी पसन्द की कुछ चीजों का त्याग करें।
मधुर स्वर के लिए गुड़ का दीर्घायु या पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करें। कहा जाता है कि इसकी कथाओं को सुनने और पढ़ने मात्र से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इन चातुर्मास में विवाह,
मुंडन गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। इस चार महीनों के दौरान सात्विक जीवन, भूमि पर शयन और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व है।
अपने अन्तर्मन में झांकने का अवसर है यह व्रत-हरिशयनी एकादशी हमें अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देती है। कहते हैं जब व्यक्ति बाह्य आकर्षणों व्यस्तताओं और मानसिक तनाव से दूरी बनाता है तभी वह अपनी वास्तविक क्षमताओं को समझ पाता है और उनका विकास करता है। यही वजह है कि इस चतुर्मास के समय को आत्ममंथन, आत्मसुधार और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल माना जाता है।
चातुर्मास की प्राचीन परम्परा-प्राचीन काल में ऋषि, मुनि, संत आदि उपदेश देने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे। इन चार महीनों मे ंएक स्थान पर रहकर ही स्वाध्याय करने के लिए कहा गया है क्योंकि इन दिनों यात्रा का निषेध है।
आन्तरिक अशुद्धियों को दूर करने का समय-यह चार महीने हमारे आन्तरिक परिष्कार के हैं। क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, अहंकार और असत्य जैसे दोषों का परित्याग करके अपने व्यक्तित्व में त्याग, करुणा, धैर्य, सत्यनिष्ठा, विनम्रता आदि सद्गुणों को अपनाने की साधना करने के लिए यह चार महीने अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। बाहरी व्रत पूजा तभी सच्चे अर्थों में फलित होते हैं जब हमारी अन्तरात्मा और व्यवहार का भी शुद्धिकरण हो।
भागती दुनिया में चातुर्मास की प्रासंगिकता- आज की भागदौड़ की जिन्दगी में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के तनाव से गुजर रहा है। ऐसे समय में देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें संदेश देता है कि वास्तविक उन्नति या विकास भौतिक उपलब्धियों से नहीं अपितु, मानसिक संतुलन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से होता है। इन चार महीनों में यदि हम अपने विचारों
और व्यवहार को सकारात्मक, संवेदनशील और अनुशासित बनाने की प्रतिज्ञा करें तो यही प्रभु की सच्ची आराधना होगी और इस पर्व की भी यही सच्ची सफलता होगी। (कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

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