पश्चिम बंगाललेखक की कलम
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बिछड़े सभी बारी-बारी…

मैंअकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर,
लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया।

मजरुह सुल्तानपुरी का यह शेर कभी जुझारू नेता ममता बनर्जी को बहत रास आया था जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनायी थी। उन्होंने अपने उसी कारवां के बल पर वामपंथियों के सबसे मजबूत किले को पश्चिम बंगाल में ढहा दिया और डेढ़ दशक तक सत्ता संभाली। ममता बनर्जी को इसके बाद वक्त के बदले मिजाज का सामना करना पड़ रहा है। उनकी पार्टी को 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से पराजय का सामना करना पड़ा।

ममता बनर्जी को चुनाव के समय झटका

इतना ही नहीं, अपने सबसे मजबूत गढ़ भवानीपुर से वह स्वयं चुनाव हार गयीं। उनको कभी विश्वस्त साथी रही शुभेन्दु अधिकारी ने उन्हें विधायक भी नहीं बनने दिया। इतना ही नहीं उनके वफादार विधायक और सांसद भी एक-एक कर उनका साथ छोड़ते चले गये। विपक्ष की सबसे मजबूत नेता मानी जाने वाली ममता बनर्जी का कुनबा बिखर गया है और यह सिलसिला क्षमता भी नजर नहीं आ रहा है। अभी ताजा मामला राज्य सभा सदस्य और अभिनेत्री कोयल मलिक उर्फ रुक्मिणी का है।

उन्होंने 16 जुलाई को राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया है। जाहिर है उनकी मंजिल भी वही होगी जो तृणमूल के 24 सांसदों और 60 विधायकें की है।
तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य और बंगाल की जानी-मानी अभिनेत्री कोयल मलिक उर्फ रुक्मिणी ने 16 जुलाई को अपनी उस नेता से किनारा करते हुए राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया जिनको वह अपना आदर्श मानती थीं। ममता बनर्जी की वह विश्वस्त नेता थीं। ममता बनर्जी की सत्ता चली गयी तो नेताओं की विश्वसनीयता भी बदल गयी। टीएमसी के सत्ता से बाहर होने के बाद कोयल मलिक इस्तीफा देने वाली चैथी सांसद हैं।

तृणमूल कांग्रेस

कोयल ने राज्य सभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन से मुलाकात कर 16 जुलाई को इस्तीफा सौंपा था। अब राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की संख्या घटकर नौ रह गयी है। बताया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ अन्य सांसदों की तरह ही कोयल मलिक ने भी इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में भाजपा नेता भूपेन्द्र यादव से मुलाकात की थी। इससे उनके भी भाजपा या बागी सांसदों के गुट में शामिल होने की संभावना तेज हो गयी थी।

लोकसभा में भी ममता बनर्जी के साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया है। चार लोकसभा सदस्यों के इस्तीफे के बाद तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में सिर्फ 8 सांसद रह गये हैं। सुदीप वंदोपाध्याय और काकली घोष दस्तीदार जैसे 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर एनसीपीआई का गठन किया है। एनसीपीआई ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए को समर्थन भी दे दिया है। यह भी कहा जा रहा है कि अभी कुछ और सांसद भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ सकते हैं।

तृणमूल के विधायकों ने भी थोक के भाव में ममता बनर्जी का साथ छोड़ा है। पार्टी के 80 में से 60 विधायक बागी होकर अपना नेता ऋतव्रत मुखर्जी को बना चुके हैं और वे कहते हैं कि असली तृणमूल कांग्रेस पार्टी उन्हीं की है। ममता बनर्जी के दर्द को समझना बहुत मुश्किल है। इसके बाद भी वह कहती हैं कि जो लोग केन्द्रीय एजेन्सियों या पुलिस के दबाव में हैं वे खुशी-खुशी जहां चाहें जा सकते हैं। एक कलाकार के रूप में मैं कोयल मलिक का सम्मान करती हूं और इस्तीफा सौंपने के लिए उनका धन्यवाद करती हूं। ममता बनर्जी की यह मुस्कान भी उसी तरह है-

तुम इस तरह जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।

ममता बनर्जी ने छात्र जीवन से ही राजनीति का सफर शुरू कर दिया था। छात्र राजनीति के बाद ममता ने कांग्रेस का दामन थामा और राजनीति के मंच पर एक सशक्त और निडर नेता के रूप में उभरीं। वह 1984 में पहली बार कांग्रेस की सांसद बनीं। कांग्रेस की नीति रूस और चीन के चलते वामपंथियों से साफ्ट कार्नर की थी और यह बात ममता बनर्जी को पंसद नहीं थी। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार की जमकर आलोचना करती थीं।

हालत यहां तक आ गये कि 1990 में वाम मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने उन्हें बुरी तरह पीट दिया था। वे रक्त रंजित हालत में ही दिल्ली में संसद भवन पहुंची थीं। कांग्रेस से ज्यादा अन्य दलों ने ममता बनर्जी से सहानुभूमि दिखाई। इस प्रकार धीरे-धीरे ममता बनर्जी को यह लगने लगा कि कांग्रेस में रहना उनके इस संघर्ष में बाधा डाल रहा है।

 

उनका मानना था कि कांग्रेस आला कमान पश्चिम बंगाल में उनके वाम-विरोधी आंदोलन को जान बूझकर रोकना चाहता है। इसका एक कारण यह भी था कि राष्ट्रीय राजनीति और संसद में कांग्रेस सरकार को वामपंथियों का समर्थन लेना पड़ रहा था। इसलिए पार्टी नेतृत्व को सीधे चुनौती देते हुए वह बगावत पर उतर आयीं। कांग्रेस ने ममता बनर्जी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

ममता बनर्जी इसके लिए लगभग तैयार थीं और उन्होंने मुकुल राॅय जैसे नेताओं के साथ मिलकर एक जनवरी 1998 को आधिकारिक तौर पर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की। ममता बनर्जी अकेले ही चली थीं लेकिन लोग साथ आते गये और कारवां बन गया। पश्चिम बंगाल में 2014 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चढ़ाई की और माकपा के 34 वर्ष के शासन का अंत कर दिया। वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह गया। इस चुनाव में टीएमसी गठबंधन को 227 विधायक मिले थे। ममता बनर्जी की पार्टी (टीएमसी) को अकेले 187 सीटें मिलीं।

इसका मतलब ममता बनर्जी कांग्रेस की मदद के बिना भी सरकार बना सकती थीं। ममता बनर्जी इसके बाद भी लगातार दो बार अपनी पार्टी की सरकार बनाने में सफल रहीं। ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस छोड़कर टीएमसी बनायी थी और 1999 में एनडीए के साथ लोकसभा चुनाव लड़ा और 8 सांसद जुटाए। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने उन्हें रेलमंत्री बनाया था।

टीएमसी और बीजेपी के बीच का यह गठबंधन दोनों के लिए फायदे का सौदा था। ममता को वामपंथियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय कंधा मिल गया था, तो वहीं भाजपा को उस बंगाल में पैर जमाने का मौका मिला, जहां उसका जनाधार न के बराबर था। यह दोस्ती बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने वाली थी लेकिन यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चल सकी।

2001 में तहलका स्टिंग ऑपरेशन के बाद जब भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का नाम रिश्वत के मामले में आया, तो ममता ने इसे अपनी ईमानदारी साबित करने का मौका माना। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी चप्पल हवा में लहराते हुए कहा कि पद उनके लिए इन चप्पलों से भी छोटा है।

यह कहते हुए वह एनडीए से अलग हो गईं। रास्ते अलग होने के बावजूद सिंगूर में जमीन अधिग्रहण और नंदीग्राम में रासायनिक हब को लेकर छिड़े जन-आंदोलनों में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह उस समय ममता बनर्जी के साथ खड़े आये।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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