
गुरु की महिमा
भारतीय साहित्य में गुरु को इस भौतिक संसार और परमात्मा के मध्य सेतु कहा गया है। हमारी संस्कृति में भी गुरु के महत्व को बताते हुए कहा गया है कि संसार में हमारे जन्म का कारण भले ही माता-पिता होते हैं लेकिन मनुष्य को जीवन का सही अर्थ समझाने और ज्ञान देने का काम गुरु ही करते हैं। एक अच्छा गुरु सांसारिक ज्ञान के साथ ही मोक्ष की ओर अग्रसर होने वाले पथ के प्रदर्शक भी होते हैं। माता-पिता की भाँति ही गुरू हमें हमारी खूबियों को समझकर तराशने का काम करते हैं। शास्त्रों में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए बताया है ‘गु’ का अर्थ बताया गया है अन्धकार और ‘रू’ का अर्थ है निरोधक। यानी जो अन्धकार को हटाकर हमें प्रकाश में ले जाता है वही गुरू है।
रौद्र संवत्सर का राजा गुरु
कब क्यों मनाते हैं गुरू पूर्णिमा
अषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन की पूजा का विधान है। यह पर्व वर्षा ऋतु में आता है और देवशयनी एकादशी के बाद आता है अतः इस समय में चातुर्मास प्रारंभ हो गया होता है इसलिए साधु-संत भी भ्रमण बंद करके एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान बांटते हंै। मौसम की दृष्टि से यह समय सर्वश्रेष्ठ होता है। इसीलिए यह वक्त अध्ययन और शिक्षा के लिए उपयुक्त माना जाता है। कहते हैं जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल मिलती है, वैसे ही गुरु के समक्ष उपस्थित होने उन्हें प्रणाम करने से साधकों को भी ज्ञान, शान्ति, भक्ति और यौगिक शक्ति प्राप्त करने की सार्मथ्य हासिल होती है।
महाभारत के रचयिता व्यास से सम्बन्ध
इसी दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्मदिन भी होता है। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की रचना की थी। इसी कारण उनका नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदि गुरू भी कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था वे कबीरदास जी के शिष्य थे।
गुरु और गुरू पूर्णिमा का महत्व
भारतीय परम्परा में गुरु पूर्णिमा एक पवित्र पर्व है। इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन अन्न दान भी किया जाता है। मान्यता है कि अन्न दान करने से साधकों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के अनुसार इन दिन सभी को स्नान-ध्यान करने के बाद गुरू के पास जाकर विधि-विधान से उनका सम्मान करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना चाहिये। गुरू पूर्णिमा को आषाढ़ी पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह दिन गुरुओं को समर्पित होता है, जिन्होंने हमें ज्ञान, संस्कार और सही दिशा दिखाई है, इसी पवित्र तिथि में महर्षि वेद व्यास जी का जन्म भी हुआ इसलिए कुछ लोग इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन गुरुजनों का पूजन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
महर्षि वेद व्यास का जन्मदिन है गुरु पूर्णिमा
लोक मान्यता है कि भगवान ने जीव तो बहुत बनाये हैं न जाने कितनी ही योनियाँ हैं जो अपने कर्मफल का भोग करने के लिए जन्म लेती हैं लेकिन कहते हैं मनुष्य मात्र का जन्म मोक्ष की प्राप्ति के लिए होता है। बारम्बार जन्म और मृत्यु के क्रम से मुक्ति पाने का अवसर मनुष्य के रूप में ही मिलता है और इस रास्ते पर ले जाने का कार्य गुरू करता है। स्कूल में शिक्षा देने वाला ही गुरू नहीं बल्कि हमें ज्ञान के सद्मार्ग पर ले जाने वाला ही असली गुरू होता है। इस दृष्टि से देखें तो माता-पिता, भाई-बहन और पड़ोसी भी यदि हमें अच्छी शिक्षा देते हैं तो वे हमारे गुरू ही हैं। गुरू का ऋण हमारे ऊपर बना रहता है अतः हमें सभी बड़ों के साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार करना चाहिए और समय-समय पर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित कर उनका स्नेहाशीर्वाद प्राप्त करते रहना चाहिये। गुरू पूर्णिमा का पर्व हमें यही शिक्षा देता है।
गुरू, गुरू पर्व और कहानियाँ
हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि (29 जुलाई, बुधवार) को गुरू पूर्णिमा का पावन पर्व है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही स्नान, ध्यान और दान का महत्व है। अज्ञान रूपी अन्धकार को हटाकर ज्ञान के प्रकाश के उदय का दिन है यह और यह कार्य गुरू ही करता है। इसलिए हमारे धार्मिक ग्रन्थों में गुरु का स्थान भगवान के बराबर माना गया है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-
‘‘बंदऊँ गुरू पद पदुम परागा, सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।
अमिय मूरिमय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू।।’’
अर्थात मैं गुरु के चरण कमल की रज की वंदना करता हूँ, जो सुन्दर, सुरुचि और सुगंध के प्रेम रस से भरी है। यह चरण-रज मेरे लिए उस संजीवनी बूटी के समान है जो हमारे जन्म-मरण और संसार के सभी कष्टों को पूरी तरह से मिटा देती है। कबीर गुरू के स्थान को ईश्वर से भी ऊँचा दिखाते हुए कहते हैं-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागों पाय।
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।।
कबीर कहते हैं गुरू ने ही मुझे हरि की प्राप्ति का रास्ता दिखाया है तभी मैं गुरू पर न्योछावर जाता हूँ। वे कहते हैं, सद्गुरू की कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार सम्भव है। कबीर कहते हैं गुरू की कृपा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। तुलसीदास जी तो यहाँ तक कहते हैं कि-
गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई।
जौ बिरंचि संकर सम होई।।
अर्थात भले ही कोई भगवान श्ंाकर के समान ही क्यों न हो किन्तु गुरू के बिना भव सागर पार नहीं किया जा सकता। तुलसीदास ने रामचरित मानस के अनेक प्रसंगों में गुरु महिमा का गान किया है। गुरू महिमा को स्वीकार करने वालों में शब्दों की नहीं भाव की प्रधानता होती है। क्योंकि गुरू ज्ञान का सागर है अतः उनके समक्ष समर्पण की जरूरत होती है। गुरू पूर्णिमा की तिथि हमें वह अवसर प्रदान करती है जब हमे अपने गुरू के प्रति सम्मान, सत्कार और अन्य आदर-भाव प्रदर्शित कर सकते हैं।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



