अध्यात्म

(भाग-3) दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

 

विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों ने अपने-अपने स्तर पर आज़ादी की इस मशाल को जलाए रखने का काम किया। स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत बंगाल से शुरू होकर पूरे देश में फैली जिसने आगे चलकर एक सशक्त मुखर क्रांति का स्वरूप ग्रहण किया। यह आंदोलन एक निरन्तर होने वाले वैचारिक विकास के रूप में जाना गया। इस दौरान जो साहित्य रचा गया जो कविताएं लिखीं गईं वे सभी शिल्प और संवेदना दोनों के स्तर पर उच्चकोटि की थीं। यह सच है कि देश की आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हमारे देश में तत्कालीन प्रबुद्ध कलमकारों ने अपने उत्पीड़न की परवाह न करते हुए जन मानस को सचेत करने, उनमें आततायी विदेशी शासन के कारनामों की पोल खोलने तथा लोगों में जन जागृति की भावना विकसित करने के लिए अपनी लेखनी का अच्छा उपयोग किया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जो सामाजिक साहित्य उस समय रचा गया वह सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था, क्योंकि उन्हें डर था कि लोग बहुत तेजी से उनके विरुद्ध उठ खड़े हों सकते हैं। ये सभी रचनाएं हमारे अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। इस प्रतिबन्धित साहित्य से नई पीढ़ी का परिचय कराना भी हमारा नैतिक दायित्व है जिसकी शुरुआत हम जल्दी ही करेंगे। जिसके प्रथम चरण में हम प्रेमचंद की पुस्तक ‘सोज़े वतन’ से ही दूसरी कहानी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

“दिलफिगार, नादान दिलफिगार, यह क्या बुजदिलों जैसी हरकत है! तू मुहब्बत का दावा करता है और तुझे इतनी भी खबर नहीं कि मजबूत इरादा मुहब्बत के रास्ते की पहली मंजिल है? मर्द बन और यूँ हिम्मत न हार। पूरब की तरफ एक
देश है जिसका नाम हिन्दोस्तान है, वहाँ जा और तेरी आरजू पूरी होगी।” यह कहकर हजरत खिज्र गायब हो गये। दिलफिगार ने शुक्रिये की नमाज अदा की और ताजा हौसले, ताजा जोश और अलौकिक सहायता का सहारा पाकर खुश-खुश पहाड़ से उतरा और हिन्दोस्तान की तरफ चल पड़ा। मुद्दतों तक काँटों से भरे हुए जंगलों, आग बरसाने वाले रेगिस्तानों, कठिन घाटियों और अटल पर्वतों को तय करने के बाद दिलफिगार हिन्द की पाक सरजमीन में दाखिल हुआ और एक ठंडे पानी के सोते में सफर की तकलीफें धोकर थकान के मारे नदी के किनारे लेट गया।
शाम होते-होते वह एक चटियल मैदान में पहुँचा, जहाँ बेशुमार अधमरी और बेजान लाशें बिना कफन के पड़ी हुई थीं। चील-कौए और वहशी दरिंदे मरे पड़े थे और सारा मैदान खून से लाल हो रहा था। यह डरावना दृश्य देखते ही दिलफिगार का जी दहल गया। या खुदा, किस मुसीबत में जान फँसी! मरने वालों का कराहना, सिसकना और एड़ियाँ रगड़कर जान देना, दरिंदों का हड्डियों को नोचना और गोश्त के लोथड़ों को लेकर भागना ऐसा हौलनाक सीन दिलफिगार ने कभी न देखा था।
यकायक उसे ख्याल आया। यह लड़ाई का मैदान है और ये लाशें सूरमा सिपाहियों की हैं। इतने में करीब से कराहने की आवाज आयी। दिलफिगार उस तरफ फिरा तो देखा कि एक लंबा-तगड़ा आदमी, जिसका मर्दाना चेहरा जान निकलने की कमजोरी से पीला हो गया है, जमीन पर सिर झुकाये पड़ा हुआ है। सीने से खून का फव्वारा जारी है, मगर अब तक तलवार की मूठ पंजे से अलग नहीं हुई।
दिलफिगार ने एक चीथड़ा लेकर घाव के ऊपर रख दिया ताकि खून रुक जाये और बोला- “ऐ जाँबाज, तू कौन है?”
जाँबाज ने आँखें खोलकर वीरों की तरह कहा-
“क्या तू नहीं जानता मैं कौन हूँ? क्या तूने आज इस तलवार की काट नहीं देखी? मैं अपनी माँ का बेटा और भारत का सपूत हूँ।”
यह कहते-कहते उसकी ललकार फिर जाग उठी। पीला चेहरा गुस्से से लाल हो गया और आबदार शमशीर फिर अपना जौहर दिखाने के लिए चमक उठी। दिलफिगार समझ गया कि यह इस वक्त मुझे दुश्मन समझ रहा है, नरमी से बोला-
“ऐ जाँबाज, मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ। अपने वतन से निकला हुआ एक गरीब मुसाफिर हूँ। इत्तफाक से भटकता यहाँ आ निकला। बराय मेहरबानी मुझसे यहाँ की कुल कैफियत बयान करो।”
यह सुनते ही घायल सिपाही बहुत मीठे स्वर में बोला-“अगर तू मुसाफिर है तो आ मेरे खून से तर पहलू में बैठ जा, क्योंकि यही दो अंगुल जमीन है जो मेरे पास बाकी रह गयी है और जो सिवाय मौत के कोई नहीं छीन सकता।
अफसोस है कि तू यहाँ ऐसे वक्त में आया जब हम तेरा आतिथ्य-सत्कार करने के योग्य नहीं। हमारे बाप-दादा का देश आज हमारे हाथ से निकल गया और इस वक्त हम बेवतन हैं। मगर हमने हमलावर दुश्मन को बता दिया कि राजपूत अपने देश के लिए कैसे बहादुरी से जान देता है।
यह आस-पास जो लाशें तू देख रहा है, ये उन लोगों की हैं जो इस तलवार के घाट उतरे हैं।”
(मुस्कराकर)-“और जो कि मैं बेवतन हूँ, मगर गनीमत है कि दुश्मन की जमीन पर मर रहा हूँ।”
(सीने के घाव से चीथड़ा निकालकर)
“क्या तू यह मरहम रख देगा? खून निकलने दे। इसे रोकने से क्या फायदा? क्या मैं अपने ही देश में गुलामी करने के लिए जिन्दा रहूँ? नहीं, ऐसी जिन्दगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।”
जाँबाज की आवाज मद्धिम हो गयी। अंग ढीले पड़ गये। खून इतना ज्यादा बह चुका था कि खुद-ब-खुद बन्द हो गया। रह-रहकर एकाध बूँद टपक पड़ती थी। आखिरकार सारा शरीर बेदम हो गया, दिल की हरकत बन्द हो गयी और आँखें मुँद गयीं।
दिलफिगार ने समझा अब काम तमाम हो गया कि मरने वाले ने धीरे से कहा-
“भारतमाता की जय!”
और उसके सीने से खून का आखिरी कतरा निकल पड़ा। एक सच्चे देशप्रेमी और देशभक्त ने देशभक्ति का हक अदा कर दिया।
दिलफिगार पर इस दृश्य का बहुत गहरा असर पड़ा और उसके दिल ने कहा-“बेशक दुनिया में खून के इस कतरे से ज्यादा अनमोल चीज कोई नहीं हो सकती।”
उसने फौरन उस खून की बूँद को, जिसके आगे यमन का लाल भी हेच है, हाथ में ले लिया और उस दिलेर राजपूत की बहादुरी पर हैरत करता हुआ अपने वतन की तरफ रवाना हुआ।
आखिरकार बहुत दिनों के बाद रूप की रानी मलका दिलफरेब की ड्योढ़ी पर जा पहुँचा और पैगाम दिया कि दिलफिगार सुरखरू और कामयाब होकर लौटा है। दिलफरेब ने उसे फौरन हाजिर होने का हुक्म दिया।
खुद हँसते-हँसते सुनहरे पर्दे की ओट में बैठी और बोली-
“दिलफिगार, अबकी तू बहुत दिनों के बाद वापस आया है। ला, दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज कहाँ है?” दिलफिगार ने मेहँदी-रची हथेलियों को चूमते हुए खून का वह कतरा उस पर रख दिया और उसकी पूरी कैफियत पुरजोर लहजे में कह सुनायी।
यकायक वह सुनहरा पर्दा हट गया और दिलफिगार के सामने हुस्न का एक दरबार सजा हुआ नजर आया, जिसकी एक-एक नाजनीन जुलैखा से बढ़कर थी। दिलफरेब बड़ी शान के साथ सुनहरी मसनद पर सुशोभित हो रही थी।
दिलफिगार हुस्न का यह तिलिस्म देखकर अचम्भे में पड़ गया। दिलफरेब मसनद से उठी और कई कदम आगे बढ़कर उससे लिपट गयी। गानेवालियों ने खुशी के गाने शुरू किये, दरबारियों ने दिलफिगार को नजरें भेंट कीं और चाँद-सूरज को बड़ी इज्जत के साथ मसनद पर बैठा दिया।
जब वह लुभावना गीत बन्द हुआ तो दिलफरेब खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर दिलफिगार से बोली,
“ऐ जाँनिसार आशिक दिलफिगार! मेरी दुआएँ बर आयीं और खुदा ने मेरी सुन ली और तुझे कामयाब व सुरखरू किया। आज से तू मेरा मालिक है और मैं तेरी लौंडी!”
यह कहकर उसने एक रत्नजटित मंजूषा मँगायी और उसमें से एक तख्ती निकाली, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ था-
“खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।” -क्रमशः

 हिफी डेस्क-हिफी फीचर

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