मिट्टी के बर्तन और दीवाली

एक गांव में एक गरीब परिवार रहता था। वह उसका बेटा-बेटी उसकी पत्नी और उसके माता-पिता भी सभी मिलकर मिट्टी के बर्तन बनाने का काम किया करते थे। आज से लगभग दस साल पहले लोग गमले, घड़े, सुराही और कुछ खिलौने जो यह परिवार मिलकर बनाता था, उसे लोग कभी-कभी खरीद लिया करते थे उनकी जिन्दगी चल रही थी पर समय बदला और लोगों को इन मिट्टी से बने बर्तनों और अन्य चीजों में कोई रुचि नहीं रह गई। यह परिवार दीपावली पर खूब सारे दिये बनाता सजावटी खिलौने, मिट्टी के बर्तन बनाता और इन्तजार करता कि दीपावली पर इस बार खूब बिक्री होगी मगर पता नहीं क्या हो गया है लोगों को कि वे बिजली के रंगीन झालरों से घर को सजाना ज्यादा अच्छा समझने लगे हैं। मिट्टी के बने दीपक तो कोई खरीदता ही नहीं है।
मयंक अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था जो उसी गांव में रहता था। पांच साल पहले वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिये बंगलौर गया था। उसके माता-पिता और उसकी बहन इस साल बहुत खुश थे कि मयंक अपनी पढ़ाई पूरी करके इस वर्ष घर वापस आ रहा था और इस साल दीपावली सभी गांव में एक साथ मनायेंगे। मयंक की मम्मी ने भी बिजली की झालरों से घर सजाना शुरू कर दिया था। तभी मयंक की गाड़ी आकर रुकी और सब खुशी से उछल पड़े। गाड़ी को भेजने के बाद मयंक मम्मी से पूछता है मम्मी क्या आप दिये और मिट्टी के खिलौने लेने नहीं चलेंगी मम्मी कहती हैं, बेटा मैं तो देखो ये रंगीन झालरें लाई हूँ बस एक बार लगा दो और जलती रहती है। दीपकों के तेल बत्ती का खर्च भी बढ़ता है और फिर हवा चल गई तो दीपक जलाना भी मुश्किल लगता है। मयंक बड़े ध्यान से मम्मी की बात सुन रहा था वो कहता है नहीं मम्मी चलो हम सब चलते हैं वो जो कुम्हार चाचा की दुकान है न वहाँ देखते हैं। बचपन में आप वहीं से तो दीये लाती थीं। ‘‘हाँ बेटा, पर अब तो सभी यही बिजली की झालर ही लगाते हैं। चलो मम्मी जल्दी से तैयार हो जाओ, गुड़िया को भी बोलो, पापा आप भी चलो’’ वह सबसे चलने की ज़िद करता है। सब लोग तैयार होकर कपड़े के झोले लेकर घर से निकलते हैं और कुम्हार की दुकान पर पहुंच जाते हैं।
कुम्हार के बच्चे और उनकी बूढ़ी दादी मयंक को पहचान जाती हैं बहुत खुश होती हैं सबको देखकर। कुम्हार का बेटा और बेटी सभी दौड़-दौड़ कर अपने सजावटी खिलौने गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियाँ और दीये दिखाने लगते हैं। मयंक आगे बढ़कर बच्चों के हाथ से खूब सारे दीपक, मिट्टी के बर्तन और रंगीन गणेश लक्ष्मी की मूर्ति खरीदता है वो जितने पैसे बताते हैं उतने उनको बिना कम कराये दे देता है। सभी बहुत खुश हैं, लौटते हैं घर की तरफ। घर को दीयों से सब मिलकर सजाते हैं घर बहुत सुन्दर लग रहा है मयंक मम्मी से कहता है मम्मी देखो जितने सुन्दर लग रहे हैं दीपक और देखो कुम्हार चाचा के बच्चे भी कितने खुश हैं वो कहता है माँ दीपावली सभी के लिए है जब समाज का हर व्यक्ति खुश होगा तभी तो त्यौहार मनाने में आनन्द आता है। उन गरीब लोगों के लिये भी तो साल भर का त्यौहार है वे इंतजार करते हैं कि इस साल बिक्री होगी तो हम भी अच्छे से पर्व मनायेंगे। इसलिये अपनी खुशी के साथ दूसरों की खुशी का भी ध्यान रखना चाहिये। हमारी सभी पुरानी परम्परायें, रीति-रिवाज समाज के हर तबके को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं। हम जब मिट्टी के बर्तन, दीये, खिलौने खरीदते हैं तो इस वंचित वर्ग को प्रमोट करते हैं जो चाइनीज झालरों के बाजार के आते ही लगभग खत्म हो गया है। हैपी दिवाली अपना और अपने आसपास सभी की खुशियों का ध्यान रखिये। खुश रहिये और खुशियाँ बांटिये भी।
बहुत मेहनत से बनते हैं मिट्टी के बर्तन
भारत के हर पारंपरिक घर में मिट्टी के बर्तन की अहम भूमिका होती है। कुम्हारों की संख्या तो बहुत है उनकी परम्परा अब दम तोड़ रही है। व्यावसायिक रूप से बढ़ रहा है। आज तक जो एकमात्र मशीनीकरण हुआ है, वह पहिए का मोटर चालित घूर्णन है।वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब हाथ से बनाया जाता है – मिट्टी को मिलाने से लेकर, खाना पकाने के बर्तन बनाने तक, जिसमें पत्तियों के ढेर के नीचे मिट्टी को पकाने और उसे मिट्टी से ढकने का पारंपरिक तरीका भी शामिल है।ये पिछली पीढ़ी के कारीगर एक समुदाय के रूप में रहते हैं और अपनी परंपरा को बचाए रखने के लिए मिलकर काम करते हैं। अगली पीढ़ी इस कला को अपनाकर और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर अवसरों की तलाश में है। महंगाई बढ़ रही है लेकिन उनके सामान का दाम नहीं बढ़ रहा है। मिट्टी के काम में 4 तरह की प्रोसेस है। पहला प्रोसेस मिट्टी को तैयार करवाना दूसरा बर्तन बनाना उसके बाद उनको सही तरह से सुखाना लास्ट में उनको भट्ठी में पकाना बाद में तैयार होता है। आज कल मिट्टी भी दूर से लानी पड़ती है। पहले मिट्टी का कोई चार्ज नहीं था अभी चार्ज देना पड़ता है। इस व्यवसाय में पूरा घर मदद करता है। इस लिए घर का खर्चा निकल जाता है। एक व्यक्ति अकेला का काम नहीं है क्योंकि हरेक प्रोसेस में मेहनत है।
दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। घरों की सजावट से लेकर पूजन सामग्री की खरीदारी तक के लिए बाजारों में लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। इसी बीच मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के खैराती बाजार क्षेत्र में रहने वाले सुरेश प्रजापति अपनी अनोखी कला और पारंपरिक हुनर के चलते आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। सुरेश आंखों पर पट्टी बांधकर मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। उनकी इस कला को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं।
सुरेश प्रजापति ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वह मिट्टी के बर्तन बनाने में माहिर हैं। उनकी खासियत यह है कि वह आंखों पर पट्टी बांधकर भी अपने हाथों से मिट्टी को आकार देते हुए बर्तन तैयार कर लेते हैं। उनके हाथों का हुनर और मिट्टी पर पकड़ इस कला
को खास बनाती है। उनकी इस
अनोखी प्रतिभा को देखने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। मिट्टी से विभिन्न आकार के बर्तन तैयार करना उनकी मेहनत, अनुभव और वर्षों के अभ्यास को दर्शाता है।
सुरेश प्रजापति के परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम लंबे समय से किया जा रहा है। खास बात यह है कि परिवार की दूसरी पीढ़ी भी इस पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ा रही है। आज के आधुनिक दौर में जहां बाजारों में कई तरह के सजावटी और कृत्रिम सामान उपलब्ध हैं, वहीं मिट्टी के बर्तनों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। दीपावली जैसे त्योहारों पर इनकी मांग और बढ़ जाती है।
दीपावली पर पूजन में उपयोग होने वाले मिट्टी के दीये और अन्य बर्तन लोगों की जरूरत का अहम हिस्सा हैं। सुरेश प्रजापति भी त्योहार को देखते हुए विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तन तैयार कर रहे हैं। वह इन बर्तनों को कम कीमत पर बेचते हैं ताकि आम लोग भी आसानी से खरीदारी कर सकें। यही कारण है कि खैराती बाजार क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन खरीदने के लिए लोगों की आवाजाही बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश में भी दीपावली पर बर्तन व दीपक बनाये जा रहे हैं।(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



