
नाम से गुणों की पहचान होती है। इसीलिए आज भी रावण कुंभकर्ण जैसे नाम कोई नहीं रखता। मुसलमानों में यजीद नाम किसी का नहीं रखा जाता क्योंकि यजीद की फौजों ने ही कर्बला के मैदान में मोहम्मद साहेब के नवासे इमाम हुसैन और उनके परिजनों को भूखा-प्यासा तड़पा कर मारा था। इसी प्रकार दुर्योधन नाम कोई नहीं रखता। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि राम का नाम तो श्रेष्ठों मंें भी श्रेष्ठ है।
एक छत्रु एक मुकुटमनि, सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रधुवर नाम के बरन बिराजत दोउ।
अर्थात् श्री रधुनाथ जी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं। जिनमें से एक (रकार) छत्र रूप (रेफ) से दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर हैं।
समुझत सरिस नाम अरु नामी, प्रीति परस्पर प्रभु अनुगामी।
नाम रूप दुइ ईस उपाधी, अगध अनादि सुसागुझि साधी।
समझने में नाम और नामी (जिसका नाम रखा गया है) दोनों एक हैं लेकिन दोनों मे परस्पर सेवक और स्वामी के समान प्रीति है। इसका तात्पर्य यह है कि नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्री रामचन्द्र अपने राम नाम का ही अनुगमन करते हैं अर्थात् जो कोई उनका नाम पुकारता है, प्रभु राम वहीं आ जाते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि नाम और रूप दोनों ही ईश्वर की उपाधि है। भगवन के ये दोनों अंश (नाम और रूप) अनिर्वचनीय हैं। इनका दिव्य और अविनाशी स्वरूप जानने में आता है।
को बड़ छोट कहत अपराधू, सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू।
देखिअहिं रूप नाम आधीना, रूप ग्याननहिनाम विहीना।
अर्थात् इन नाम और रूप में कौन बड़ा है। कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-वेशी) सुनकर साधु जन स्वयं समझ लेंगे। तुलसीदास जी कहते हैं कि हालांकि रूप को नाम के अधीन देखा जाता है, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता।
रूप बिसेष नाम बिनु जाने, करतल गत न परहिं पहिचाने।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखे, आवत हृदय सनेह बिसेषें।
कोई भी विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता लेकिन रूप को बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाए तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है। इसलिए
नाम रूप गति अकथ कहानी, समुझत सुखद न परति बखानी।
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी, उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।
नाम और रूप की गति की कहानी अकथनीय है। यह कहानी समझने में सुखदायक है लेकिन उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुन्दर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाले चतुर दुभाषिया है।
रामनाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उजिआर।
अर्थात् यदि एक ही दीपक से घर के अंदर और बाहर उजाला करना है तो दीपक को घर की देहरी (दहलीज) पर रखना होगा उसी प्रकार प्रभु राम का नाम शरीर की दहलीज रूपी जीभ पर रखोगे तभी शरीर के अंदर और बाहर ज्ञान का प्रकाश फैलेगा।
नाम जीहं जपि जागहिं जोगी, विरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।
ब्रह्म सुखहिं अनुभवहिं अनूपा, अकथ, अनामय नाम न रूपा।
ब्रह्मा जी के बनाये हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भलीभांति छूटे हुए (मुक्त) वैराग्यवान योगी पुरुष इस राम नाम को ही जीभ से जपते हुए तत्व ज्ञान रूपी दिन में जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्म सुख का अनुभव करते हैं।
जाना चहहिं गूढ़ गतिजेऊ, नाम जीहं जपि जानहिं तेऊ।
साधक नाम जपहिं लय लाएं, होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।
इसके साथ ही जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे जिज्ञासु भी राम नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमा आदि आठों सिद्धियों को प्राप्त कर लेते हैं।
जपहिं नाम जन आरत भारी, मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।
राम भगत जग चारि प्रकारा, सुकृती चारिउ अनध उदारा।
इसी प्रकार जो लोग किसी कारण से अत्यधिक परेशान होते हैं, तब भी संकट से घबड़ाकर, आन्र्त होकर नाम का जप करते हैं तो उनके भारी संकट भी मिट जाते हैं। संकट दूर होने से वे सुखी हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में भगवान के चार प्रकार के भक्त होते हैं। ये भक्त हैं अर्थार्थी अर्थात् धन इत्यादि की इच्छा से भजन करने वाले, दूसरे आर्त अर्थात् संकट से परेशान होकर भगवान का स्मरण करने वाले, तीसरे जिज्ञासु अर्थात् भगवान क्या है, कैसे है- यह सब जानने की इच्छा से भजन करने वाले और चैथे प्रकार के भक्त होते हैं, ज्ञानी अर्थात् भगवान को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले। ये चारों प्रकार के भक्त राम को प्रिय हैं। पुण्यात्मा, पाप रहित और उदार हैं लेकिन
चहूं उतर कहुं नाम अधारा, ग्यानी प्रभुहिं बिसेषि पियारा।
चहुं जुग चहुं श्रुति नाम प्रभाऊ, कलि विसेषि नहिं आन उपाऊ।
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है। इनमें ज्ञान भक्त भगवान को विशेष रूप से प्रिय है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यूं तो चारों ही युगों में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग और चारों ही वेदों (ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद) में नाम का प्रभाव है लेकिन कलियुग में विशेष रूप से नाम का ही प्रभाव है, कलियुग में राम राम के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है। यहां पर गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण और निर्गुण उपासना में सगुण उपासना को बेहतर बताने का प्रयास किया है। इसीलिए उन्होंने सगुण और निर्गुण दोनों में राम नाम को साक्षी अर्थात् दुभाषिया बताया है। दुभाषिया जिस तरह दो अलग-अलग भाषाएं जानने वाले के बीच संवाद करा देता है, वैसे ही राम का नाम सगुण और निर्गुण उपासकों को जोड़ देता है। -क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



