अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा… 18

जल और लहर जैसे एक ही हैं सीता-राम

प्रेम कई प्रकार का होता है। कोई चीज हमें अच्छी लगी तो हम उससे प्रेम करने लगते हैं लेकिन उससे ज्यादा अच्छी चीज मिल जाए तो पहले वाली चीज को छोड़कर दूसरी से प्रेम करने लगेंगे। यह सामान्य प्रेम है लेकिन जब गूढ़ प्रेम होता है तो वस्तु और प्रेमी में अन्तर नहीं किया जा सकता जैसे प्रभु राम और सीता। एक साथ दोनों का नाम लिया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने राम-सीता को वाणी ओर अर्थ के समान बताया है।
गिरा-अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
इसी प्रकार भरत का राम के प्रति प्रेम और राजा जनक का राम के प्रति अनुराग गूढ़ प्रेम का परिचायक है।
राजा जनक की वंदना करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू, जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।
जोग भोग महं राखेउ गोई, राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।
अर्थात् मैं परिवार सहित राजा जनक को प्रणाम करता हूं जिसका श्री राम के चरणों मे गूढ़ प्रेम था, जिसको उन्होंने जोग और भोग में छिपा रखा था और रामचन्द्र जी को देखते ही वह प्रगट हो गया। राजा जनक का एक नाम विदेह था अर्थात् उनका कोई शरीर नहीं। इसका मतलब कि जीवित रहते वह शरीर से कोई मोह नहीं रखते थे। देह के जो गुण होते हैं, प्रसन्नता। दुखी होना, क्रोध करना- इनमें कोई भी जनक के पास नहीं था लेकिन राम जब विश्वामित्र के साथ विदेह की नगरी पहुंचे तो राजा जनक में मनुष्य वाले सभी गुण आ गये। राम को देखा तो हर्षित हुए, शिव का धनुष जब राजा नहीं तोड़ सके तो क्रोध भी किया।
इसी प्रकार भरत की वंदना करते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
प्रनवउं प्रथम भरत के चरना, जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।
रामचरन पंकज मन जासू,
लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।
भाइयों में सबसे पहले मैं भरत के चरणों को प्रणाम करता हूं जिनके नियम और व्रत का वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्री राम के चरणों में भौरों की तरह लुब्ध (लुभाया) था, कभी उन चरण कमलों को नहीं छोड़ता था। लोग कह सकते हैं कि जब भगवान राम 14 वर्ष वन में रहे तब भरत ने यह बात कैसे निभाया? चित्रकूट से भरत राम की चरण पादुका (खड़ाऊं) लेकर आये थे। भरत के लिए यही राम के चरण कमल थे। इसी प्रकार भरत ने 14 वर्ष तक राम के नाम पर ही राज्य किया, वनवासियों की तरह रहे। यही भरत का राम के प्रति गूढ़ प्रेम था। भरत ने राम के प्रति इस तरह प्रेम किया जैसे भौंरा कमल के फूल से करता है। सूर्य अस्त होने के बाद कमल का फूल अपनी पंखुड़ियों को समेट लेता है और भौंरा उसी के अंदर बंद हो जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास ने लक्ष्मण की वंदना करते हुए कहा-
बंदउं लछिमन पद जलजाता, सीतल सुभग भगत सुखदाता।
रघुपति कीरति बिमल पताका, दंड समान भयउ जस जाका।
अर्थात्, मैं श्री लक्ष्मण जी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूं जो शीतल सुन्दर और भक्तों को सुख देने वाले हैं। श्री रधुनाथ जी की कीर्ति रूपी पताका (झंडा) में लक्ष्मण जी का यश पताका को ऊंचा करने वाले दण्ड के समान है।
सेष सहस्त्रसीस जग कारन, जो अवतरेउ भूमि भय टारन।
सदा सो सानुकूल रह मो पर, कृपासिंधु सौमित्र गुनाकर।
वही लक्ष्मण जिन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है, हजार सिरों पर पृथ्वी को धारण करने वाले, माता सुमित्रा के पुत्र (सौमित्र) हैं, वे कृपा के सागर लक्ष्मण जी मुझ पर सदा प्रसन्न रहे।
रिपुसूदन पद कमल नमामी, सूर सुसील भरत अनुगामी।
महाबीर बिनवउं हनुमाना, राम जासु जस आप बखाना।
अर्थात् श्री शत्रुघन जी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूं जो बड़े वीर सुशील और श्री भरत जी के साथ सदैव रहने वाले (पीछे चलने वाले अनुगामी) हैं। मैं महाबीर हनुमान जी की विनती करता हूं जिनके यश का श्री रामचन्द्र जी ने अपने मुख से (स्वयं) वर्णन किया है। श्री हनुमान जब लंका से माता सीता का पता लगाकर लौटे तो श्रीराम ने प्रसन्न होकर कहा था-
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं, देखेउं करि विचार मनमाहीं।
ग ग ग
सुनु कपि तोहि समान उपकारी, नहि कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।
प्रति उपकार करौं न तोरा, सनमुख होइ न सकत मन मोरा।
इस प्रकार भगवान राम ने हनुमान जी के समान किसी की प्रशंसा नहीं की है।
प्रनवउं पवन कुमार, खल बन पावक ग्यान धन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।
तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं पवन पुत्र हनुमान को प्रणाम करता हूं जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्नि रूप हैं, जो ज्ञान के बादल हैं अर्थात् उस आग को बुझाने की क्षमता भी उन्हीं में है, जिनके हृदय रूपी भवन में धनुष-वाण धारण किये श्री राम निवास करते हैं।
कपिपति रीछ निसाचर राजा, अंगदादि जे कीस समाजा।
बंदउं सबके चरण सुहाए, अधम सरीर राम जिन्ह पाए।
रधुपति चरण उपासक जेते, खग, मृग, सुर, नर, असुर समेते।
बंदउं पद सरोज सब केरे, जे बिनु काम राम के चेरे।
सुक सनकादि भगत मुनि नारद, जे मुनिवर विग्यान विसारद।
प्रनवउं सबहि धरनि धरि सीसा, करहु कृपा जन जानि मुनीसा।
अर्थात् वानरों के राजा सुग्रीव जी, रीछों के राजा जाम्बवान जी, राक्षसों के राजा विभीषण जी और अंगद जी आदि जो वानरों के समाज में शमिल हैं, उन सभी के सुन्दर चरणों की मैं वंदना करता हूं जिन्होंने अधम अर्थात् मनुष्यों से इतर क्योंकि सबसे सुन्दर नर तन बताया गया है। इस अधम शरीर (पशु और राक्षस आदि) शरीर में भी श्री रामचन्द्र को प्राप्त कर लिया। तुलसीदास जी कहते हैं कि पशु-पक्षी, देवता-मनुष्य, असुर समेत जितने भी श्री रामचन्द्र के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरण कमलों की वंदना करता हूं, ये सभी श्रीराम के निष्काम सेवक हैं। इनके अलावा शुकदेव जी, नारद सनकआदि परम ज्ञानी और भक्त, श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरती पर सिर टेक कर उन सबको प्रणाम करता हूं, हे! मुनीश्वरो आप सब मुझको अपना दास समझ कृपा कीजिए।
जनक सुता जग जननि जानकी, अतिसय प्रिय करुना निधान की।
ताके जुग पद कमल मनावउं, जासु कृपा निरमल मति पावउं।
अर्थात् राजा जनक की पुत्री, जगत की माता और करुणा निधान श्री रामचन्द्र जी की प्रियतमा श्री जानकी जी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूं अर्थात् उनकी वंदना करता हूं जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि मिलेगी।
पुनि मन वचन कर्म रघुनायक चरन कमल वंदउं सब लायक।
राजिव नयन धरें धनु सायक, भगत विपति भंजन सुखदायक।
अर्थात् फिर मैं मन, वचन और कर्म से कमल नयन, धनुष-वाणधारी, भक्तों की विपत्ति का नाश करने और उन्हें सुख देने वाले भगवान श्री रधुनाथ जी के सर्वसमर्थ चरण कमलों की वंदना करता हूं क्योंकि
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउं सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।
जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और उसकी लहर के समान कहने में अलग-अलग हैं लेकिन वास्तव में अभिन्न (एक) है, उन श्री सीताराम के चरणों की मैं वंदना करता हूं, जिन्हें दीन-दुखी बहुत प्रिय हैं। -क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

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