प्रदूषण की जड़ पर सुप्रीम प्रहार

भारत कृषि प्रधान देश है। खेती-किसानी को जिन लोगों ने नजदीक से देखा है, विशेष रूप से जिनका बचपन गांव मंे बीता, उन्हंे मालूम है कि फसलों के अवशेष ही सर्दियों मंे न सिर्फ लोगों को गर्मी देते हैं बल्कि मिल-बैठकर सुख-दुख साझा करने का माध्यम बनते हैं। पिछले कुछ वर्षों से किसानों को प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा और फसलों के अवशेष अर्थात पराली को दिल्ली-एनसीआर मंे प्रदूषण का मुख्य कारण बताया गया। सरकारों ने आनन-फानन मंे कानून भी बना दिया कि खेतों मंे पराली जलाना अपराध है। किसान बेचारा तो लोकतंत्र का सबसे कमजोर पक्ष है। कानून बनते ही पुलिस सक्रिय हो गयी और किसानों से वसूली का एक मुद्दा मिल गया। पराली जलाना किसान की मजबूरी है क्योंकि फसल की लागत निकालने के बाद खेत को दूसरी फसल के लिए तैयार करने मंे बाकी उपज मजदूरी मंे ही चली जाएगी और मजदूर ही किसान को कहां मिलेंगे? उसका खेत खाली पड़ा रहेगा। इन परेशानियों को किसानों का हितैषी कहने वाले नेता तो समझने से रहे लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने उसे जरूर समझा है। गत 6 नवम्बर को दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते हुए प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अहम सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण की जड़ को दिखाते हुए। कहा कि दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर्याप्त नहीं है और अमीरों की गाड़ियां प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसानों पर दोष मढ़ने से काम नहीं चलेगा। परिवहन, ऊर्जा और कचरा प्रबंधन जैसे स्थानीय कारणों पर गंभीरता से काम करना होगा। प्रदूषण की जड़ पर सुप्रीम प्रहार को सरकारें भी समझने का प्रयास करें तो बेहतर होगा।
दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण मामले पर सुप्रीम कोर्ट में गत 6 नवम्बर को सुनवाई हुई। इस दौरान सीजेआई ने जहरीली हवा के मुद्दे पर चिंता जताते हुए कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने केंद्र सरकार को कुछ ऐसे सुझाव भी दिए, जिससे हवा में घुले जहर को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। इस दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि कैसे प्रदूषण के स्तर में पहले के मुकाबले कमी आई है वहीं अमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने प्रदूषण बढ़ने की वजह बताई। सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई ने कहा, राज्यों की सरकारी एजेंसियों और निगमों के माध्यम से पराली के स्टोरेज की व्यवस्था की जा सकती है। ऐसे लोग भी मिल सकते हैं जो पराली के लिए वेयरहाउस उपलब्ध करा सकें, इससे उनको भी कमाई होगी। अधिकारियों ने एक निश्चित दर पर किसानों से पराली खरीदने का प्रस्ताव दिया था। पराली खरीदने की दर पहले ही अधिसूचित की जानी चाहिए। मशीनें ग्राम पंचायतों को दी जानी चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत किसान इन्हें खरीदने और इनका खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। पराली को लेकर केवल बयान देने से काम नहीं चलेगा, किसानों के बीच जागरूकता और शिक्षा की जरूरत है। किसानों को पराली के आर्थिक महत्व और उससे होने वाले फायदे समझ आएंगे तो वे उसे जलाने के बजाय अपने पास रखना पसंद करेंगे। कुछ किसान शुरुआत में इसके लिए तैयार नहीं होंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगेगा।
सीजेआई ने कहा प्रदूषण का एक बड़ा कारण वाहनों से होने वाला उत्सर्जन है। दिल्ली को एनसीआर से जोड़ने वाली सड़कों पर बंपर-टू-बंपर वाहन चलते दिखाई देते हैं, जाम की स्थिति चिंताजनक है। दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर्याप्त नहीं है, इसीलिए बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों का इस्तेमाल करते हैं। सीजेआई ने कहा प्रदूषण के लिए क्या केवल पराली जिम्मेदार है या अमीर वर्ग और उनके वाहनों से होने वाला प्रदूषण भी बड़ी समस्या है। किसानों पर दोष मढ़ने से काम नहीं चलेगा, परिवहन, ऊर्जा और कचरा प्रबंधन जैसे स्थानीय कारणों पर भी गंभीरता से काम करना होगा।
उधर, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि इस साल पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आई है। हरियाणा में तो इसमें विशेष रूप से बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। राज्य सरकार ने किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की योजना भी शुरू की है।
एएसजी ने कहा कि वह इस सुझाव को कृषि मंत्रालय के सामने रखेंगे। डीजल से चलने वाले रिक्शों को चरणबद्ध तरीके से हटाने के लिए योजना बनाई जा रही है। दूसरे शहरों से दिल्ली आने वाली बसों के लिए नियम अनिवार्य करने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। सरकार कुछ तात्कालिक तथा मध्यम अवधि के उपायों पर भी विचार कर रही है।
अपराजिता सिंह ने कहा टोल प्लाजा पर वाहनों को लंबे समय तक खड़ा रहने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले आदेश दिया था। सरकार के आदेश का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है। एनसीआर के वाहनों को दिल्ली की सीमाओं पर रोका जा रहा है।
बॉर्डरों पर वे लंबे समय तक इंजन चालू रखकर खड़े रहते हैं, इससे प्रदूषण और बढ़ता है। सीनियर वकील अमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कोर्ट को बताया कि प्रदूषण का स्तर गंभीर श्रेणी के आसपास बना हुआ है, यह ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति रोजाना 30 सिगरेट पी रहा हो। दिल्ली में बढ़ते हुए प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती जताई है। सीजेआई सूर्यकांत ने वाहनों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। सीजेआई ने सरकार से पूछा कि प्रदूषण के लिए केवल पराली जिम्मेदार है या अभिजात्य वर्ग और उनके वाहनों से होने वाला प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या है?
वायु प्रदूषण से तात्पर्य वायु में होने वाले किसी भी भौतिक, रासायनिक या जैविक परिवर्तन से है। यह हानिकारक गैसों, धूल और धुएं से वायु का दूषित होना है, जो पौधों, जानवरों और मनुष्यों को बुरी तरह प्रभावित करता है। वायुमंडल में गैसों का एक निश्चित प्रतिशत मौजूद होता है। इन गैसों की संरचना में वृद्धि या कमी जीवन के लिए हानिकारक होती है। गैसीय संरचना में इस असंतुलन के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिसे वैश्विक तापवृद्धि के नाम से जाना जाता है।
वायु प्रदूषण के कारण मनुष्यों में कई श्वसन संबंधी विकार और हृदय रोग उत्पन्न हो गए हैं। पिछले कुछ दशकों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में वृद्धि हुई है। प्रदूषित क्षेत्रों के निकट रहने वाले बच्चे निमोनिया और अस्थमा के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वायु प्रदूषण के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण प्रतिवर्ष अनेक लोगों की मृत्यु होती है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण, हवा की गैसीय संरचना में असंतुलन आ गया है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में इस वृद्धि को वैश्विक तापवृद्धि कहा जाता है । इसके कारण ग्लेशियर पिघलने लगे हैं और समुद्र का स्तर बढ़ गया है। कई क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं। जीवाश्म ईंधन जलाने से नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें हवा में निकलती हैं। पानी की बूंदें इन प्रदूषकों के साथ मिलकर अम्लीय हो जाती हैं और अम्लीय वर्षा के रूप में बरसती हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



