लेखक की कलम

अतिक्रमण और निष्क्रियता

नगर निगमों और नगर पालिकाआंे की हल्ला गाड़ी का तमाशा तो लगभग सभी ने देखा होगा। इससे एक सीमित समय के लिए अतिक्रमण हट जाता है लेकिन चार दिन बाद और कभी-कभी तो उसी दिन सड़कों पर कब्जा करके आम जनता के लिए परेशानी पैदा की जाती है। सड़क पर धंधा करके रोजी-रोटी कमाने वालों की बड़ी तदाद है और ये लोग इसके लिए सुविधा शुल्क भी देते हैं लेकिन बड़े-बड़े कारोबारी भी अतिक्रमण करके समस्या पैदा करते हैं। इस अतिक्रमण को इसलिए दूर नहीं किया जा सकता क्योंकि संबंधित विभाग के लोग निष्क्रिय रहते हैं। यह समस्या किसी एक प्रदेश और शहर तक सीमित नहीं है बल्कि देश भर मंे थोड़े-बहुत अंतर के साथ देखी जा सकती है। देश के सबसे अमीर नगर निगम वृहन्न मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) की निष्क्रियता पर देश की सबसे बड़ी अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट की भृकुटी टेढ़ी हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने बोरी बेले बेस्ट बस स्टेशन और डिपो के लिए आरक्षित भूमि पर अतिक्रमण को हटाने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद बीएमसी ने कोई कदम नहीं उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े और संबंधित अफसरों के नवम्बर महीने के वेतन रोक दिये हैं। बीएमसी पर पांच लाख का जुर्माना भी ठोंका गया है। यह सजा कोई बड़ी नहीं है लेकिन जिम्मेदार अफसरों के लिए एक चेतावनी तो जरूर है। उन्हंे जनता के प्रति अपने कत्र्तव्य करने होंगे अन्यथा सरकार भले ही उनकी निष्क्रियता को नजरंदाज करे लेकिन अदालत के हाथ उनके गिरेबान तक पहुंच जाएंगे।
देश की सबसे अमीर नगर निगम बृहन्न मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बोरीवली में बेस्ट बस स्टेशन और डिपो के लिए आरक्षित भूमि से अवैध अतिक्रमण नहीं हटाने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े और संबंधित अधिकारियों के नवंबर महीने के वेतन पर रोक लगाने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने अवमानना की कार्रवाई शुरू करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया और बीएमसी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
ये मामला मुंबई के बोरीवली क्षेत्र में बेस्ट बस स्टेशन और डिपो के लिए आरक्षित भूमि से अतिक्रमण नहीं हटाए जाने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस जमीन को खाली कराने के निर्देश दे चुका था, लेकिन बार-बार आदेश दिए जाने के बावजूद बीएमसी की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पर गंभीर नाराजगी जताई और कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का मामला है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े के खिलाफ कारण बताओ अवमानना नोटिस जारी किया। अदालत ने आदेश दिया कि कमिश्नर और इस मामले से जुड़े संबंधित अधिकारियों का नवंबर माह का वेतन 1 दिसंबर 2026 तक रोका जाए। बेंच ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि आदेशों के पालन में और देरी हुई तो आगे और कड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है।
सुनवाई के दौरान बीएमसी की ओर से कहा गया कि कार्रवाई से पहले कुछ मराठी दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया जाना आवश्यक था, इसलिए समय लगा। इस दलील पर अदालत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कोर्ट ने सवाल किया कि हलफनामा दाखिल करने वाले अधिकारियों को क्या मराठी भाषा नहीं आती। अदालत ने इस स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना और इसे आदेशों के पालन में देरी का उचित कारण मानने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों के बीच मिलीभगत हो सकती है। अदालत ने कहा कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कार्रवाई न होना गंभीर चिंता का विषय है और यह आदेशों के जानबूझकर उल्लंघन की ओर संकेत करता है। बेंच ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर भी विचार किया जाएगा।
बीएमसी ने अतिक्रमण हटाने और न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय मांगा था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने माना कि पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है और अब और देरी स्वीकार नहीं की जा सकती। आदेशों का पालन न करने और मामले में देरी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि न्यायालय के आदेशों को लागू करना प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी है और यदि आदेशों की अवहेलना होगी तो जवाबदेही तय की जाएगी।
सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश 15 महीने तक ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है? ऐसा ही हुआ है महाराष्ट्र में। जुलाई, 2025 में शीर्ष कोर्ट ने मुंबई में अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, लेकिन 15 महीने बीतने के बावजूद नवंबर, 2026 तक इस आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत अगर कोई अवमानना का दोषी पाया जाता है तो व्यक्ति को छह महीने तक की जेल की सजा हो सकती है। कानून में दो हजार रुपये के जुर्माने का भी प्रावधान है। दोनों सजा एक साथ भी हो सकती है।
इसी साल कुछ ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां कोर्ट ने अवमानना के मामले में सुनवाई तय की। केरल में कांग्रेस की प्रदेश समिति ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत पर अपमानजनक टिप्पणी की। इस मामले में अदालत ने दो वकीलों के पत्र को कॉमन याचिका की तरह दर्ज किया और कहा कि कोर्ट छह नवंबर को सुनवाई कर सकती है।एक अन्य मामला दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में वकील विभाव कुमार झा की सोशल मीडिया टिप्पणी से जुड़ा है। इस मामले में महिलाओं और अनुसूचित जाति को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट लिखे जाने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू की। हालांकि, अगस्त, 2026 के इस मामले में वकील ने अपनी गलती पर गहरा पछतावा व्यक्त करते हुए बिना शर्त लिखित माफी मांगी। इसके बाद अवमानना का मामला बंद कर दिया गया।
कुछ हफ्ते पहले जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) नाम की सोशल मीडिया मुहिम छेड़ने वाले महाराष्ट्र के अभिजीत दिपके, लद्दाख के शिक्षाविद सोनम वांगचुक और अन्य ने धरना-प्रदर्शन किया था। इसके बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पाबंदियां लगाई गईं। सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े एक मामले में केंद्रीय गृह सचिव समेत तीन वरिष्ठ अधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी किया था।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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