दीपावली व गोवर्धन पूजा की कथा

कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि को दीपावली का पर्व मनाया जाता है। यह वह दिन था जब भगवान श्रीराम 14 वर्षों का वनवास काटने और रावण सहित अनेक असुरों का संहार करने के बाद अयोध्या वापस आए थे। उनके अयोध्या वापस आने की खुशी में अयोध्या वासियों ने घर-घर में दीपक जलाकर इतनी रोशनी कर दी थी कि अमावस की काली रात भी जगमगा उठी थी। यह खुशी, उल्लास और रोशनी का पर्व है। पुराणों के अनुसार दीपावली की एक कथा मिलती है वह इस प्रकार है। एक साहूकार था। उसकी बेटी रोज पीपल पर जल चढ़ाने जाती थी। पीपल पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा कि तुम मेरी सहेली बन जाओ। उसने लक्ष्मी जी से कहा कि मैं कल अपने पिता जी से पूछकर आपको बताऊँगी। पिता को जब बेटी ने यह बात बताई तो उन्होंने हाँ कर दी। दूसरे दिन साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को कहा कि मैं आपको अपनी सहेली के रूप में स्वीकार करती हूूं। दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई।
एक दिन लक्ष्मी जी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गईं। लक्ष्मी जी ने उसे ओढ़ने के लिए शाॅल-दुशाला दिया तथा सोने की बनी चैकी पर बिठाया। सोने की थाली में उसे अनेक प्रकार के व्यंजन खाने को दिये। जब साहूकार की बेटी अपने घर लौटने लगी तो लक्ष्मी जी ने पूछा कि तुम मुझे अपने घर कब बुला रही हो। पहले तो सेठ की पुत्री को संकोच हुआ कि उसके यहाँ तो इतना कुछ नहीं है लेकिन फिर वह तैयार हो गई। लेकिन घर जाकर वह बहुत उदास बैठी थी तो उसके पिता ने पूछा कि क्या हुआ! तुम अपने घर में लक्ष्मी जी को बुलाकर आई हो और स्वयं उदास बैठी हो। उन्हें कितना खराब लगेगा। तब उसकी बेटी ने कहा कि लक्ष्मी जी ने तो मुझे इतना दिया और बहुत सुन्दर भोजन कराया था। मैं उनका सम्मान कैसे करूँगी। हमारे घर में तो ऐसा कुछ भी नहीं है।
तब सेठ ने अपनी बेटी से कहा कि जो अपने से बन पड़ेगा हम उनकी खातिर करेंगे। तुम गोबर मिट्टी से चैका लगाकर घर की सफाई कर लो। चैमुखा दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का नाम लेकर बैठ जाओ। उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार उसके पास डाल गई। साहूकार की बेटी ने उस हार को बेचंकर सोने का था, शाॅल-दुशाला और अनेक प्रकार के भोजन की तैयार कर ली।
थोड़ी ही देर बाद गणेश जी और लक्ष्मी जी उसके घर पर आ गये। साहूकार की बेटी ने उनको बैठने के लिए सोने की चैकी दी। लक्ष्मी ने बैठने को मना किया, कहा कि इस पर तो राजा रानी बैठते हैं। सेठ की बेटी ने उन्हें सम्मान से उस चैकी पर बैठा दिया। उसने उनकी बहुत खातिरदारी की। जिससे लक्ष्मी जी प्रसन्न हो गईं और उनकी कृपा से साहूकार बहुत अमीर बन गया है। लक्ष्मी देवी जैसे आयीं उसकी चैकी स्वीकार की ऐसे ही हमारी भक्ति स्वीकार करिये और हमें भी धनधान्य से सम्पन्न करिये।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चाहे आपके पास कुछ भी न हो लेकिन आप यदि सच्ची श्रद्धा से भगवान की प्रार्थना करते हैं तो वे अवश्य प्रसन्न होते हैं।
गोवर्धन पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा द्वापर युग से जुड़ी है। कहते हैं कि एक बार श्रीकृष्ण गोप गोपियों के साथ गाएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि सभी ब्रजवासी देवराज इन्द्र की पूजा की भव्य तैयारी कर रहे थे, हजारों गोपियाँ गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन भोग बनाकर उत्सव मना रहे हैं। इन्द्र देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव मनाया जाता है। ऐसा गोपियों ने बताया तब कृष्ण ने कहा कि जब देवता स्वयं प्रत्यक्ष आकर भोग करें तब तो इस उत्सव का कुछ मतलब है। गोपियाँ बोलीं कि इन्द्र देव की निन्दा आपको नहीं करनी चाहिये। इन्द्र की कृपा से ही वर्षा होती है। श्री कृष्ण ने कहा कि वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है इसलिये तुम सबको इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिये। सभी गोप ग्वाल अपने-अपने घरों से पकवान ला-लाकर भगवान कृष्ण ने जैसे बताया था वैसे ही गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे।
इन्द्र भगवान को जब पता चला कि इस वर्ष इन्द्र की पूजा न करके गोवर्धन की पूजा की जा रही है तो वे कुपित हो गये और उन्होंने मेघों को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसाएं कि वहाँ प्रलय आ जाय।
मेघों ने इन्द्र की आज्ञा से मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब ब्रज में सभी संकट में पड़ गये तब कृष्ण ने सभी को आदेश दिया कि अपने गायों और बछड़ों को लेकर गोवर्धन पर्वत के नीचे आ जायं। गोवर्धन ही सबकी रक्षा करेंगे। भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था जिससे समस्त ब्रजवासी उसके नीचे शरण ले सकें। कृष्ण भगवान की कृपा से गोवर्धन पर्वत ने एक छाते का काम किया और सभी ब्रजवासी सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। भगवान के सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर पानी की एक बूंद भी नहीं पड़ी।
इन्द्र देवता चकित थे यह सब देखकर। तब ब्रह्मा जी ने उनको बताया कि पृथ्वी पर श्रीकृष्ण का जन्म हो चुका है। उनसे तुम्हारा बैर होना उचित नहीं है। श्री कृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्र देवता अपनी मूर्खता पर बहुत लज्जित हुये और उन्होंने अपनी गलती के लिए श्री कृष्ण से क्षमा याचना की और बारिश रोक दी। बारिश रुकने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब आप सभी लोग प्रतिवर्ष छप्पन भोग बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा किया करो। तभी यह पर्व और उत्सव मनाया जाता है। मान्यता है कि अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई थी।
इस दिन गाय-बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर उनका भी पूजन किया जाता है। उनको भी मिठाई खिलाकर उनकी परिक्रमा की जाती है। इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसकी परिक्रमा भी की जाती है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



