शाह का एक और सुनहरा अध्याय

अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)
कड़क फैसले लेने वाले केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने के बाद एक और सुनहरा अध्याय लगभग लिख ही दिया है। अमित शाह ने देश से वादा किया है कि 2026 तक नक्सलवाद पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। वर्ष 2025 की अंतिम तिमाही मंे जिस तरह से बड़ी संख्या में नक्सलियों ने समर्पण किया है, उससे यह उम्मीद विश्वास में बदल रही है। बड़ी संख्या में नक्सली मारे भी गये हैं। अब उन लोगों मंे यह संदेश जा रहा है कि समाज की मुख्य धारा मंे शामिल होने में ही भलाई है। जिन नक्सलियों ने हथियार डाले हैं, उनके पुनर्वास की सरकार ने पुख्ता योजना भी बना रखी है। अभी हाल मंे छत्तीसगढ़ मंे 170 नक्सलियों का ऐतिहासिक समर्पण हुआ है। अमित शाह ने इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर मंे अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाकर वहां कारोबार के लिए अन्य राज्यों में रहने वालों का रास्ता खोला था। अब 56 साल पहले शुरू हुई नक्सलवाद की कहानी भी इतिहास के पन्नों में दफ्न होने वाली है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक दिन आया है। शुक्रवार को 170 से अधिक नक्सली कैडरों ने पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और राज्य सरकार के सामने अपने हथियार डाल दिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में एक मील का पत्थर बताया और कहा, छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ और उत्तरी बस्तर, जो कभी आतंक के अड्डे थे, आज नक्सली आतंक से मुक्त घोषित कर दिए गए हैं। यह घटनाक्रम बस्तर के तीन जिलों में 78 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के एक दिन बाद हुआ है। गत 16 अक्टूबर को, 110 से अधिक कैडर हथियार लेकर पहुंचे और बीजापुर जिले के एक दूरदराज के गांव में बने कैंप में हथियार रख दिए। कई अन्य अभी भी रास्ते में थे। इससे पहले, उन्हें जंगलों से निकलकर खेतों को पार करते हुए सुरक्षा शिविरों की ओर कतारों में मार्च करते देखा गया था। बस्तर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी क्योंकि कैडर अलग-अलग समूहों में विभिन्न दिशाओं से आ रहे थे। अमित शाह ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर बताया कि जनवरी 2024 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद से 2100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, 1785 को गिरफ्तार किया गया है और 477 को मार गिराया गया है। कांकेर में लगभग 50 नक्सलियों, सुकमा में 27 और कोंडागांव जिले में एक नक्सली ने आत्मसमर्पण किया था। शाह ने कहा, आज 17 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में 170 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। कल राज्य में 27 ने अपने हथियार डाल दिए थे। महाराष्ट्र में भी 61 नक्सली मुख्यधारा में लौट आए। कुल मिलाकर, पिछले दो दिनों में 258 अनुभवी वामपंथी उग्रवादियों ने हिंसा का मार्ग छोड़ दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अब दक्षिण बस्तर में नक्सलवाद का कोई निशान नहीं बचा है, जिसे हमारी सुरक्षा बल जल्द ही खत्म कर देंगे। शाह ने अपनी नीति स्पष्ट करते हुए कहा, हमारी नीति स्पष्ट है जो आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, उनका स्वागत है, और जो बंदूकें चलाना जारी रखेंगे, वे हमारे बलों के क्रोध का सामना करेंगे। मैं उन लोगों से फिर से अपील करता हूं जो अभी भी नक्सलवाद के रास्ते पर हैं, अपने हथियार डाल दें और मुख्यधारा में शामिल हो जाएं। हम 31 मार्च 2026 से पहले नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
आत्मसमर्पण करने वालों में एक वरिष्ठ नक्सली कमांडर रुपेश और मारह डिवीजन प्रभारी रणित भी शामिल हैं, जैसा कि अधिकारियों ने बताया। रुपेश, जो नक्सलियों के उत्तर-पश्चिम सब-जोनल ब्यूरो के प्रभारी थे, अप्रैल में शांति वार्ता शुरू करने वाले व्यक्ति थे और तब से वे सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में थे। सरकार ने जगदलपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और गृह मंत्री विजय शर्मा की उपस्थिति में आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों और हथियारों की आधिकारिक प्रस्तुति की योजना बनायी। उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि रुपेश को हाल ही में दंडकारण्य विशेष जोनल समिति के सदस्य से केंद्रीय समिति के सदस्य के पद पर पदोन्नत किया गया था, फिर भी उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के साथ कई दौर की चर्चाओं के बाद आत्मसमर्पण करने का फैसला किया। वे पिछले 20 वर्षों से सक्रिय थे और नई भर्ती, लॉजिस्टिक्स बनाए रखने और प्रेस विज्ञप्ति जारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, जिनके पास गृह विभाग भी है, ने कहा कि कांकेर और अबूझमाड़ क्षेत्र अब सशस्त्र नक्सलवाद से मुक्त हैं, और नारायणपुर और सुकमा भी जल्द ही मुक्त हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि बस्तर के स्थानीय लोग अब रेड टेरर (नक्सली आतंक) नहीं चाहते हैं।यह आत्मसमर्पण बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत का प्रतीक है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण नीति के कारण नक्सली कैडरों का मनोबल टूटा है। जिन नक्सलियों ने हथियार डाले हैं, उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने और पुनर्वास के लिए सरकार की योजनाएं हैं। यह कदम उन लोगों के लिए एक संदेश है जो अभी भी हिंसा का रास्ता अपनाए हुए हैं।
नक्सलबाड़ी विद्रोह 1967 में भारत के पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी उपखंड के नक्सलबाड़ी ब्लॉक में एक सशस्त्र किसान विद्रोह था। इसका नेतृत्व मुख्य रूप से आदिवासियों और बंगाल के कट्टरपंथी कम्युनिस्ट नेताओं ने किया और 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के रूप में विकसित हुआ। नक्सलवाद की चिंगारी साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से भड़की थी। सिलीगुड़ी में सीपीआई(एम) के कट्टरपंथी धड़ों ने जमींदारों के खिलाफ, कर्ज में डूबे आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के साथ मिलकर अभियान शुरू किया। 25 मई को पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर की तीर-कमान से हत्या कर दी गई। पुलिस की गोलीबारी में आठ महिलाओं, दो बच्चों और एक पुरुष की मौत हुई। इसके साथ ही सशस्त्र संघर्ष फैलना शुरू हुआ और चीन की मीडिया ने इसे स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया करार दिया। इससे दो साल पहले एक स्थानीय सीपीआई(एम) नेता चारु मजूमदार ने गुरिल्ला युद्ध के जरिए इंडियन स्टेट को उखाड़ फेंकने के मकसद के साथ आठ दस्तावेज तैयार किए। कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिलकर उन्होंने शुरुआत में नक्सलबाड़ी आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन बाद में श्रीकाकुलम, तेलंगाना, बिहार समेत दंडकारण्य के जंगलों तक फैल गया।
साल 1969 की केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया इस अशांति का मूल कारण आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का सही तरीके से लागू नहीं होना है और जब तक इस पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब तक उन आदिवासियों का भरोसा जीतना संभव नहीं होगा, जिनका नेतृत्व चरमपंथियों ने अपने हाथों में ले लिया है।
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सामने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। यह समय-सीमा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तय की है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में नक्सलियों के साथ
मुठभेड़ की जैसी रिपोर्ट्स आ रही हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि
माओवादी आंदोलन अपने आखिरी दौर में है। ऐसा दिखता है कि अब माओवादी भी इस बात को समझ चुके हैं। प्रवक्ता अभय का हथियार डालने वाला पत्र और नेता रूपेश का भविष्य के प्रति अनिश्चय को स्वीकार करना यही दिखाता है। (हिफी)



