लेखक की कलम

मध्याह्न भोजन में भ्रष्टाचार के कीड़े

भारत में मिड डे मील योजना (मध्याह्न भोजन योजना) की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को प्राथमिक शिक्षा के लिए पोषण सहायता का राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में की गई थी। वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने इसका नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण कर दिया है। योजना के मुख्य उद्देश्य इस योजना को लागू करने के पीछे निम्नलिखित महत्वपूर्ण उद्देश्य थे। ग्रामीण और वंचित वर्गों के गरीब बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करना और स्कूलों में छात्रों का नामांकन बढ़ाना। स्कूलों में बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना और बीच में स्कूल छोड़ने की दर को कम करना।कुपोषण से पीड़ित बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर को बेहतर बनाना।भूखे बच्चों की भूख मिटाकर कक्षा की गतिविधियों और पढ़ाई में उनका ध्यान केंद्रित करने में मदद करना।विभिन्न जातियों और पृष्ठभूमि के बच्चों को एक साथ बैठाकर भोजन कराना, जिससे सामाजिक दूरी कम हो और भाईचारा बढ़े।
गरीब बच्चों को पोषण देने और स्कूलों की ओर आकर्षित करने के लिए मिड-डे मील योजना भोजन पकाने में लापरवाही तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी नियमों की अनदेखी के चलते भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। नानहाइजनिक और असुरक्षित भोजन खा कर बच्चे बीमार हो रहे हैं। कहीं मिड-डे मील मेन्यू के हिसाब से नहीं बनता तो कई बार भोजन में सुरसरी घुन कीड़े, कंकड़ छिपकलियां, मेंढक और यहां तक कि सांप मिलने की शिकायतें भी आती रहती हैं, हाल ही में एक के बाद एक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो रही है। इस तरह यह योजना लक्ष्य से भटक गयी है।
आपको सुर्खियों में रही कुछ ताजा घटनाओं का हवाला देते हैं ताकि इस योजना के क्रियान्वयन में हो रही गड़बड़ी का अंदाजा लगा सकते हैं-
1 जनवरी को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के गोकुलपुर गांव में स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल में बच्चों को परोसने के लिए बनाई गई आलू की सब्जी में मरा हुआ मेंढक निकला।
6 फरवरी को मधेपुरा (बिहार) के साहूगढ़ स्थित सरकारी सीनियर सैकेंडरी स्कूल में मिड-डे मील खाने वाले 70 से अधिक बच्चों को उल्टियां, पेट दर्द, घबराहट व बेचैनी होने लगी तथा उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। जांच करने पर सब्जी बनाने वाले बर्तन में मृत छिपकली पड़ी मिली। 11 मार्च को कोयम्बटूर (तमिलनाडु) के कबुंदमपयलम गांव के सैकेंडरी स्कूल में परोसा गया मिड-डे मील खाते ही 44 छात्र फूड प्वाइजनिंग का शिकार हो गए और उन्हें इलाज के लिए तुरंत अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि भोजन में एक छिपकली गिर गई थी।
14 अप्रैल को मयूरभंज (ओडिशा) के एक सरकारी रैजीडैंशियल स्कूल में मिड-डे मील योजना के अंतर्गत पकाया गया दूषित भोजन करने से 100 से अधिक छात्र बीमार हो गए तथा पांचवीं कक्षा की एक छात्रा की मौत हो गई।
23 अप्रैल को मुंगेर (बिहार) के सराधी गांव के सरकारी सैकेंडरी स्कूल में मिड-डे मील में पकाए जाने वाले चावल के ड्रम में मरा हुआ चूहा और उसका मल-मूत्र मिलने से हड़कंप मच गया।
6 मई को अलवर (राजस्थान) के नंगली गांव के सीनियर सैकेंडरी स्कूल के बच्चों को मिड-डे मील में परोसी गई दाल में मरा हुआ चूहा मिला। समय रहते पता चल जाने से यह दाल बच्चों को परोसी नहीं गई वर्ना कोई अप्रिय घटना भी हो सकती थी।
8 मई को सीतापुर (उत्तर प्रदेश) के तारनपुर में स्थित सरकारी स्कूल के मिड-डे मील में कीड़े निकले।
8 मई को ही सहरसा (बिहार) के महिषी कस्बे में स्थित सरकारी स्कूल में परोसा गया मिड-डे मील खाने के फौरन बाद 250 से अधिक बच्चे उल्टी, तेज पेट दर्द और घबराहट की शिकायत करने लगे जिस पर बच्चों को तुरंत इलाज के लिए अस्पतालों में पहुंचाया गया। बच्चों के अभिभावकों का आरोप है कि मिड-डे मील में सांप था।
30 जून को खगड़िया (बिहार) में स्थित एक सरकारी स्कूल में कीड़ों वाला और खराब मिड-डे मील खाने से 25 बच्चे बीमार हो गए जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा।
और अब 3 जुलाई को दिल्ली में हरीनगर के एक सरकारी स्कूल के अपर प्राइमरी विंग के बच्चों को खाना बांटे जाने के दौरान एक हैल्पर ने मिड-डे मील के एक कंटेनर के अंदर मरी हुई छिपकली देखी। उसने तुरंत प्रशासन को सूचित किया और स्कूल प्रशासन ने तुरंत भोजन का वितरण रुकवाया।
हालांकि बच्चों को परोसने से पहले भोजन को एक अध्यापक सहित 2 वयस्कों द्वारा खा कर जांचना और कच्चे सामान व बर्तनों आदि की शुद्धता के नियमों का पालन करना जरूरी है परन्तु अधिकांश मामलों में इन नियमों का पालन ही नहीं किया जाता।
अतः मिड-डे मील बनाकर सप्लाई करने वाली संस्थाओं की निगरानी बढ़ाने और अपने यहां मिड-डे मील तैयार करने वाले स्कूलों के किचन और भोजन तैयार करने की प्रक्रिया का निरीक्षण करने तथा सुरक्षित भोजन व्यवस्था सुनिश्चित करने और उसके साथ ही घटिया खाद्य पदार्थ सप्लाई करने वालों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई करने की आवश्यकता है। इस के संबंध में पता चला है कि प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पूर्व नाम मिड डे मील) योजना के तहत भारत सरकार प्रति बच्चा (कुकिंग कॉस्ट-सामग्री) प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए प्रतिदिन 6.78 रुपये और उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए 10.17 रुपये देती है। यह केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा साझा किया जाता है।इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार द्वारा प्रति बच्चा प्रतिदिन 100 ग्राम (प्राथमिक) और 150 ग्राम (उच्च प्राथमिक) के हिसाब से मुफ्त अनाज (चावल/गेहूं) भी उपलब्ध कराया जाता है।विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कुल कुकिंग लागत का विवरण इस प्रकार हैरूबाल वाटिका और प्राथमिक स्कूल- 6.78 रुपये प्रतिदिन अपर प्राइमरी स्कूल 10.17 रुपये प्रतिदिन वित्तपोषण यह कुकिंग लागत केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा 60.40 के अनुपात (सामान्य राज्यों के लिए) में साझा की जाती है। इसके अलावा, अनाज की पूरी लागत और उसे स्कूल तक पहुंचाने का खर्च 100 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है। कुछ राज्य अपनी ओर से इसमें अतिरिक्त धनराशि
भी जोड़ते हैं। बच्चों के मिड डे मील की राशि भी सरकारी मशीनरी के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है और पर्याप्त निगरानी के अभाव में कुछ एनजीओ मिड डे मील की राशि का बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं। सरकार को इस पूरी योजना का पुनरीक्षण करना चाहिए।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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