बाॅलीवुड में वंदे मातरम् पर तीखी बहस

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर इसे केवल एक आजादी का गान नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक चेतना, राष्ट्र निर्माण का महामंत्र और सांस्कृतिक अखंडता का प्रतीक बताया गया है। इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हर भारतीय में देशभक्ति की भावना जगाई और देश को एकता के सूत्र में पिरोया। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ यह गीत प्रतिरोध और जन-जागरण का सबसे बड़ा स्वर बना। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि एक ऐसा मंत्र था जिसने देशवासियों में अदम्य साहस और बलिदान की भावना भरी। वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में की थी। 1930 के दशक में मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की राजनीति के उभार के दौरान इस गीत के कुछ शब्दों और पृष्ठभूमि को लेकर विरोध शुरू हुआ था। वर्ष 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं की सलाह पर इस गीत के शुरुआती दो छंदों को ही गाने के लिए स्वीकार किया था, क्योंकि बाद के छंदों में कुछ धार्मिक और साहित्यिक संदर्भों को लेकर असहमतियां थीं।
हाल ही में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों को गाने और इसके ऐतिहासिक-राजनीतिक महत्व को लेकर देश भर में छिड़ी बहस बॉलीवुड तक पहुँच गई है। दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और सांसद-अभिनेत्री कंगना रनौत इस मुद्दे पर आमने- सामने आ गईं, जिससे यह विवाद सिनेमा जगत की सुर्खियों में है।अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने विचार व्यक्त किया कि देश में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों की विविधता को ध्यान में रखते हुए वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंद गाना ही पर्याप्त और उचित है, क्योंकि पूरा गीत सभी के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है। भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के इस बयान की कड़ी आलोचना की। जया बच्चन की ओर से आधिकारिक तौर पर वंदे मातरम् को लेकर कोई मुख्य या विशेष राजनीतिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, संसद (राज्यसभा) में वंदे मातरम् या अन्य विषयों पर चर्चा के दौरान उनके हाव-भाव और नोकझोंक से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होते रहे हैं।
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर छिड़ी बहस के बीच बॉलीवुड की वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के हालिया बयान पर अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत ने कड़ा ऐतराज जताया है। शर्मिला टैगोर ने राष्ट्रगीत के बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों का उल्लेख करते हुए केवल शुरुआती दो छंदों को ही बनाए रखने का सुझाव दिया था। उन्होंने तर्क दिया था कि एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए इन छंदों को स्वीकार करना कठिन हो सकता है। शर्मिला टैगोर के इस बयान वाले वीडियो को अपने इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा करते हुए कंगना रनौत ने लिखा कि वे वरिष्ठ अभिनेत्री द्वारा अपनी राय व्यक्त करने का सम्मान करती हैं, लेकिन कला और कविता की इस तरह की संकुचित व्याख्या से हैरान हैं। कंगना ने उनसे हिंदू-मुस्लिम वाली मानसिकता से बाहर आने की अपील की।
शर्मिला टैगोर ने विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए वंदे मातरम् की प्रासंगिकता पर अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि जो लोग केवल एक ईश्वर में आस्था रखते हैं, उनके लिए राष्ट्रगीत के बाद के कुछ छंदों को गाना थोड़ा कठिन हो सकता है। शर्मिला टैगोर ने कहा था, मेरा दृष्टिकोण यह है कि कई धार्मिक लोग केवल एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं, अनेक देवों में नहीं। वंदे मातरम् में एक ऐसा छंद है जिसमें कई देवी-देवताओं का उल्लेख है। जो लोग एक धर्म या एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए वंदे काली, वंदे दुर्गा कहना कठिन होता है। इसलिए यदि हम भारत के सभी धार्मिक लोगों को एक साथ लेकर चलना चाहते हैं तो इसके शुरुआती दो छंद बहुत अच्छे हैं।
शर्मिला टैगोर के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कंगना रनौत ने कहा कि किसी भी कविता या गीत में शब्दों का इस्तेमाल रूपक के रूप में होता है और उसे धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। कंगना ने लिखा, मैं इस बात की सराहना करती हूं कि शर्मिला जी ने वंदे मातरम पर अपनी बात रखी, लेकिन एक कलाकार के तौर पर मुझे हैरानी है कि कला और कविता पर उनकी सोच इतनी सीमित और बनावटी कैसे हो सकती है। किसी भी गीत में कवि अपनी
बात का गहरा असर छोड़ने के लिए विभिन्न कल्पनाओं और प्रतीकों का सहारा लेता है। वंदे मातरम् हमारे स्वतंत्रता संग्राम की भावना है,
जिसमें बंकिम चंद्र जी देशवासियों
के भीतर की शक्ति को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। आप कला के इतने महान नमूने को सिर्फ एक धार्मिक रीति-रिवाज तक कैसे सीमित कर सकती हैं?
कंगना ने कविता में शक्ति के संदर्भ को महज एक धार्मिक प्रतीक के बजाय ऊर्जा और ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों को उद्धृत करते हुए अपनी बात रखी। कंगना ने लिखा, स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मुझे ऐसे युवा चाहिए जिनकी मांसपेशियां लोहे की, हड्डियां स्टील की और नसों में बिजली दौड़ती हो। वे मौसम का हाल नहीं बता रहे थे, बल्कि देश की युवा शक्ति का आह्वान कर रहे थे। कृपया इस हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से बाहर आएं। यदि हम एक ही ईश्वर पर विश्वास करते हैं, तब भी डॉक्टर ताकत को शक्ति ही कहते हैं।
वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी, जिसे बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का मुख्य प्रतीक बन गया था। गीत के शुरुआती दो छंदों में भारत माता के प्राकृतिक सौंदर्य और उर्वरता का वर्णन किया गया है, जबकि बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से समय-समय पर इसके विभिन्न छंदों को लेकर बौद्धिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं। (हिफी)



