ममता के चुनावी प्रतिद्वन्द्वी

इस बार के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए ज्यादा मुश्किल भरे हो सकते हैं। उनकी सबसे बड़ी चुनावी प्रतिद्वन्द्वी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ही है। इसके साथ ही कई अन्य पार्टियां, जो भाजपा की विरोधी हैं, ममता बनर्जी के खिलाफ ही मोर्चाबंदी कर रही हैं। वामपंथी पार्टियों के लिए तो कह सकते हैं कि ममता बनर्जी ने उनसे सत्ता छीनी थी, इसलिए विरोध करना उनका राजनीतिक कर्तव्य है लेकिन मुसलमानों के कथित हिमायती असदउद्दीन ओवैसी भी ममता के खिलाफ मजबूत किलेबंदी कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस से निकाले गये विधायक हुमायूं कबीर ने तो कथित बाबरी मस्जिद की नींव रखकर एक नयी पार्टी बना ली है। जनता उन्नयन पार्टी के नाम से बनी यह पार्टी माकपा और एआईएमआईएम के साथ मिलकर मोर्चा खड़ा करना चाहती है। कांग्रेस अभी तय नहीं कर पा रही है कि कहां जाए? ममता बनर्जी के साथ भी जा सकती है लेकिन तृणमूल कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक समझा जाने वाला मुस्लिम समाज के वोट नया मोर्चा काट सकता है। इसलिए ममता बनर्जी की राह इस बार काफी कठिन हो सकती है। पश्चिम बंगाल के बजट मंे इस बार इमामों और मोआज्जिनों का भत्ता नहीं बढ़ाया गया। इससे भी ममता का प्रमुख वोट बैंक नाराज है।
पश्चिम बंगाल में एक ओर भाजपा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मात देने की रणनीति बना रही है तो दूसरी ओर, विपक्षी पार्टियां माकपा, आईएसएफ और एआईएमआईएम तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमांयू कबीर की पार्टी के साथ समझौता करने की तैयारी शुरू कर दी है। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास को लेकर हुमायूं कबीर की ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से तकरार शुरू हुई। उसके बाद पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया। हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी जनता उन्नयन पार्टी का गठन किया है और ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। लेकिन हुमायूं कबीर अकेले चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि सीपीआई-एम, आईएसएफ और एमआईएम से हुमायूं कबीर ने गठबंधन की तैयारी शुरू कर दी है।
भरतपुर के विधायक हुमायूं कबीर ने खुद ही समझौते की बात स्वीकार की है। उन्होंने कहा कि सभी पार्टियों से बातचीत चल रही है। 25 फरवरी तक अलायंस फाइनल हो जाएगा। अगर अलायंस होता है, तो वह 135 से कम सीट पर चुनाव नहीं लड़ेंगे और अगर अलायंस होता है, तो यह मोहम्मद सलीम के नेतृत्व में ही होगा। उन्होंने कहा कि अगर अलायंस नहीं हुआ तो मैं अकेले 182 सीटों पर लड़ूंगा। मेरा मेन टारगेट तृणमूल कांग्रेस को हराना है और बीजेपी को मेजोरिटी तक नहीं पहुंचने देना है। ऐसे में अगर सलीम साहब अलायंस की लीडरशिप देते हैं तो मैं मान लूंगा। मैं किसी और को अलायंस का लीडर नहीं मानूंगा।
दूसरी ओर माकपा ने गठबंधन के प्रस्ताव को लेकर एआईएमआईएम के स्टेट प्रेसिडेंट इमरान सोलंकी को फोन किया है इमरान ने कहा, मुझे फोन आया था। वे हमारे साथ बैठना चाहते हैं। हम जरूर बैठेंगे। मैं उनकी राय जानूंगा। वे जहां बैठना चाहें, कोलकाता या मुर्शिदाबाद, मैं वहीं बैठूंगा। क्या तब लेफ्ट सच में मीटिंग करेंगे? माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, राम, श्याम, जो भी कहें, हमें उनका जवाब देना होगा! यह सच नहीं है कि सीपीआई-एम, एमआईएम से बात करने के लिए उछल रही है।
वहीं, तृणमूल के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि माकपा की हालत बद से बदतर है। मेरा किसी प्रोफेशन को नीचा दिखाने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन माकपा की हालत सड़क पर भीख मांगने वाले से भी बदतर है। वे घर-घर जाकर भीख मांग रहे हैं।
माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने सस्पेंडेड तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर के साथ हाल में बैठक की है, जिसके लिए उन्हें पहले पार्टी और फिर लेफ्ट के साथियों की आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन इस बीच गठबंधन को लेकर कांग्रेस और लेफ्ट के बीच तकरार शुरू हो गयी है। माकपा सचिव सलीम ने नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के चयन को लेकर सवाल उठाया और तृणमूल के साथ साठगांठ के आरोप लगाये। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने कहा कि जब हमने पहले अलायंस किया था, तो वह भी पार्टी का मिलकर किया गया फैसला था। कांग्रेस का साथ छोड़ने के बाद आईएसएफ ने भी मोलभाव शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, आईएसएफ पहले से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। वो 50 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। पिछली बार, यानी 2021 में, उन्होंने 32 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन फॉरवर्ड ब्लॉक और दूसरे लेफ्ट पार्टनर आईएसएफ के लिए और सीटें छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में माकपा पर दबाव बढ़ाते हुए आईएसएफ ने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ बातचीत शुरू कर दी है। आईएसएफ के विधायक नौशाद सिद्दीकी का कहना है कि हम अपनी स्टेट कमेटी मीटिंग में हुमायूं की पार्टी पर जरूर बात करेंगे। हमने पहले इस पर बात नहीं की क्योंकि उस पार्टी के चेयरमैन ने कई गैर-जरूरी बातें कह दी थीं। अब उन्होंने वे बातें वापस ले ली हैं और माफी मांग ली है। इसलिए, अब बातचीत हो सकती है।
इससे ममता बनर्जी के वोट बैंक मंे सेंध लगेगी। वहीं वोट बैंक बजट से भी नाराज है। पश्चिम बंगाल के बजट में लक्ष्मी भंडार, आशा वर्कर्स से लेकर आंगनवाड़ी, सिविक वॉलंटियर्स सभी का भत्ता बढ़ा है। वहीं, बजट में इमामों और मोअज्जिनों का भत्ता नहीं बढ़ा है। इससे मुस्लिम समुदाय के लोग सीएम ममता बनर्जी से नाराज हैं। राज्य के अल्पसंख्यकों में ममता बनर्जी की सरकार को लेकर गुस्सा है। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 27 फीसदी है, जो वर्तमान में करीब 34 फीसदी मानी जाती है। मुस्लिम ममता बनर्जी के बड़े वोटबैंक माने जाते हैं और इसी वोटबैंक के सहारे ममता बनर्जी चुनाव जीतती रही हैं, लेकिन चुनाव से पहले मुस्लिम नाराज हैं। इससे ममता बनर्जी की चुनौती बढ़ सकती है। बजट में आशा वर्कर्स का भत्ता 1000 रुपए बढ़ा है। उनका कहना है कि उन्हें इससे ज्यादा फायदा नहीं मिला है। मिड-डे मील वर्कर्स और पार्ट-टाइम टीचर्स भी खुश नहीं हैं। इस बार मोअज्जिन भी गुस्से की लिस्ट में अपना नाम जोड़ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस समर्थित इमाम ऑर्गनाइजेशन के जलपाईगुड़ी सदर ब्लॉक के प्रेसिडेंट और जलपाईगुड़ी गरल बारी मस्जिद के इमाम जहीरुल इस्लाम ने भत्ता नहीं बढ़ने पर नाराजगी जताई है। जहीरुल इस्लाम का कहना है कि इस राज्य बजट में सभी का भत्ता कमोबेश बढ़ाया गया है, लेकिन सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। जिस रेट से कीमतें बढ़ी हैं, 3000 रुपये महीने के भत्ते से कुछ नहीं होता है, अगर यह कम से कम 500 रुपये भी बढ़ जाता, तो मैं समझ जाता कि सरकार ने हमारे लिए कुछ नया सोचा है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



