सर्वजन का फार्मूला बना रहीं मायावती

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती ने तैयारियों के साथ उनकी समीक्षा भी शुरू कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती एक बार फिर चुनावी अभियान की कमान अपने हाथों में थामती दिख रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने सीधे तौर पर यूपी चुनाव 2007 के जीत के फॉर्मूले को एक बार फिर जमीन पर उतारने के लिए रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। मायावती ब्राह्मण वोट बैंक को साधती भी दिख रही है। आगामी 22 व 23 जून को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी
अयोध्या और अकबरपुर में बड़ी जनसभा करने का मकसद ब्राह्मण और मुसलमान मतदाताओं को फिर से बसपा के साथ जोड़ना है। मायावती 2007 के नतीजे दोहराने के लिए बार-बार अपने पुराने फार्मूले को अपनाती दिख रही हैं। इसीलिए मायावती ने लखनऊ में आयोजित पार्टी की चुनावी तैयारियों की समीक्षा बैठक में कहा था कि लोगों को 2007 की तरह भरोसा करना होगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि हमारी सरकार ने ब्राह्मण समाज एवं कमजोर तबकों सहित सर्वसमाज के लोगों को उपेक्षा एवं असुरक्षा से निकाला था। तमाम लोगों को पार्टी एवं सरकार में उचित भागीदारी और भरपूर आदर-सम्मान दिया गया। उन्होंने साफ तौर पर संदेश दिया है कि सर्वसमाज का हित बसपा में ही सुरक्षित है। इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और इसकी प्रमुख मायावती चर्चा का विषय बनी हुई हैं। चर्चा है कि मायावती आगामी यूपी चुनाव 2027 में कुछ बड़ा करने जा रही हैं। इसी बीच यह भी चर्चा है कि क्या बीएसपी 2027 के यूपी चुनाव में गठबंधन करके उतरेंगी। हालांकि वह गठबंधन किसके साथ और कब होगा यह केवल अनुमानों में है।
बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। अगले साल की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीएसपी सुप्रीमो ने 24 मई को अपनी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ गहन समीक्षा बैठक की, जिसके बाद से लखनऊ से लेकर दिल्ली तक में चर्चाओं का बाजार गरम हो चला है। इस बैठक के बाद मायावती ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कीं, बल्कि उन्होंने सोशल मीडिया पेज एक्स से दो पेज की प्रेस विज्ञप्ति जारी करके छोड़ दीं। मायावती के प्रेस के सामने नहीं आने के बाद लोगों के मन में कई और सवाल उठने लगे हैं। मायावती को लेकर चर्चा है कि वह 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में जरूर गठबंधन करेंगी। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से बिलकुल खामोश हो गई हैं। सन 2007 से 2012 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद ना केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बीएसपी का जनाधार लगातार गिर रहा है। पार्टी के लगातार खराब प्रदर्शन के बाद भी मायावती किसी भी चुनाव में खास
सक्रिय नहीं दिखती हैं। अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले
मायावती के ऐक्टिव होने से अनुमानों का बाजार गरमाने लगा है। मायावती की ओर से जारी दो पन्ने के प्रेस नोट में दो तीन बातें गौर करने लायक
है, जिसको लेकर चर्चाएं शुरू होना लाजिमी है।
बसपा प्रमुख मायावती ने लखनऊ की समीक्षा बैठक में भाजपा पर निशाना साधा। सत्ताधारी पार्टी और सरकारों पर वादों की खानापूरी करने और अप्रत्याशित एवं अभूतपूर्व तरीके से चुनाव को प्रभावित करने में सफल होने का आरोप लगाया। मायावती ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया कि विरोधियों के धुरंधर एवं जुगाडू चालों का मुकाबला करने के लिए तैयार रहिए। यूपी चुनाव 2027 में हमें इस प्रकार की स्थिति का पूरी तरह डटकर सामना करना है। बसपा प्रमुख मायावती ने इसी के तहत संगठन में फेरबदल भी शुरू कर दिया है। अखिलेश आम्बेडकर को लखनऊ मंडल का दायित्व सौंपा गया है। मायावती ने बैठक में पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में हुए चुनावों की चर्चा करते हुए भाजपा पर सीधा हमला बोला। पार्टी पदाधिकारियों से कहा कि चुनाव में जो कुछ हुआ और जिस प्रकार से हुआ, उसका समुचित संज्ञान लेने की जरूरत है। बसपा की कैडर बैठकों में लोगों को इन कटु अनुभवों से अवगत कराना जरूरी है। मायावती ने कहा कि पिछले चुनावों से सबक लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि में होने वाले चुनावों की तैयारी में जुटना है। पार्टी संगठन की पोलिंग बूथ स्तर तक पहुंच को मजबूत करने पर जोर दिया गया। मायावती ने कहा कि पार्टी की सरकार के कामों को जनता तक पहुंचाइए। सभी वर्ग का भरोसा हासिल करने पर उन्होंने जोर दिया।
मायावती की चुनाव तैयारियों के मुख्य बिंदु इस प्रकार देखे जा सकते हैं। सबसे पहला यह कि बसपा गठबंधन से दूर रहेगी और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला है । मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि बीएसपी 2027 का चुनाव किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन किए बिना अकेले ही लड़ेगी। उन्होंने समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले को सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। पार्टी को मजबूत करने के लिए मंडल प्रभारियों और जिलाध्यक्षों के स्तर पर बड़े बदलाव किए गए हैं। खराब प्रदर्शन करने वालों को जिम्मेदारियों से हटाया गया है या उनके कार्यक्षेत्र बदले गए हैं। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे बूथ स्तर पर जाकर पार्टी संगठन को मजबूत करें और युवाओं व नए मतदाताओं को पार्टी से जोड़ें। मायावती की चुनाव तैयारी में इस बार सबसे महत्वपूर्ण है सोशल इंजीनियरिंग। दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों को जोड़ने के लिए 2007 के ‘सर्वसमाज’ वाले फॉर्मूले पर फिर से काम किया जा रहा है। मायावती लगातार कार्यकर्ताओं से अपील कर रही हैं कि वे अन्य पार्टियों के छलावे की राजनीति से सतर्क रहें।
सवाल उठ रहा है कि मायावती के लिए 2027 में गठबंधन करना क्या है जरूरी है। इसका जवाब हां में ही आता है। मौजूदा समय में मायावती की पार्टी के केवल एक विधायक हैं। बीएसपी लोकसभा, राज्यसभा, यूपी विधान परिषद में शून्य पर है। 2014 के लोकसभा में बीएसपी का खाता नहीं खुला। 2019 में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया जिसके चलते उनके 10 सांसद जीते जबकि 2024 में फिर अकेले लड़ीं तो एक बार फिर से पार्टी का रिजल्ट शून्य ही रहा। इसी यूपी में विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2012 में जब मायावती सत्ता से बाहर गईं तो उनके 80 विधायक जीते थे जबकि 2017 के चुनाव में जब बीजेपी 325 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हुई तब बीएसपी के केवल 19 विधायक जीते और 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी यूपी में केवल एक विधायकों तक सिमट गई। वोट हासिल करने के मामले में भी बीएसपी का प्रदर्शन लगातार गिरता रहा है। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को उत्तर प्रदेश में लगभग 19.6 फीसद और देश स्तर पर लगभग 4.2ण् फीसद वोट मिले जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को यूपी में लगभग 19.3 फीसद वोट मिले। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3.6 फीसद वोट मिले। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का वोट प्रतिशत काफी घटा और यूपी में लगभग 9.3 फीसद और पूरे देश में लगभग 2.07फीसद रहा। जहां तक यूपी विधानसभा चुनावों की बात है तो 2017 में 22.23फीसद और 2022 में केवल 12.88फीसद पर सिमट गया। यानी मायावती की पार्टी लगातार रसातल में जाती रही।
फिलहाल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) देश की राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन चुनाव दर चुनाव उसके घटते जनाधार के चलते वह राष्ट्रीय पार्टी बनने रहने के किसी भी नियम को फॉलो नहीं कर पा रही है। राष्ट्रीय पार्टी के लिए कम से कम 4 राज्यों में एक ‘राज्य स्तरीय दल’ (स्टेट पार्टी) के रूप में मान्यता होनी चाहिए। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



