मायावती के जख्म

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती को गत 5 अगस्त 2026 को एक और जख्म मिला, जब उनकी पार्टी के यूपी मंे इकलौते विधायक उमाशंकरसिंह का निधन हो गया। बलिया जिले की रसड़ा विधनसभा सीट से उन्हांने विजश्री हासिल की थी। मायावती की पार्टी राजनीतिक संकट से जब गुजर रही थी, तब उमाशंकर सिंह की जीत संजीवनी बूटी बनी थी। इतना ही नहीं बसपा प्रमुख मायावती को बहिन जी तो पार्टी के सभी नेता कहते हैं लेकिन उमाशंकर सिंह उन्हंे सचमुच बहिन जी मानते थे। मायावती भी उन्हंे राखी बांधती थीं। उन्होंने बहुत भावुक होकर कहा कि भाई तो बहुत बने लेकन उन्हंे (उमाशंकर) छोड़कर सबने धोखा दिया। उमाशंकर सिंह को दी गयी श्रद्धांजलि में मायावती का दर्द छलकता है। मायावती कड़े फैसले लेने वाली नेता मानी जाती हैं लेकिन उन्हें अपनत्व की निष्ठा नहीं मिल पायी। उनके विश्वसनीय नेता उनका साथ छोड़ गये तो परिवार से भी निराशा ही मिली। अपने भतीजे आकाश के ससुर को बार-बार इस उम्मीद से जोड़ा कि कड़े परिश्रम से खड़ी गयी पार्टी को नयी गति देंगे लेकिन उनके कार्य-व्यवहार से दुखी होकर उन्हंे फिर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। उत्तर प्रदेश मंे अगले साल ही विधानसभा के चुनाव होने हैं और बसपा इन चुनावों मंे अपनी पुरानी स्थिति बहाल करने की उम्मीद जताती है।
बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के निधन पर बसपा प्रमुख मायावती भावुक हो गईं। मायावती ने उमा शंकर सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने पूरी ईमानदारी, समर्पण और निष्ठा के साथ पार्टी की सेवा की। बीएसपी में रहते हुए वे न केवल अपने चुनाव क्षेत्र, बल्कि पूरे समाज के प्रति भी समर्पित रहे। मायावती ने कहा, वे हमारी पार्टी के सच्चे समर्पित नेता थे। लंबी बीमारी के बाद 5 अगस्त उनके निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुख हुआ। मायावती ने कहा कि भले ही उमा शंकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके परिवार से कहना चाहूंगी कि उमा शंकर सिंह ने जीवन भर ईमानदारी की मिसाल पेश की। सरकारें बदलीं, राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने कभी पार्टी के साथ विश्वासघात नहीं किया। सच्चे अर्थों में, वे मुझे अपनी सगी बहन मानते थे।
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले फुल एक्शन में आ गई हैं। उन्होंने पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद और अपने समधी अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से फिर निकाल दिया है। इसके अलावा ठैच् ने सहारनपुर निवासी और पार्टी कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल पर भी कार्रवाई की गई है। इससे पहले मायावती अशोक सिद्धार्थ को 2025 में भी पार्टी से बाहर कर चुकी हैं। अशोक सिद्धार्थ के बाद मायावती ने पिछले साल अपने भतीजे आकाश आनंद को भी पार्टी से निकाल दिया था। माफी मांगने के बाद अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद को पार्टी में वापस लिया था। मायावती ने अपने इस एक्शन की जानकारी सोशल मीडिया एक्स पर दी है। उन्होंने एक लंबे पोस्ट में अशोक सिद्धार्थ पर पहले भी लिए गए एक्शन का जिक्र किया है। मायावती ने लिखा कि यह बात सभी लोग जानते हैं कि पूर्व सांसद अशोक सिद्धार्थ अशोक सिद्धार्थ, पूर्व सांसद को महाराष्ट्र के चुनाव में खासकर पार्टी टिकट के बंटवारे को लेकर बी.एस.पी. महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष आदि के साथ सही से तालमेल करके नहीं चलने की वजह से अनुशासनहीनता व दिशा-निर्देश का उल्लंघन करने पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था तथा उन्हें दोबारा पार्टी में इस शर्त के साथ वापस लिया गया था कि वे दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे और साथ ही उन्हें उत्तर प्रदेश में कहीं पर भी नहीं, बल्कि केवल दूसरे राज्यों में ही पार्टी के जनाधार को बढ़ाने की जिम्मेदारी दी जायेगी।
गौरतलब है कि 31 जुलाई को ही मायावती साफ कर चुकी हैं कि यूपी में विधान सभा चुनावों के लिए टिकट फाइनल करने में आकाश आनंद का कोई रोल नहीं है । माना जा रहा है कि यूपी विधान सभा चुनाव के पहले मायावती अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद की बढ़ती ताकत से काफी खफा हैं।अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर करके ये संदेश देना चाहती है कि बसपा में
वही होगा जो मायावती चाहेंगी। अशोक सिद्धार्थ अभी दक्षिण राज्यों के पार्टी प्रभारी थे।
बसपा के जिन नेताओं को प्रदेश स्तर पर पहचान हासिल हुई थी वह एक-एक करके बसपा से अलग हो गए हैं। 2007 में जब प्रदेश में बसपा की बहुमत की सरकार बनी थी, तब मायावती ने जितने विधायकों को कैबिनेट मंत्री बनाया था, उनमें से आज एक्का-दुक्का ही बसपा के साथ खड़े हैं। पिछले 12 सालों में बसपा सुप्रीमो पार्टी के कई दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं। इनमें कई ऐसे भी नाम हैं, जिन्हें एक समय मायावती का सबसे करीबी नेता माना जाता था। इनमें लालजी वर्मा न सिर्फ विधानमंडल दल के नेता थे बल्कि वर्मा वह नेता हैं, जिनके प्रदेश अध्यक्ष रहते 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार यूपी में बनी थी। राम अचल राजभर भी मायावती के खासम खास माने जाते रहे हैं।
2007 में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती ने नकुल दुबे, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, रामवीर उपाध्याय, ठाकुर जयवीर सिंह, सुधीर गोयल, स्वामी प्रसाद मौर्य, वेदराम भाटी, चैधरी लक्ष्मी नारायण, राकेश धर त्रिपाठी, बाबू सिंह कुशवाहा, फागू चैहान, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद चैधरी, धर्म सिंह सैनी, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर और इंद्रजीत सरोज को बड़े पोर्टफोलियो दिए थे। इनमें से सिर्फ नकुल दुबे, सुधीर गोयल और सुखदेव राजभर ही पार्टी के साथ खड़े रहे।
ऊपर जिन 18 मंत्रियों का जिक्र किया गया है, उनमें से 15 नेताओं ने दूसरी पार्टियों का हाथ थाम लिया। रामवीर उपाध्याय, राम अचल राजभर और लाल जी वर्मा जैसे नेता बसपा से निष्कासित तो हुए लेकिन कोई और पार्टी ज्वाइन नहीं कर पाए। रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय जरूर भाजपा में शामिल हो गई थीं।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। अब कांग्रेस से भी अलग हो गये हैं। ठाकुर जयवीर सिंह, वेदराम भाटी, स्वामी प्रसाद मौर्य, चैधरी लक्ष्मी नारायण, फागू चैहान और धर्म सिंह सैनी ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर ली। इन्हें ऐसा करने का उपहार भी मिला। बसपा से निकलने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा ने भी भाजपा ज्वाइन की थी लेकिन बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और अपनी जन अधिकार पार्टी बनाई। इंद्रजीत सरोज और राम प्रसाद सैनी जैसे नेताओं ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। बृजेश पाठक का नाम भी बसपा के कद्दावर नेताओं में गिना जाता था। वह मौजूदा योगी सरकार में डिप्टी सीएम हैं।
दिवंगत कांशीराम ने अलग-अलग समाज के लोगों को चुनकर उन्हें नेता बनाया था। ओमप्रकाश राजभर, सोनेलाल पटेल, आर के चैधरी और मसूद अहमद ऐसे ही नेताओं में शामिल रहे हैं लेकिन सभी बिछड़ते गए। राजभर ने 2002 में, दिवंगत सोनेलाल पटेल ने 1995 में और आर के चैधरी ने 2016 में बसपा छोड़ दी थी। आर के चैधरी तो राजनीति में कोई जगह हासिल नहीं कर पाए लेकिन ओमप्रकाश राजभर और
सोने लाल पटेल की पार्टी अपना दल आज भी अच्छी खासी राजनीतिक ताकत रखते हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



