लेखक की कलम

मेयर आरती भंडारी फिर भाजपा में

नगर निगम चुनाव में आरती भंडारी और लखपत भंडारी ने भाजपा का दामन छोड़ दिया था। इससे श्रीनगर गढ़वाल में राजनीति के समीकरण बदल गये थे। राज्य मंे सत्तारूढ़ भाजपा वहां कमजोर पड़ गयी थी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं, तब मेयर आरती भंडारी और लखपत भंडारी ने फिर भाजपा का दामन थामा है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की चुनावी रणनीति का यह एक हिस्सा बताया जा रहा है।
मेयर आरती भंडारी के फिर से भाजपा का दामन थामने से चुनावी समीकरण बदल गए हैं। आरती भंडारी और लखपत भंडारी की एंट्री के बाद सोशल मीडिया से चैक-चैराहों तक बहस छिड़ गई। भाजपा के भीतर भी नए समीकरण नजर आने लगे हैं।नगर निगम चुनाव में भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने और अब दोबारा भाजपा में आने तक आरती भंडारी और लखपत भंडारी का राजनीतिक सफर चर्चा के केंद्र में है। यही वजह है कि 19 अगस्त की ज्वाइनिंग को सामान्य दल-बदल के बजाय स्थानीय राजनीति के बदले समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में पार्टी संगठन के भीतर जिम्मेदारियों और राजनीतिक तालमेल की तस्वीर साफ होने के साथ ही इसके वास्तविक असर का भी आकलन हो सकेगा।
नगर निगम चुनाव में भाजपा से बगावत, निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मुकाबला और जीत के करीब डेढ़ साल बाद फिर उसी पार्टी में वापसी। श्रीनगर की मेयर आरती भंडारी और उनके पति लखपत भंडारी के भाजपा में शामिल होने के बाद शहर की राजनीति में एक बार फिर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं तो भाजपा के भीतर भी इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद बनने वाले नए समीकरणों को लेकर चर्चा है। शहर के गली-मोहल्लों और चैक-चैराहों पर भी अब बात केवल नगर निगम तक सीमित नहीं है, बल्कि लोग इसके राजनीतिक मायने 2027 के विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं।
नगर निगम चुनाव से पहले लखपत भंडारी व आरती भंडारी भाजपा से जुड़े थे। मेयर पद महिला के लिए आरक्षित होने के बाद आरती भंडारी टिकट की दावेदार थीं, लेकिन पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर दोनों ने अलग राह चुन ली। आरती भंडारी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरीं और चुनाव जीतकर मेयर बनीं। बगावत के बाद पार्टी की ओर से लखपत भंडारी के खिलाफ छह वर्ष के निष्कासन की कार्रवाई भी की गई थी। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं। मेयर आरती भंडारी, लखपत भंडारी और पार्षदों के भाजपा में शामिल होने के साथ ही नगर निगम में पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है। इसके साथ ही चुनाव के समय आमने-सामने रहे नेताओं के एक मंच पर आने को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक समर्थकों के बीच सवाल-जवाब और आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो गए हैं। इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू भाजपा की अंदरूनी राजनीति से जुड़ा माना जा रहा है। नगर निगम चुनाव में पार्टी के साथ खड़े रहे पुराने कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदारों के बीच नई एंट्री को लेकर क्या समीकरण बनेंगे, इस पर भी नजर रहेगी।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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