पंच परिवर्तन से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण

हमारे देश को आजादी मिले 78 वर्ष हो चुके हैं लेकिन देश मंे सामाजिक सौहार्द का अभाव, भ्रष्टाचार और संस्कारहीनता बनी हुई है। हम अधिकारों की बात करते हैं लेकिन कत्र्तव्य निभाने से पीछे हट जाते हैं। इसलिए राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। आज से लगभग सौ साल पहले 1925 मंे महाराष्ट्र के नागपुर मंे डा. हेडगेवार के प्रयास से स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने प्रचारकों के माध्यम से यही कार्य करवा रहे हैं। गत 17 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमती नगर स्थित पत्रकारपुरम मंे आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री प्रेम कुमार जी ने संघ और पंच परिवर्तन से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण पर विस्तार से चर्चा की। प्रेम कुमार जी के साथ वृजनंदन जी भी समाज को जगाने का कार्य कर रहे हैं। उन्हांेने बताया कि इसी क्रम मंे जगह-जगह हिन्दू सम्मेलन भी किये जाएंगे। हमें इस सच्चाई को जन-जन तक पहुंचाना है कि भारत मंे रहने वाले सभी मूल रूप से हिन्दू हैं और हिन्दू कोई धर्म नहीं बल्कि शांति एवं सुखमय जीवन का एक दर्शन है। सामाजिक सद्भाव बहुत जरूरी है।
हिन्दू-एकता का भाव लेकर वर्ष 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में पूज्य डॉ. हेडगेवार के प्रयास से आरंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक नामक विटप आज अक्षयवट का रूप धर चुका है। विश्व के लगभग 80 देशों में 50 से अधिक संगठन, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत हैं। यह संगठन अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। राष्ट्रोन्नयन तथा सेवा का पर्याय बन चुका यह संगठन प्राकृतिक आपदा हो या मानवकृत राष्ट्र प्रथम का भाव लेकर सभी को समान रूप से सहयोग प्रदान करता रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए गत 99 वर्षों से अविरल कार्यरत है। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक, मथुरा के परखम गांव में स्थित दीनदयाल
उपाध्याय गौ विज्ञान अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित हुई, जिसमें भारतीय समाज में अनुशासन के भाव को बढ़ाने के उद्देश्य से सर संघचालक ने पंच परिवर्तन का आह्वान किया जिससे कि अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर राष्ट्रोन्नयन की दिशा में कार्य करने के लिए उद्यत हों।
इस पंच परिवर्तन में पांच आयाम शामिल किए गए हैं – (1) स्व का बोध अर्थात स्वदेशी, (2) नागरिक कर्तव्य, (3) पर्यावरण, (4) सामाजिक समरसता एवं (5) कुटुम्ब प्रबोधन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। स्व के बोध से नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होंगे। नागरिक कर्तव्य बोध अर्थात कानून की पालना से राष्ट्र समृद्ध व उन्नत होगा। सामाजिक समरसता व सद्भाव से ऊंच-नीच जाति भेद समाप्त होंगे। पर्यावरण से सृष्टि का संरक्षण होगा तथा कुटुम्ब प्रबोधन से परिवार बचेंगे और बच्चों में संस्कार बढ़ेंगे। समाज में बढ़ते एकल परिवार के चलन को रोक कर भारत की प्राचीन परिवार परंपरा को बढ़ावा देने की आज महती आवश्यकता है। ये पांच परिवर्तन आगामी वर्षों में भारतीय समाज को दिशा देने वाले हैं।
सामाजिक समरसता का अर्थ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द और प्रेम बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने से है। सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक है कि जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को समाप्त किया जाए। साथ ही, समाज के सभी वर्गों और वर्णों के बीच एकता स्थापित की जाए। सामाजिक समरसता का अर्थ है सभी को आत्मवत समझना। इससे ही सभ्य समाज का निर्माण संभव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि में सामाजिक समरसता के लिए लोगों में आपसी प्रेम और सद्भाव आवश्यक है तथा इसके लिए जनमानस में परस्पर प्रेम और सहयोग के प्रति जागरूकता आवश्यकता है। एतदर्थ समुदाय में शिक्षा के माध्यम से इसके विषय में सही जानकारी और सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों का समर्थन करना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह भी मत है कि परिवार को राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाई के रूप में संवर्धित करना आज की मांग है। सर्वसमान्य का यह पुरा काल से ही कहना है कि खुशहाल और स्वस्थ परिवार ही शांतिपूर्ण और समृद्ध समाज की कुंजी हैं। भारत में, वर्षों से एक अनूठी पारिवारिक प्रणाली विकसित हुई है। सभी भारतीय दर्शनों का मूल चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा पर आधारित है। इसके साथ चार आश्रम जुड़े हुए हैं। गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण आश्रम घोषित किया गया है। सभी आश्रमों में, विशेष रूप से गृहस्थ आश्रम में, लोगों को तीन ऋणों (ऋणों)- देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण और समाज ऋण का ध्यान रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। परिवार और वैवाहिक जीवन की भारतीय प्रणाली समाज और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र और ब्रह्मांड के साथ जुड़ी हुई है।
पृथ्वी को माता मानकर पर्यावरण संरक्षण हेतु जीवनशैली में बदलाव करना और इसके लिए सामान्य जनमानस में विचार डालना हमको वेदों ने सिखाया है। माता भूमि का मतलब है जन्म स्थान या अपना देश। भारतीय संस्कृति में जन्म भूमि को माता माना जाता है और उस पर बहुत सम्मान दिया जाता है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गाऽदपि गरियसी। हिन्दू धर्म में भूमि को भूदेवी, धरणी, और वसुंधरा के नाम से भी जाना जाता है।
देश की स्वदेशी अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता पर जोर देना होगा। आत्मनिर्भर भारत का आशय केवल आयात कम करना ही नहीं, हमारी क्षमता, रचनात्मकता और कौशल को भी बढ़ाना हैं। हमें मेक इन इण्डिया के साथ साथ मेक फॉर वर्ल्ड की व्यापक संकल्पना के साथ आगे बढ़ना होगा।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी की सोच ने ही स्वराज का पाठ प्रशस्त किया। इसे ही आज संघ पुनः मंत्र रूप में लेकर स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से जन जन तक पहुँचने को संकल्पित है। स्वामी विवेकानन्द ने विदेशों में भारतीय संस्कृति की महानता को, धर्म के विदेशी स्वरूप को स्पष्ट और तार्किक रूप में रखा, जिससे कि भारतीयों में अपने देश व संस्कृति को लेकर एक आत्मनिर्भरता की भावना विकसित और समद्धृ हुई।
इसलिए प्रत्येक नागरिक का धर्म है कि सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन करे और राष्ट्रहित में योगदान दें। नागरिक कर्तव्य, एक समृद्ध और लोकतांत्रिक समाज में रहने के लिए आवश्यक तत्त्व होते हैं। ये कर्तव्य, नागरिकों की जिम्मेदारियां और अधिकार होते हैं। इस प्रकार हम अपने राष्ट्र का प्राचीन गौरव के साथ पुनर्निर्माण कर सकते हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)


