मनरेगा का नया अवतार जी राम जी

ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा को बढ़ाने के उद्देश्य से 7 सितम्बर 2005 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) बनी थी। इसको बाद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जोड़ा गया क्योंकि गांधी जी कहा करते थे कि जब तक गांव विकसित नहीं होंगे तब तक देश की आजादी अधूरी मानी जाएगी। इसीलिए 2 अक्टूबर 2009 को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इसका नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना अर्थात मनरेगा कर दिया था। उस समय इसका उद्देश्य गांवों से शहरों की तरफ पलायन रोकना भी था। इसलिए ग्रामीण परिवारों को रोजगार की मांग करने पर 100 दिन का रोजगार मिलता थां योजना बहुत अच्छी थी लेकिन इसका कार्यान्वयन ईमानदारी से नहीं हुआ। मजदूरों के नाम पर परिवार के सदस्यों के नाम लिखे गये। शहरों की तरफ मजदूरों का पलायन भी नहीं रुका। सड़कें और आदर्श तालाब कहीं दिखाई नहीं पड़ते। आज 20 वर्ष बाद भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने मनरेगा का नया अवतार प्रकट किया है। इसका नाम विकसित भारत, रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी विकसित भारत जी राम जी हो जाएगा। इसके लिए विकसित भारत जी राम जी विधेयक 2025 मोदी सरकार ने पेश किया है। सरकार खुद कहती है कि मनरेगा में कई समस्याएं थीं। वर्ष 2024-25 में राज्यों में कुल 193.76 करोड़ का गबन हुआ। इसके साथ ही 23 राज्यों की माॅनीटरिंग से पता चला कि काम या तो हुए ही नहीं या खर्च के हिसाब से नहीं किये गये। इसलिए सरकार के लिए सिर्फ नाम बदलना पर्याप्त नहीं है, इस योजना को ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए ताकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का गांवों को लेकर सपना साकार हो सके।
मनरेगा में हालिया बदलावों (दिसंबर 2025 के अनुसार) में योजना के नाम को बदलकर पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना करना और काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करना शामिल है, जिससे ग्रामीण परिवारों को अधिक रोजगार और सुरक्षा मिल सके। इसके अतिरिक्त, यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण और आर्थिक समावेश को बढ़ावा देने पर जोर देती है, जिसमें मजदूरी और परिसंपत्ति निर्माण (जैसे सड़कें, तालाब) पर ध्यान दिया जाता है। ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में सरकार बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा के नाम और ढांचे में अहम बदलाव होने जा रहे हैं। केंद्र सरकार मौजूदा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की जगह एक नया ग्रामीण रोजगार कानून लाने पर काम कर रही है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव विकसित भारत 2047 के विजन के तहत होगा।
इसमें सिर्फ योजना का नाम ही नहीं बदलेगा, बल्कि रोजगार के दिनों, काम करने के बाद पेमेंट के तरीके और फंडिंग पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यही वजह है कि गांवों में रहने वाले लाखों परिवारों के बीच यह सवाल चर्चा में है कि मनरेगा की जगह आने वाली नई योजना में उनके लिए क्या नया और अलग होगा। सरकार जो नया कानून लाने जा रही है। उसका नाम विकसित भारत गारण्टी 2025 रखा गया है। इसे शॉर्ट में जी राम जी बिल कहा जा रहा है। बिल पास होने के बाद यह मौजूदा मनरेगा कानून की जगह ले लेगा। पहले इसे पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना नाम दिए जाने की चर्चा थी।
लेकिन अब विकसित भारत जी राम जी नाम बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक नई योजना में ग्रामीण परिवारों को मिलने वाले गारंटीड रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने पर विचार किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण आय बढ़ेगी और काम भी ज्यादा मिलेगा। इसका मकसद सिर्फ मजदूरी देना नहीं बल्कि लोगों को रोजगार के ज्यादा अवसर देना है। नई योजना में पेमेंट सिस्टम को भी ज्यादा आसान और तेज बनाने की बात कही गई है। मनरेगा में जहां मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर किया जाता था, वहीं नए बिल में वीकली पेमेंट सिस्टम रखने की बात कही गई है। इसके तहत हर हफ्ते या काम पूरा होने के अधिकतम 15 दिनों के भीतर मजदूरी देना जरूरी होगा। अगर 15 दिन के अंदर काम नहीं मिलता है तो बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान रहेगा। फंडिंग सिस्टम में भी बड़ा बदलाव हो सकता है। पहले मनरेगा का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी, लेकिन नई स्कीम में राज्यों को भी हिस्सा देना होगा। कुछ राज्यों में 90 फीसदी केंद्र और 10 फीसदी राज्य। जबकि बाकी राज्यों में 60 फीसदी केंद्र और 40 फीसदी राज्य खर्च उठाएंगे। इससे योजना को चलाने में राज्यों की भूमिका और जिम्मेदारी दोनों बढ़ेंगी।
मनरेगा मजदूर वे ग्रामीण भारतीय नागरिक हैं जिन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत सरकार द्वारा प्रति वित्तीय वर्ष कम से कम 100 दिनों के गारंटीकृत, अकुशल मजदूरी वाले रोजगार की गारंटी मिलती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और स्वेच्छा से काम करने के इच्छुक हैं, जिसमें पुरुषों और महिलाओं को समान मजदूरी मिलती है और भुगतान सीधे उनके बैंक अथवा डाकघर खातों में होता है।
मनरेगा श्रमिकों की दैनिक मजदूरी रु. 349 से बढ़कर रु. 370 प्रति व्यक्ति हो गई। हरियाणा में सबसे अधिक वृद्धि रु. 26, जिससे वहां की दैनिक मजदूरी रु. 400 हो गई। वृद्धि की सीमा 2.33 फीसद से 7.48 फीसद तक की वृद्धि विभिन्न राज्यों में देखी गई। इस संशोधन से 5.66 करोड़ से अधिक परिवारों को लाभ मिला, जिन्होंने वित्त वर्ष 2024-25 में योजना का उपयोग किया था। 1 अप्रैल 2025 से नई मजदूरी दरें लागू हुईं। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मार्च 2025 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की धारा 6 की उप-धारा (1) के तहत वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित मजदूरी दरों की अधिसूचना जारी की।
मंत्रालय के अनुसार, इस वृद्धि का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती मुद्रास्फीति के परिप्रेक्ष्य में मजदूरों को उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करना है। मजदूरी की दर बढ़ी, आबादी बढ़ी लेकिन ईमानदारी घट गयी। मनरेगा के तहत मृत व्यक्तियों, विकलांगों, या दूसरे राज्यों में रहने वाले लोगों के नाम पर फर्जी जॉब कार्ड बनाए जाते हैं। कागजों पर काम हकीकत में कोई काम नहीं होता, लेकिन कागजों में दिखाया जाता है कि काम पूरा हो गया है और पैसे निकाल लिए जाते हैं। अपात्र लाभार्थियों को भुगतान होता है। करोड़पति व्यवसायी, सरकारी कर्मचारी (जैसे स्कूल की रसोइयां या प्रिंसिपल), और ठेकेदार के रिश्तेदारों के नाम पर जॉब कार्ड बनाकर उनके खातों में पैसे ट्रांसफर किए जाते हैं।
मस्टर रोल (हाजिरी रजिस्टर) में फर्जी मजदूरों के नाम और हाजिरी दर्ज की जाती है। काम के लिए खरीदी गई सामग्री के फर्जी बिल बनाए जाते हैं या गुणवत्ता खराब होती है। मजदूरों के बैंक खातों में पैसे आने के बाद, ग्राम प्रधान या अन्य अधिकारी जबरदस्ती अंगूठा लगवाकर पैसे निकाल लेते हैं। ऐप में लूपहोल्स का उपयोग करके या डिजिटल सिग्नेचर के माध्यम से फर्जी हाजिरी लगाई जाती है। इस पर रोक लगानी चाहिए। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)


