जद (यू) पर पकड़ रखेंगे नीतीश

नीतीश कुमार दिल्ली की राजनीति मंे चले गये अथवा भेजे गये, इस पर निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। फिलहाल उन्हंे राज्यसभा में भेजा गया और भाजपा के नेता सम्राट चैधरी उनकी जगह मुख्यमंत्री बन गये। पहले कहा जा रहा था कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा लेकिन डिप्टी सीएम के पद पर जद(यू) के दो नेता ही बैठाए गये हैं। राज्य मंे मंत्रिमंडल का विस्तार होना है और सम्राट चैधरी 21 अप्रैल को दिल्ली गये थे। इस बीच नीतीश कुमार की सरकार मंे ग्रामीण विकास कार्यमंत्री रहे श्रवण कुमार को जद(यू) विधायक दल का नेता बनाया गया है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार केन्द्र की राजनीति मंे रहते हुए भी नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। जद(यू) के नये विधायक दल नेता श्रवण कुमार को नीतीश कुमार का बहुत खास बताया जाता है। जद(यू) विधायकों की बैठक मंे नेता चुनने का कार्य नीतीश कुमार को ही सौंपा गया था। बिहार में मुख्यमंत्री के पद से नीतीश कुमार ने भले ही इस्तीफा दे दिया है लेकिन वह बिहार में सम्रटा चैधरी की सरकार पर नजर रखेंगे। श्रवण कुमार को जद(यू) विधायक दल का नेता बनाने का यही मकसद है। विधायकों की बैठक के बाद नीतीश कुमार ने कहा था कि दिल्ली जाते रहेंगे लेकिन पटना में ज्यादा समय देंगे। इस तरह नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं।
बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) जेडीयू ने अपने विधायक दल का नेता चुन लिया। श्रवण कुमार के नाम पर मुहर लगा दी गई। पार्टी की ओर से उनका नाम विधानसभा को भेजा गया, जिसके बाद विधानसभा सचिवालय ने आधिकारिक नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया। इससे साफ हो गया कि अब श्रवण कुमार ही सदन में जेडीयू की कमान संभालेंगे। जेडीयू की मीटिंग में नीतीश कुमार पर नेता के चुनाव करने का फैसला छोड़ा गया। नीतीश कुमार सरकार में ग्रामीण विकास कार्य मंत्री रहे श्रवण कुमार नीतीश के खासमखास माने जाते हैं। सीएम के गृह जिले से आने वाले और वहीं से चुनाव जीतकर आने वाले श्रवण कुमार कई बार विधायकी जीत चुके हैं। वो 1995 से लगातार नालंदा विधान सभा सीट से जीतते आ रहे हैं। श्रवण कुमार मूलतः समाज सेवा से जुड़े रहे हैं। जब लालू यादव से अलग होकर नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस ने साल 1994 में समता पार्टी का गठन किया था, तब से श्रवण कुमार नीतीश के खास हैं।
नीतीश जेडीयू विधायक दल की अहम बैठक 7 सर्कुलर रोड स्थित के आवास पर आयोजित की गई थी। बैठक के दौरान नीतीश कुमार ने नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वे बिहार के विकास के लिए पहले की तरह सक्रिय रहेंगे और जल्द ही जनता के बीच जाएंगे। माना जा रहा है कि वे फिर से राज्यव्यापी दौरे की तैयारी कर रहे हैं। इससे पहले भी वे “समृद्धि यात्रा” के जरिए लोगों से जुड़ चुके हैं। नीतीश कुमार को जानने वालों को यह अच्छी तरह पता है कि वे कर्पूरी ठाकुर से कितने प्रभावित रहे हैं। निशांत को भी उन्होंने अभी तक राजनीति में लालू की तरह स्थापित नहीं किया है। निशांत तो जेडीयू के अभी सिर्फ साधारण सदस्य हैं। सरकार के सुप्रीम होने के बावजूद अपने साथी उपेंद्र कुशवाहा की तरह नीतीश ने हड़बड़ी नहीं दिखाई। अब तक राजनीति में अरुचि रखने वाले निशांत ने अगर जेडीयू की सदस्यता ग्रहण की तो इसके पीछे नीतीश का दबाव या कोई इच्छा नहीं थी। उन्होंने इसकी रजामंदी तब दी, जब उन समर्थकों का दबाव तरह-तरह से सामने आने लगा।
निशांत पर चर्चा से पहले यह जानना जरूरी है कि कर्पूरी ठाकुर को नीतीश ने आदर्श क्यों माना। कर्पूरी ठाकुर बिहार के पहले डेप्युटी सीएम और बाद में सीएम रहे। उनके पुत्र रामनाथ ठाकुर सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। उन्होंने सक्रिय राजनीति में आने की इच्छा जाहिर की, जिसे कर्पूरी ने सिरे से नकार दिया। बेटे की इच्छा के बावजूद वे उसे संगठन में भी कोई भूमिका दिलाने को तैयार नहीं हुए। रामनाथ ठाकुर की वह इच्छा पूरी की नीतीश कुमार ने। उन्हें खोज-ढूंढ कर राज्यसभा भेजा। वे तीसरी बार नीतीश कुमार के साथ ही जेडीयू के कोटे से राज्यसभा के सदस्य बने हैं। केंद्रीय मंत्री भी हैं। यह सब तब हुआ है, जब कर्पूरी ठाकुर नहीं रहे। नीतीश कुमार की उम्र और सेहत को लेकर जेडीयू समर्थकों की चिंता वाजिब थी। भविष्य में उनकी जगह सपोर्टर निशांत को देखना चाहते थे। समर्थक यह भी चाहते थे कि नीतीश के सीएम रहते ही निशांत राजनीति में आएं। इसके लिए कभी पोस्टर-बैनर लगते तो कभी नीतीश की मौजूदगी में ही निशांत को सीएम बनाने के नारे लगते। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी निशांत को राजनीति में आने की सलाह दे चुके थे। नीतीश कुमार के खास ललन सिंह ने तो निशांत को आशीर्वाद देने की अपील नीतीश से कर दी थी। अंततः नीतीश इसके लिए तैयार तो हो गए, लेकिन वे खुद बिहार की राजनीति करते उन्हें स्थापित करने को राजी नहीं हुए। इसलिए निशांत को अभी सिर्फ सदस्य के ओहदे के साथ राजनीति में एंट्री मिली है।
नीतीश कुमार अब राज्यसभा के सदस्य बन गए हैं। संभव है कि उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी भी एनडीए सरकार सौंपे। इसलिए अब निशांत का निर्णयकारी भूमिका में उतरना नीतीश के उसूलों के विपरीत नहीं मानना चाहिए। चर्चा है कि निशांत ने सदस्य के सामान्य अनुभव के साथ डेप्युटी सीएम बनने से मना कर दिया है। हालांकि अधिक संभावना इस बात की है कि नीतीश ही इसके पक्ष में न रहे हों। नीतीश यह भी जानते हैं कि निशांत जिस भी रूप में जेडीयू के साथ रहें, उनके लव-कुश अर्थात् कुर्मी और कुशवाहा समीकरण के वोट नहीं बिखरेंगे। निशांत की राजनीतिक राह इसलिए भी आसान हो जाएगी कि विजेंद्र यादव के जरिए यादव समाज के बीच सकारात्मक संदेश तो जाएगा ही, साथ में विजय चैधरी के जरिए नीतीश ने सवर्ण समाज पर भी पकड़ मजबूत बना दी है। इससे निशांत की राजनीति की राह अवश्य आसान हो जानी चाहिए। सम्राट चैधरी का साथ देकर नीतीश ने लव-कुश समीकरण को और भी मजबूत किया है।
निशांत ने खुद कहा है कि वे बिहार का भ्रमण करेंगे। लोगों से मिल कर अपने पिता के किए कामों की याद दिलाएंगे। इसमें समय तो लगेगा ही। अभी वे पार्टी के नेताओं से मिल कर राजनीति की बारीकी समझ रहे और अपनी स्वीकार्यता बढ़ा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चैधरी ने गत दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित आवास पर मुलाकात की। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली दिल्ली यात्रा थी। इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी काफी अहम माने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि इस दौरान मंत्रिमंडल विस्तार और संगठन से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत हो सकती है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



