लेखक की कलम

इन्दिरा गांधी का बहुआयामी व्यक्तित्व

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि हर साल 31 अक्टूबर को बलिदान दिवस या राष्ट्रीय संकल्प दिवस के रूप में मनाई जाती है। नई दिल्ली स्थित उनके आवास पर उनके ही सुरक्षाकर्मियों द्वारा 31अक्टूबर 1984 को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पंजाब को खालिस्तान बनने से बचाने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत सेना भेज दी थी। इसमें सरगना भिंडरावाले मारे गये थे। उसी का प्रतिशोध लेने के लिए यह घटना घटी थी।
नई दिल्ली स्थित शक्ति स्थल पर उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी गयी थी। इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को राजनीतिक प्रतिशोध की आग में जलाना असंभव न सही, दुरूह अवश्य है। यह इंदिरा गांधी का ही साहस था कि सिक्किम को भारत गणराज्य में शामिल कराया। यह इंदिरा गांधी की ही विदेश नीति थी जिसने अमेरिका को अंगूठा दिखाकर और रूस को विश्वास में लेकर पाकिस्तान के दो टुकड़े करा दिये। उन्हीं इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी है कि अदालत से चुनाव में अयोग्य ठहराने जाने पर 1975 में आपातकाल लागू कर दिया। राजनीतिक प्रतिशोध में जेल भेज दी गयीं तो जनता ने प्रचंड बहुमत से फिर सत्ता सौंप दी।
इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है, में हुआ था।वह एक भारतीय राजनेता थीं, जिन्होंने 1966 से 1977 तक दो बार भारत के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया और फिर 1980 से 1984 में वलिदान तक पीएम रहीं। वह भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री थीं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के नेता के रूप में भारतीय राजनीति में एक केंद्रीय व्यक्तित्व थीं। इंदिरा गांधी ने 1983 से 1984 तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) की अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया, वह इस पद को धारण करने वाली पहली भारतीय बनीं। वह भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी और राजीव गांधी की माँ थीं, जो उनके बाद प्रधानमंत्री बने। चार टर्म में 15 साल और 350 दिन का उनका कुल कार्यकाल, उन्हें अपने पिता के बाद दूसरी सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाली भारतीय प्रधानमंत्री बनाता है और उनकी मृत्यु के समय वह सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाली महिला सरकार प्रमुख थीं।
1947 से 1964 तक अपने पिता जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहने के दौरान, इंदिरा गांधी उनके साथ आधिकारिक रूप से राजनीति सीख रही थीं और उनके कई विदेशी दौरों पर उनके साथ गईं। 1959 में, उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की प्रेसिडेंट के तौर पर कम्युनिस्ट -लीड वाली केरल राज्य सरकार को भंग करने में भूमिका निभाई, जो कि एक रस्मी पद था, जिसके लिए उन्हें उसी साल की शुरुआत में चुना गया था। लाल बहादुर शास्त्री, जो 1964 में नेहरू की मौत के बाद प्रधानमंत्री बने थे, ने उन्हें अपनी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया। उसी साल वह भारतीय संसद के ऊपरी सदन, राज्यसभा के लिए चुनी गईं । जनवरी 1966 में शास्त्री की मौत के बाद, गांधी ने कांग्रेस के पार्लियामेंट्री लीडरशिप चुनाव में अपने विरोधी, मोरारजी देसाई को हरा दिय और पार्टी की लीडर बनीं । वह शास्त्री की जगह प्रधानमंत्री भी बनीं। भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ ही वह अपनी श्रीलंकाई समकक्ष सिरीमावो भंडारनायके के बाद दुनिया की दूसरी महिला प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने कांग्रेस को अगले दो चुनावों में जीत दिलाई, जिसकी शुरुआत 1967 के आम चुनाव से हुई , जिसमें वह पहली बार भारतीय संसद के निचले सदन, लोकसभा के लिए चुनी गईं। 1971 में, उनकी पार्टी ने गरीबी जैसे मुद्दों पर ध्यान देते हुए, 1962 में उनके पिता की जीत के बाद पहली बार बड़ी जीत हासिल की।
प्रधानमंत्री के रूप में, इंदिरा गांधी अपने अडिग राजनीतिक रुख और सरकार के भीतर शक्ति के केंद्रीकरण के लिए जानी जाती थीं। 1967 में, उन्होंने चीन के साथ एक सैन्य संघर्ष का नेतृत्व किया जिसमें भारत ने हिमालय में चीनी घुसपैठ को खदेड़ दिया और 1971 में, वह स्वतंत्रता आंदोलन और पूर्वी पाकिस्तान में स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में पाकिस्तान के साथ युद्ध में गईं, जिसके परिणामस्वरूप भारत की जीत हुई, पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार का अंत हुआ और उसे बांग्लादेश की स्वतंत्रता के रूप में जाना गया, साथ ही भारत का प्रभाव इतना बढ़ गया कि वह दक्षिण एशिया में एकमात्र क्षेत्रीय शक्ति बन गया। इसका श्रेय इंदिरा गांधी को ही दिया जाता है। पाकिस्तान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान, जिसका कोड नाम ऑपरेशन मेघदूत था, 1984 में उनके कार्यकाल के दौरान हुआ, जिसके कारण भारत ने विवादित कश्मीर क्षेत्र में अपने प्रभावी नियंत्रण वाले क्षेत्र का विस्तार किया। इंदिरा गांधी ने 1974 में भारत के पहले सफल परमाणु हथियार परीक्षण की शुरुआत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पूर्व सिक्किम को स्वतंत्र भारत में पूर्ण राज्य के रूप में मिलाने का श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार और उनकी रणनीतिक कार्रवाई को जाता है।
1947 में भारत की आजादी के समय सिक्किम भारत का हिस्सा नहीं था, बल्कि यहाँ चोग्याल (राजवंश) का शासन था। 1950 में भारत और सिक्किम के बीच एक शांति संधि हुई, जिससे सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य बना। इसके तहत भारत सिक्किम की रक्षा, विदेश मामलों और संचार की जिम्मेदारी संभालता था। 1970 के दशक तक सिक्किम की जनता चोग्याल (राजा पाल्डेन थोंडुप नामग्याल) की नीतियों और राजशाही के खिलाफ हो गई। वहाँ लोकतंत्र और बदलाव की माँग तेज हो गई। भारत सरकार, चोग्याल और सिक्किम के राजनीतिक दलों के बीच 8 मई 1973 को एक समझौता हुआ, जिससे राजा की शक्तियाँ सीमित कर दी गईं और प्रशासनिक सुधार किए गए। भारतीय संसद ने संविधान में 36वाँ संशोधन कर 16 मई 1975 को सिक्किम को आधिकारिक तौर पर भारतीय संघ का 22वाँ राज्य घोषित कर दिया।इस सिक्किम विलय विवरण और भू-राजनीतिक दृष्टि से यह विलय भारत के लिए उत्तर-पूर्वी सीमाओं को सुरक्षित रखने के मामले में एक ऐतिहासिक कदम था।
अपने चैथे प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें सिख अलगाववादी आंदोलन का सामना करना पड़ा। जवाब में, उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार का आदेश दिया, जिसमें स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई हुई और सैकड़ों सिख मारे गए । इसी के प्रतिशोध में 31 अक्टूबर 1984 को, उनके दो बॉडीगार्ड ने उनकी हत्या कर दी। दोनों सिख राष्ट्रवादी थे लेकिन उनको हरमंदिर साहिब
में हुई घटनाओं का बदला लेने के लिए कट्टरवादियों ने इस तरह बरगलाया कि उन्होंने कर्त्तव्य की ही हत्या कर दी। इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि पर उनके बहु आयामी व्यक्तित्व को देखे बिना श्रद्धांजलि
अधूरी रहेगी।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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