लेखक की कलम

सियासत की दोस्ती

राजनीति में किसी का न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न स्थायी दुश्मन। समय और परिस्थिति के अनुरूप दोस्त और दुश्मन बन जाते हैं। चुनाव के समय तो अक्सर ऐसे नजारे देखने को मिलते हैं। भाजपा के विरोध में महागठबंधन बनाने वाले कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की सियासत की दोस्ती राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बनी हुई है। बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सहयोगी हैं लेकिन केरल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। केरल में 140 विधानसभा की सीटों पर 9 अप्रैल को मतदान होगा। यहां पर वामपंथियों के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता में है और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ मुख्य विपक्षी दल है। इसलिए केरल में कांग्रेस का विरोध तो वामपंथी दल भी करेंगे जो बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव कंधे से कंधा मिलाकर लड़ चुके हैं। यहां पर 2021 के विधानसभा चुनाव में एलडीएफ ने 99 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनायी थी और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 41 सीटें ही मिल पायी थीं। इस बार भी यदि एलडीएफ की सरकार बनी तो कांग्रेस विपक्ष में और तेजस्वी यादव की पार्टी सत्ता पक्ष में बैठेगी। बहरहाल कांग्रेस भी अपना चेहरा बदलती रहती है। बिहार में 16 मार्च को राज्य सभा के चुनाव हो रहे थे और पांचवीं सीट के लिए तेजस्वी ने तिकड़म भी बैठाया लेकिन कांग्रेस के तीन विधायक वोट डालने ही नहीं पहुंचे। इससे तेजस्वी का समीकरण डगमगा गया और तेजस्वी का प्रत्याशी हार गया। केरल में इस बार बिहार के दो बड़े दल किस्मत आजमा रहे हैं।
देश में एक बार फिर चुनावी बिगुल बज गया है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उसमें केरल भी शामिल है। दक्षिण के इस राज्य में 2 प्रमुख गठबंधनों एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही चुनावी जोर-आजमाइश होती रही है। बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है, लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिल सकी है। इस बीच राष्ट्रीय जनता दल ने ऐलान किया है कि वह केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले फ्रंट की जगह लेफ्ट फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगा। राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने ऐलान करते हुए कहा कि उनकी पार्टी केरल विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के सहयोगी के तौर पर चुनाव लड़ेगी। राज्य में एलडीएफ का मुकाबला कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट से होगा। इस तरह से तेजस्वी केरल में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव प्रचार करते नजर आएंगे। राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी ने यह घोषणा बिहार में राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन के विधायकों के साथ एक बैठक के बाद की। यह बैठक राज्य में राज्यसभा की 5 सीटों के लिए वोटिंग से कुछ घंटे पहले बुलाई गई थी। राज्य में खाली हो रही 5 सीटों में से एक सीट पर उनकी पार्टी चुनाव लड़ रही और कांगे्रस के तीन विधायकों के मतदान न करने से चुनाव हार गयी।
केरल में सियासत बिहार की सियासत से इतर है क्योंकि बिहार में आरजेडी की अगुवाई वाले महागठबंधन में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी छोटे सहयोगी की तरह हैं जबकि केरल में ये दोनों सबसे बड़े फ्रंट हैं और वहां आरजेडी छोटी सहयोगी पार्टी है। कांग्रेस और सीपीआई (एम) केरल में एक-दूसरे के विरोधी हैं, जबकि बिहार में दोनों एक साथ महागठबंधन का हिस्सा हैं।
चुनाव आयोग ने देश के 5 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। केरल में एक ही चरण में 9 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि मतों की गिनती 4 मई को की जाएगी। लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी केरल में 2021 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमा चुकी है, लेकिन तब उसे खास कामयाबी नहीं मिली थी।
बिहार में राज्यसभा चुनाव को लेकर जमकर सियासत देखने को मिली। विपक्षी खेमे से 4 विधायक मतदान करने नहीं पहुंचे। जिसमें कांग्रेस के तीन और आरजेडी के एक विधायक शामिल थे। जीतन राम मांझी की पार्टी की दो महिला विधायकों को नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के साथ देखा गया था। कमरे से महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी और एआईएमआईएम के विधायकों के साथ निकलकर वोटिंग के लिए जाते हुए दिखीं। ऐसा माना जा रहा था कि दोनों विधायक आरजेडी के समर्थन में वोट करेंगे। कांग्रेस के तीन विधायक वोटिंग से गायब हो गये। इन सभी विधायकों ने अपना मोबाइल फोन भी बंद कर रखा था। गायब विधायकों में वाल्मीकि नगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा, फारबिसगंज के कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास, मनिहारी से कांग्रेस विधायक मनोहर सिंह, ढाका से राजद विधायक फैजल रहमान थे। बिहार में 5 सीटों पर कुल 6 उम्मीदवार मैदान में। एनडीए के पास इस समय 202 विधायकों का संख्या बल है। महागठबंधन की बात की जाए तो उसके पास केवल 35 विधायक हैं। संख्या बल से साफ है कि एनडीए को 4 सीटों पर आसानी से जीत मिल सकती थी। पूरा पेंच 5वीं सीट के लिए फंसा हुआ था। एनडीए को वीं सीट जीतने के लिए 3 विधायकों की जरूरत थी। एनडीए पांचों सीटें जीत गयी और तेजस्वी का प्रत्याशी हार गया।
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि उनकी पार्टी अगले महीने केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी। उनके इस ऐलान के बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि बिहार की राजनीति में खासा दमखम रखने वाली राष्ट्रीय जनता दल जिसका पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में ही खास जनाधार नहीं है, वो सुदूर केरल के चुनाव में क्या करेगी? खास बात यह है कि राजद ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार की पार्टी जद(यू) भी केरल की सियासत में कोई नई पार्टी नहीं है, वह पहले भी कई विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है।
बिहार मंे राज्यसभा चुनाव के बाद तेजस्वी यादव की कांग्रेस के प्रति तल्खी और बढ़ गयी है। इसलिए वह केरल मंे कांग्रेस को सबक सिखाना चाहते हैं। केरल में एक ही चरण में चुनाव कराए जाएंगे, और यहां 9 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। परिणाम 4 मई को आएंगे। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही यहां पर चुनावी हलचल में तेजी आ गई। तेजस्वी यादव ने यह ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी राजद केरल में वाम मोर्चा एलडीएफ के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। यहां लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट से मुकाबला होगा। बिहार में विपक्षी महागठबंधन में आरजेडी का जोरदार दबदबा है और यहां कांग्रेस के साथ-साथ लेफ्ट पार्टियां भी दूसरे दर्जे की पार्टी के रूप में गिनी जाती हैं, जबकि केरल में मामला इसके उलट है। वहां कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों का अपना दबदबा है। सत्ता की जंग इन्हीं दोनों दलों की अगुवाई वाले फ्रंट के बीच ही होता रहा है। बीजेपी भी यहां बेबस नजर आती है। तेजस्वी यादव ने केरल में चुनाव के लिए लेफ्ट फ्रंट के साथ जाने का ऐलान किया है। लालू और तेजस्वी की पार्टी केरल में पहली बार चुनाव नहीं लड़ने जा रही है। इससे पहले वह साल 2021 के विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा चुकी है। 5 साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ के साथ चुनाव लड़ना चाह रही थी और इसके लिए पार्टी से खुद के लिए कुछ सीटों की मांग की, लेकिन कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया। लिहाजा, लालू ने अकेले ही अपने चुनाव चिन्ह के
साथ चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया था। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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