
नाम का व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव पड़ता है, इसीलिए नामकरण भी जन्म के समय नक्षत्रों की विशेष स्थिति के अनुसार किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि नाम के अनुरूप ही व्यक्ति में गुण उत्पन्न होते हैं। पहले राजाओं के नाम में इसीलिए बहादुर या वीर शब्द जुड़ा रहता था क्योंकि राजाओं का बलशाली होना बहुत जरूरी माना जाता था। इसी प्रकार बहुत लोग देवी-देवताओं की कृपा पाने के लिए उन्हीं के प्रसाद स्वरूप पुत्र-पुत्री का नाम रखते हैं जैसे जगदम्बा प्रसाद, शैलकुमारी आदि। गोस्वामी तुलसीदा जी कहते हैं कि भगवान राम का नाम ही वंदनीय है-
बंदउँ नाम राम रघुवर को, हेतु कृसानु भानु हिम कर को।
बिधि, हरि हर मय वेद प्रान सो, अगुन, अनूपम गुन निधान सो।
महामंत्र जोइ जपत महेसू, कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।
महिमा जासु जान गनराऊ, प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।
अर्थात् मैं श्री रधुनाथ जी के नाम ‘राम’ की वंदना करता हूं जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् र आ और म रूप से बीज मंत्र है। कृशानु में र है, भानु में आ और हिमकर में र और म दोनों शामिल हैं। वह राम नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप है- वह वेदों के प्राण है, निर्गुण, उपमा रहित और गुणों का भंडार है। महामंत्र है जिसे शिवजी (महेश) जपते हैं और शिव के द्वारा राम का उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है। ऐसी मान्यता है कि काशी में जिसकी मृत्यु होती है उसे मोक्ष मिल जाता है, वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति पा जाता है। इसीलिए देश-विदेश के कितने ही वृद्ध जीवन के अंतिम समय में काशी में निवास करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि राम नाम की महिमा को गणेश जी जानते हैं जो इस राम नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं।
जान आदिकबि नाम प्रतापू, भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।
सहस नाम सम सुनि सिव बानी, जपि जेईं पिंय संग भवानी।
अर्थात् आदि कवि वाल्मीकि जी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उलटा नाम (मरा-मरा) जपकर ही महानसंत ओर कवि बन गये। वाल्मीकि जी के बारे में हम पहले ही बता
चुके हैं कि वह एक डाकू थे और एक ऋषि ने उन्हें ज्ञान दिया। बाल्मीकि राम शब्द का उच्चरण नहीं कर सकते थे क्योंकि उनका काम हत्या करना था, इसलिए ऋषि ने उनसे कहा कि तुम ‘मरा मरा’ कहो क्योंकि लोगों
को अभी तक मारते रहे हो और मरा शब्द आसानी से बोल सकते हो। बाल्मीकि ‘मरा-मरा’ कहने लगे जो राम-राम की धनि भी देता है। इसी नाम को जपकर बाल्मीकि जी महान संत बन गये। इस राम नाम का महत्व शिव जी ने पार्वती को भी बताया था। शिवजी ने कहा कि एक राम नाम का महत्व एक हजार नामों के बराबर होता है। पार्वती जी सदैव ही अपने पति शिवजी के साथ राम नाम का जप करती रहती हैं।
हरषे हेतु हेरि हर ही को, किय भूषण तिय भूषन ती को।
नाम प्रभाउ जान सिव नीको, कालकूट फलु दीन्ह अमी को।
राम नाम के प्रति पार्वती की ऐसी प्रीति देखकर शिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियों में भूषण रूप अर्थात पतिव्रताओं में शिरोमणि पार्वती जी को अपना भूषण बना लिया अर्थात् पार्वती को अपनी अद्र्धांगनी बनाया। नाम के प्रभाव को शिवजी भलीभांति जानते हैं, जिस प्रभाव के कारण कालकूट जहर ने भी उनको अमृत का फल दिया। इस संदर्भ में कहा जाता है कि देवताओं और असुरों ने जब मिलकर समुद्र मंथन किया तब अमृत से पहले कालकूट जहर उत्पन्न हुआ। उस कालकूट के प्रभाव से समस्त सृष्टि व्याकुल होने लगी तो भगवान विष्णु के कहने पर, उनका नाम जपते हुए कालकूट जहर को पी लिया। उस कालकूट को पीने से ही भगवान शंकर का गला नीला पड़ गया। कालकूट गले में भी अटक कर रह गया और उसका प्रभाव कैस होता है।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन-भादव मास।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री रघुनाथ जी की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है और उत्तम सेवक गण धान की फसल की तरह हैं। राम नाम के दो सुन्दर अक्षर सावन-भादौ महीने के समान हैं। सावन भादौं के महीने बारिश के लिए बहुत अच्छे माने जाते हैं। धान की फसल तभी लहलहाती है जब बारिश अच्छी हो। इसलिए राम शब्द के उच्चारण से भक्तगण धान की फसल की तरह प्रसन्न रहते हैं।
आखर मधुर मनोहर दोऊ, बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू, लोक लाहु परलोक निबाहू।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके,
राम लखन सम प्रिय तुलसी के।
बरनत बरन प्रीति बिलगाती, ब्रह्म जीव सम सहज संघाती।
अर्थात् राम नाम के दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं जो हिन्दी वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं। इसका तात्पर्य है कि राम नाम के दोनों वर्ण भगवान के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत सेवा में नियुक्त रखते हैं। ये दोनों अक्षर कहने और सुनने व स्मरण करने में बहुत ही अच्छे अर्थात् सुन्दर और मधुर हैं। तुलसीदास जी को तो ये दोनों अक्षर श्री राम और लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनके रा और म का अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है अर्थात् बीज मंत्र की दृष्टि से इनके उच्चारण अर्थ और फल में भिन्नता दिखाई पड़ती है लेकिन ये दोनों वर्ण जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहने वाले हैं। सदा एक रूप और एक रस हैं।
नर-नारायन सरिस सुभ्राता, जग पालक बिसेषि जन त्राता।
भगति सुतिय कल करन बिभूषन, जगहित हेतु बिमल
विधु पूषन।
ये दोनों अक्षर नर-नारायन के समान सुन्दर भाई हैं। ये जगत का पालन और विशेष रूप से भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। ये भक्ति रुपिणी सुंदर स्त्री के कानों के सुन्दर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत के हित के लिए निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के, कमठसेष सम धर बसुधा के।
जन मन मंजु कंज मधुकर से, जीह जसोमति हरि हलधर से।
अर्थात् ये दोनों अक्षर सुन्दर गति ़(मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान है, कच्छप और शेषनाग के समान पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। भक्तों के सुन्दर मन रूपी कमल में बिहार करने वाले भौंरे (मधुकर) के समान हैं और जीभ रूपी यशोदा के लिए कृष्ण और बलराम की तरह आनंद देने वाले हैं। इसलिए राम नाम का उच्चारण ही हमें इस लोक और परलोक के सभी गुण उपलब्ध करा सकता है। (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



