यूपी व बिहार के पहले सुपर स्टार थे सुजीत कुमार

सुजीत कुमार उत्तर प्रदेश और बिहार की माटी के लिए वे प्रथम सुपरस्टार थे। शमशेर बहादुर सिंह से सुजीत कुमार बनने तक का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है।
7 फरवरी 1934 को वाराणसी के पास चकिया के एक किसान परिवार में जन्मे सुजीत कुमार का अभिनय से दूर-दूर तक नाता नहीं था। वे कानून (एलएलबी) की पढ़ाई कर रहे थे और उनका इरादा अदालत में दलीलें पेश करने का था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। कॉलेज के दिनों में एक नाटक के दौरान प्रसिद्ध निर्देशक फणी मजूमदार की नजर उन पर पड़ी। मजूमदार उनकी लंबी कद-काठी और रौबीली आवाज से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शमशेर को वकालत छोड़कर बंबई आने की सलाह दी। एक नौजवान के लिए यह फैसला जोखिम भरा था, लेकिन शमशेर ने साहस दिखाया और सुजीत कुमार के नाम से मायानगरी में कदम रखा। 1960 के दशक में सुजीत कुमार ने हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनानी शुरू की। उस दौर में सस्पेंस और मिस्ट्री फिल्मों का बहुत क्रेज था। 1966 में आई फिल्म लाल बंगला ने उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित किया जो रहस्यमयी कहानियों को अपने कंधों पर ढो सकता था। एक साल पहले और लंबू इन हांगकांग जैसी फिल्मों ने उन्हें मध्यम बजट की फिल्मों का भरोसेमंद चेहरा बना दिया। हालांकि, मुख्यधारा के सिनेमा में उनकी असली चमक अभी बाकी थी।
सुजीत कुमार का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान क्षेत्रीय सिनेमा में रहा। 1963 में आई फिल्म बिदेसिया ने उन्हें पूर्वांचल और बिहार के घर-घर में पहुंचा दिया। इसमें उनके द्वारा निभाया गया बिदेसी ठाकुर का पात्र आज भी लोक-संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन असली चमत्कार हुआ 1977 में। उस समय भोजपुरी सिनेमा लगभग दम तोड़ रहा था। फिल्मों का निर्माण बंद था और दर्शक हिंदी फिल्मों की ओर रुख कर चुके थे। ऐसे में सुजीत कुमार दंगल लेकर आए, जो भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म का गीत काशी हिले पटना हिले आज भी उत्सवों की जान है। वहीं, भोजपुरी फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो (1962) में दिग्गज अभिनेता सुजीत कुमार ने एक सहायक अभिनेता के रूप में काम किया था। (हिफी)



