ड्रैगन के किले में दरार

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में चल रहा “मिलिट्री पर्ज” अब केवल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान नहीं रह गया है, बल्कि इसे राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सत्ता के भीतर बढ़ते अंतर्विरोध और डगमगाते नियंत्रण के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों और रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चीन की सैन्य व्यवस्था में शीर्ष स्तर पर लगातार हो रही छंटनी, जांच और हटाए जाने की घटनाएं बताती हैं कि सत्ता के केंद्र में सब कुछ “स्थिर” नहीं है। चीन के राजनीतिक ढांचे में सेना सत्ता का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है। ऐसे में जब उसी स्तंभ के भीतर भूचाल हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शी जिनपिंग की पकड़ वैसी ही मजबूत है जैसी बाहर से दिखाई जाती है।
पिछले कुछ समय में सेना के कई बड़े चेहरों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। जिन इकाइयों पर असर पड़ा है, उनमें चीन की रणनीतिक क्षमता से जुड़ी मिसाइल और रक्षा संरचनाएं भी शामिल बताई जा रही हैं। यह वही क्षेत्र है जिसे चीन अपनी “राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़” कहता है। ऐसे में यह तर्क मजबूत होता है कि मामला केवल रिश्वत, ठेके और फंड के दुरुपयोग तक सीमित नहीं है। यदि समस्या केवल भ्रष्टाचार होती, तो कार्रवाई निचले स्तर पर सीमित रह सकती थी, लेकिन जब शीर्ष नेतृत्व और संवेदनशील सैन्य ढांचे तक सफाई अभियान पहुंचे, तो यह संकेत देता है कि भीतर सत्ता और भरोसे का संकट गहरा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, चीन में पर्ज की राजनीति अक्सर “भ्रष्टाचार” के नाम पर “वफादारी” की जांच भी होती है। शी जिनपिंग के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर वे नेटवर्क हो सकते हैं जो पार्टी, सेना और प्रशासन में वर्षों से जमे रहे हैं। यही कारण है कि पर्ज को कई लोग सत्ता-संघर्ष के रूप में भी पढ़ते हैं। चीन के भीतर अलग-अलग गुट, पुराने सैन्य समूह और प्रभावशाली अधिकारी-तंत्र लंबे समय से मौजूद रहे हैं। शी जिनपिंग ने पिछले एक दशक में सत्ता को अत्यधिक केंद्रीकृत किया है, लेकिन केंद्रीकरण जितना बढ़ता है, उतना ही भीतर विरोध और असंतोष भी पनपता है।
यह घटनाक्रम ताइवान मुद्दे के साथ भी जोड़कर देखा जा रहा है। चीन ताइवान को लेकर आक्रामक रुख अपनाता रहा है और सैन्य गतिविधियां भी तेज हुई हैं लेकिन युद्ध जैसी किसी बड़ी रणनीतिक कार्रवाई के लिए सेना के भीतर भरोसेमंद कमांड स्ट्रक्चर, अनुशासन और उच्च स्तर की क्षमता चाहिए। यदि सेना के शीर्ष पर ही अस्थिरता है, तो यह चीन की वास्तविक युद्ध-तैयारी पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। कुछ रिपोर्टों में रक्षा उपकरणों की गुणवत्ता, सप्लाई चेन में गड़बड़ी और सिस्टम की विश्वसनीयता को लेकर भी चिंताएं सामने आई हैं।
कुल मिलाकर, चीन का यह “मिलिट्री पर्ज” एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह वास्तव में भ्रष्टाचार खत्म करने की मुहिम है, या फिर शी जिनपिंग अपनी सत्ता को बचाने और भीतर के संभावित विरोध को कुचलने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



