राज्यपालों को सुप्रीम फरमान

सुप्रीम कोर्ट ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर फैसला सुनाया, जिसमें राष्ट्रपति ने पूछा था कि क्या अदालतें राज्यपालों के लिए समय सीमा तय कर सकती हैं। अनुच्छेद 143 के तहत, सरकार कानूनी या जनहित के मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकती है। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे, जिनमें राज्यपाल के संवैधानिक विकल्प और समय सीमा तय करने के अधिकार शामिल थे। उच्चतम न्यायालय ने इसी संदर्भ में 20 नवम्बर को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती और न्यायपालिका भी उन्हें मान्य स्वीकृति नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपालों के अधिकार पर सुनवाई हुई । पता नहीं यह विवाद कब सुलझेगा। राज्यपाल और केन्द्र में सरकार के विरोधी दल की राज्य सरकार के बीच कटु विवादों का सिलसिला बहुत पुराना है। राज्यपाल के अधिकारों और कार्यों की सीमा तय करने का प्रयास अप्रैल 1969 को संसद ने किया था लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। उस समझ के प्रख्यात समाजवादी नेता मधु लिमये ने कहा था कि राज्यपाल के अधिकार स्पष्ट किये जाएं। उस समय केन्द्रीय गृह कार्य उपमंत्री के एस. रामा स्वामी ने मामले को टालते हुए कहा कि हक को लेकर कोई समस्या ही नहीं है सिर्फ मतभेद हैं। वह मतभेद अब विकराल रूप धारण कर चुके हैं।
उच्चतम न्यायालय ने प्रेसिडेंशियल रफेरेंस पर फैसला सुनाते हुए कहा गवर्नर द्वारा बिलों को मंजूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती। ‘डीम्ड असेंट’ का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा चुनी हुई सरकार कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए, ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ औपचारिक रोल नहीं होता। गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है। गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। वह मंजूरी दे सकता है, बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है।
राज्यपालों के इस विशेष अधिकार कर लेकर प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की संविधान पीठ ने 10 दिनों तक दलीलें सुनने के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। मामला विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार तक पहुंच गया। इस मामले पर देश भर कर निगाहें टिकी थीं। तमिलनाडु हिमाचल प्रदेश पश्चिम बंगाल केरल झारखंड और कुछ केन्द्रशासित राज्य इस समस्या को अर्से से उठा रहे थे कि उनकी सरकार द्वारा पारित विधेयकों को राजभवन में लटका दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर फैसला सुनाते हुए कहा गवर्नर द्वारा बिलों को मंजूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती। ‘डीम्ड असेंट’ का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा चुनी हुई सरकार कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए, ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ औपचारिक रोल नहीं होता. गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है. गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। वह मंजूरी दे सकता है, बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा गवर्नर द्वारा बिलों को मंजूरी देने के लिए टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती। ष्डीम्ड असेंटष् का सिद्धांत संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है। चुनी हुई सरकार-कैबिनेट को ड्राइवर की सीट पर होना चाहिए- ड्राइवर की सीट पर दो लोग नहीं हो सकते, लेकिन गवर्नर का कोई सिर्फ औपचारिक रोल नहीं होता। आर्टिकल 142 का प्रयोग कर सुप्रीम कोर्ट विधेयकों को मंजूरी नहीं दे सकता। यह राज्यपाल और राष्ट्रपति का अधिकार क्षेत्र में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल अगर अपने पास रख लेता है, वह संघवाद के खिलाफ होगा। हमारी राय है कि राज्यपाल को विधेयक को दोबारा विचार के लिए लौटाना चाहिए। सामान्य तौर पर राज्यपाल को मंत्रिमण्डल की सलाह पर काम करना होता है लेकिन विवेकाधिकार से जुड़े मामले में वह खुद भी फैसला ले सकता है।
गवर्नर, प्रेसिडेंट का खास रोल और असर होता है। गवर्नर के पास बिल रोकने और प्रोसेस को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। वह मंजूरी दे सकता है, बिल को असेंबली में वापस भेज सकता है या प्रेसिडेंट को भेज सकता है। जब गवर्नर काम न करने का फैसला करते हैं, तो संवैधानिक कोर्ट ज्यूडिशियल रिव्यू कर सकते हैं। कोर्ट मेरिट पर कुछ भी देखे बिना गवर्नर को काम करने का लिमिटेड निर्देश दे सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा गवर्नर या प्रेसिडेंट काम अपने पास लेना न्याय के दायरे में नहीं आता और ज्यूडिशियल रिव्यू तभी होता है जब बिल एक्ट बन जाता है। तमिलनाडु सरकार का फैसला न्याय के दायरे में नहीं आता। सबसे कठोर सिद्धांत यह है कि बिल के स्टेज पर कोई भी मंजूरी को चुनौती दे सकता है। हम यह भी साफ करते हैं कि जब बिल आर्टिकल 200 के तहत गवर्नर द्वारा रिजर्व किया जाता है तो प्रेसिडेंट रिव्यू मांगने के लिए बाउंड नहीं हैं।अगर बाहरी विचार में, प्रेसिडेंट रिव्यू मांगना चाहते हैं, तो वह मांग सकते हैं।
हालांकि, जो सवाल उठता है वह यह है कि जब गवर्नर मंजूरी नहीं देते हैं तो क्या समाधान है जबकि कार्रवाई की मेरिट्स पर विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट द्वारा जांच किए जाने पर, लंबे समय तक, अनिश्चित, बिना किसी कारण के कार्रवाई न करने पर सीमित न्यायिक जांच होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘डीम्ड एसेंट’ का कॉन्सेप्ट संविधान की भावना और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ है। इसके लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल नहीं
किया जा सकता। राष्ट्रपति ने
गवर्नर के पास पेंडिंग बिलों को ‘डीम्ड एसेंट’ देने के लिए आर्टिकल्स 142
के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक्सक्लूसिव शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल
उठाया था।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



