जी-7 में ट्रंप की सुखद घोषणा

फ्रांस के एवीयां-ले-बैंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसी घोषणा की है जिसने वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान के साथ हुआ उनका नया समझौता न केवल अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करेगा, बल्कि मध्य पूर्व में स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
जी-7 सम्मेलन में पहुंचते ही ट्रंप ने इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह समझौता दुनिया के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आएगा और इसके प्रभाव से तेल की कीमतों में गिरावट तथा शेयर बाजारों में तेजी देखने को मिल रही है। ट्रंप के अनुसार, “मध्य पूर्व में बहुत अच्छी चीजें होने जा रही हैं और यह समझौता पूरी दुनिया के लिए सफलता लेकर आएगा।”
यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच 15 सप्ताह तक चले सैन्य संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था। इस संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुए, तेल की कीमतों में उछाल आया और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर भी संकट खड़ा हो गया। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, संघर्ष के कारण लगभग ठप हो गया था।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप को इस समझौते के लिए बधाई देते हुए इसे विश्व शांति के लिए महत्वपूर्ण बताया। हालांकि, इससे पहले ट्रंप और यूरोपीय नेताओं के बीच इस युद्ध को लेकर मतभेद रहे थे। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली के नेताओं ने अमेरिका द्वारा युद्ध शुरू करने के निर्णय पर पर्याप्त परामर्श न करने को लेकर असंतोष व्यक्त किया था। लेकिन अब समझौते के बाद माहौल कुछ हद तक सकारात्मक होता दिखाई दे रहा है।
समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल खोला जाएगा और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाई जाएगी। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि समुद्री यातायात को पूरी तरह सामान्य होने में कई सप्ताह लग सकते हैं। फ्रांस और ब्रिटेन ने जलडमरूमध्य में बिछाई गई संभावित बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए सहयोग देने की इच्छा भी जताई है।
फिर भी इस समझौते को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल बने हुए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि समझौते के अनुपालन की निगरानी कौन करेगा और यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा है। इसके अलावा, ईरान के पास मौजूद उच्च संवर्धित यूरेनियम के भंडार का क्या होगा, इस पर भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
गौरतलब है कि ट्रंप पहले भी ईरान के साथ हुए 2015 के परमाणु समझौते के कट्टर आलोचक रहे हैं। उस समझौते पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन और यूरोपीय संघ ने हस्ताक्षर किए थे। ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को उस समझौते से बाहर निकाल लिया था। उनका तर्क था कि वह समझौता ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने में विफल रहा और उसने ईरान को आर्थिक लाभ पहुंचाया।
अब ट्रंप का दावा है कि उनका नया समझौता पहले वाले समझौते से अलग है क्योंकि इसे “ताकत की स्थिति” से किया गया है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि समझौते की कई शर्तें अब भी अस्पष्ट हैं। अमेरिकी सीनेट की खुफिया समिति के वरिष्ठ डेमोक्रेट नेता मार्क वार्नर ने कहा कि 2015 के समझौते में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था थी और कई वैश्विक शक्तियां उसके पक्ष में थीं, जबकि नए समझौते में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था अभी दिखाई नहीं देती।
समझौते के तहत ईरान को आर्थिक राहत देने की भी संभावना है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की जमी हुई संपत्तियों को मुक्त किया जा सकता है, कुछ प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं और देश के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक का फंड उपलब्ध कराया जा सकता है। हालांकि, यह सब ईरान द्वारा कुछ निर्धारित मानकों को पूरा करने पर निर्भर करेगा।
ट्रंप के करीबी सहयोगी और रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी समझौते को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस को इस समझौते की समीक्षा करनी चाहिए और इसकी मंजूरी आवश्यक होगी। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान और अमेरिकी वार्ताकारों की व्याख्याओं में अंतर दिखाई दे रहा है, जो भविष्य में विवाद का कारण बन सकता है।
जी-7 सम्मेलन में ईरान के अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध भी प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। फ्रांस ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की को सम्मेलन में आमंत्रित किया है। ट्रंप ने हाल ही में जेलेंस्की और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दोनों से बातचीत की है। उनका कहना है कि ईरान मुद्दे पर प्रगति के बाद अब वे रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान पर अधिक ध्यान दे पाएंगे।
इस बीच ट्रंप ने व्यापारिक मोर्चे पर भी अपनी आक्रामक नीति जारी रखी है। उन्होंने फ्रांस को चेतावनी दी है कि यदि फ्रांस अमेरिकी तकनीकी कंपनियों पर लगाया गया डिजिटल टैक्स समाप्त नहीं करता है तो अमेरिका फ्रांसीसी वाइन पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगा सकता है। इस मुद्दे पर मैक्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि फ्रांस और यूरोप के कानूनों का निर्णय अमेरिका नहीं कर सकता।
कुल मिलाकर, जी-7 सम्मेलन में ट्रंप की ईरान डील ने वैश्विक राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो मध्य पूर्व में तनाव कम हो सकता है, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन इसके साथ ही परमाणु निगरानी, आर्थिक राहत और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जैसे कई प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं।
आने वाले सप्ताहों में यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता वास्तव में शांति और स्थिरता का मार्ग प्रशस्त करता है या फिर यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक उपलब्धि बनकर रह जाता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें ईरान, अमेरिका और जी-7 नेताओं की अगली चाल पर टिकी हुई हैं।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



