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ट्रम्प की गिद्ध दृष्टि ग्रीनलैण्ड पर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की गिद्ध दृष्टि वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैण्ड पर लगी है। इसके साथ ही रूस पर प्रतिबंध को लेकर भी अमेरिका रुकने का नाम नहीं ले रहा है। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडस ग्राहम ने रूस प्रतिबंध विधेयक पेश किया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताना एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर रहा है। व्हाइट हाउस ने यह पुष्टि कर दी है कि ग्रीनलैंड को लेकर सभी विकल्प खुले हैं। यहां तक कि सैन्य कार्रवाई भी। हालांकि यह केवल कई आर्थिक राजनीतिक और कूटनीतिक विकल्पों में से एक हैए लेकिन यदि ऐसा हुआ तो यह नाटो के इतिहास का सबसे बड़ा संकट बन सकता है क्योंकि यह एक नाटो सदस्य देश द्वारा दूसरे नाटो सदस्य पर हमला होगा।
ग्रीनलैंड-भले ही भौगोलिक रूप से विशाल हो लेकिन इसकी आबादी महज 58,000 के आसपास है। इनमें से एक-तिहाई लोग राजधानी नूक में रहते हैं जबकि बाकी अधिकतर पश्चिमी तट पर बसे हैं। इस द्वीप का अपना कोई स्वतंत्र सैन्य बल नहीं है और इसकी रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है जिसके पास सीमित हवाई और नौसैनिक संसाधन हैं। कई इलाकों में तो सुरक्षा केवल डेनमार्क की विशेष इकाई सिरियस पेट्रोल, के भरोसे है जो आज भी कुत्तों की स्लेज पर गश्त करती है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका यदि चाहे तो ग्रीनलैंड पर तेज और निर्णायक सैन्य अभियान चला सकता है। अमेरिका की अलास्का स्थित 11वीं एयरबोर्न डिवीजन, जो आर्कटिक परिस्थितियों में लड़ाई के लिए प्रशिक्षित है, इस तरह के किसी भी ऑपरेशन की रीढ़ बन सकती है। इसके अलावा ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित पिटुफिक सैन्य अड्डे पर पहले से ही 100 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो किसी भी कार्रवाई के लिए लॉजिस्टिक आधार बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा कदम अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा और अमेरिका-यूरोप संबंधों को गहरी चोट पहुंचाएगा।
सैन्य विकल्प के अलावा ग्रीनलैंड को खरीदने की चर्चा भी सामने आई है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कांग्रेस के कुछ सदस्यों से कहा कि प्रशासन की प्राथमिकता यही रास्ता है। हालांकि न तो ग्रीनलैंड और न ही डेनमार्क इस द्वीप को बेचने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा इस तरह के सौदे के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी सीनेट में दो.तिहाई समर्थन और यूरोपीय संघ की सहमति भी जरूरी होगी, जो इसे बेहद जटिल बनाता है।
एक और संभावित रास्ता ग्रीनलैंड के लोगों को प्रभावित करने का है। जनमत सर्वेक्षण बताते हैं कि ग्रीनलैंड के लोग डेनमार्क से स्वतंत्रता तो चाहते हैं, लेकिन अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं। इसके बावजूद अमेरिका आर्थिक प्रलोभन, निवेश और रणनीतिक साझेदारी के जरिए वहां प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। फिलहाल, ग्रीनलैंड की कोई भी राजनीतिक पार्टी अमेरिका में शामिल होने की वकालत नहीं कर रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड का भविष्य अमेरिका से ज्यादा यूरोप के साथ जुड़ा हो सकता है। ऐसे में ट्रंप की यह महत्वाकांक्षा केवल शक्ति प्रदर्शन नहींए बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में संसाधनों, रणनीति और वैश्विक प्रभुत्व की लड़ाई का संकेत देती है जिसके परिणाम दूरगामी और निर्णायक हो सकते हैं।
दूसरी तरफ अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर सख्त रुख उभरता दिख रहा है। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक द्विदलीय रूस प्रतिबंध विधेयक (रशिया संक्शनसबिल) को “ग्रीनलाइट” दे दी है। यदि यह विधेयक अमेरिकी सीनेट में पारित हो जाता है, तो इसके प्रभाव केवल रूस तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि भारत, चीन और ब्राजील जैसे उन देशों पर भी पड़ सकते हैं जो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीद रहे हैं।
यह विधेयक रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था पर ऐसा दबाव बनाना है जिससे उसकी युद्ध क्षमता कमजोर हो जाए। विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया जाएगा कि वे रूस से ऊर्जा संसाधन खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ और द्वितीयक प्रतिबंध (सेकेंडरी सैंक्शन्स) लगा सकें।
ग्राहम का कहना है कि उन्होंने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की, जहां राष्ट्रपति ने इस बिल को समर्थन देने की बात कही। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने भी इस घटनाक्रम की पुष्टि की है। ग्राहम के अनुसार, यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब यूक्रेन शांति वार्ता के लिए कुछ रियायतें देने को तैयार है, जबकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन केवल बयानबाजी कर रहे हैं और हिंसा जारी है।
इस प्रस्तावित कानून का मकसद रूस की आय के मुख्य स्रोत-तेल, गैस और यूरेनियम को निशाना बनाना है। अमेरिका का मानना है कि इन्हीं संसाधनों से मिलने वाला राजस्व रूस की सैन्य मशीनरी को ईंधन देता है। यदि रूस के व्यापारिक साझेदारों पर कठोर आर्थिक दंड लगाया जाता है, तो मॉस्को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अलग-थलग पड़ सकता है।
हालांकि, इस विधेयक को लेकर कुछ व्यावहारिक और कूटनीतिक सवाल भी खड़े हो रहे हैं। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल पर निर्भर रहे हैं, इस कदम को आर्थिक दबाव और रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख सकते हैं। चीन और ब्राजील पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार संतुलन और भू-राजनीति में नई दरारें उभरने की आशंका है।
फिलहाल, सीनेट में इस बिल पर मतदान अगले सप्ताह हो सकता है, हालांकि सरकारी फंडिंग और अवकाश कार्यक्रमों के कारण समय-सीमा स्पष्ट नहीं है। ट्रंप प्रशासन समानांतर रूप से यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए शांति समझौते की कोशिशों में भी लगा है, जिसमें विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर अहम भूमिका निभा रहे हैं।
कुल मिलाकर, रूस प्रतिबंध विधेयक केवल एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला फैसला साबित हो सकता है, जिसके दूरगामी प्रभाव अमेरिका से कहीं आगे तक महसूस किए जाएंगे। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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