लेखक की कलम

क्या हैं सोनम वांगचुक के आमरण अनशन के मायने

आमरण अनशन एक अहिंसक नैतिक अस्त्र-

आमरण अनशन, विरोध, नैतिक आग्रह और लोकतंत्र एक शक्तिशाली अस्त्र है। भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां यह केवल एक भूख हड़ताल ही नहीं अपितु सरकार से अपनी बात मनवाने, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और सत्ता या समाज के विवेक को जगाने तथा उनकी आत्मा को झकझोरने के लिए एक अत्यन्त शक्तिशाली और अहिंसक नैतिक अस्त्र साबित हुआ है।

इतिहास में दर्ज कहानियां-

भारतीय संस्कृति में आमरण अनशन की एक ऐतिहासिक गौरवशाली परम्परा रही है। ऋषियों-मुनियों द्वारा प्रायश्चित या अपनी मांगों के लिए उपवास का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। स्वाधीनता संग्राम के समय ब्रिटिश साम्राज्य को अपना विरोध जताने एवं अपनी मांगों को मनवाने के लिए महात्मा गांधी ने इसे वैश्विक मंच दिया। उन्होंने देश को आजाद कराने तथा सामाजिक कुरीतियों के विरोध में अनेक बार आमरण अनशन किये और ब्रिटिश सरकार को झुकने पर मजबूर किया। आधुनिक समय में अन्ना हजारे के आन्दोलन को अभी बहुत अधिक समय नहीं हुआ है, जब हमने देखा था कि कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त लोकपाल बिल की नैतिक मांग के आगे सरकार घुटनों पर आ गई थी और पूरा देश उनके समर्थन में आ गया था।

अनशन की ताकत-

महात्मा गांधी ने कहा था आमरण अनशन विरोध का अन्तिम उपाय होना चाहियें इससे पहले सभी शान्तिपूर्ण संवाद के मार्ग अपनाए जाने चाहिये। क्योंकि यह मात्र भूख हड़ताल नहीं है अनशन करने वाले व्यक्ति के लिए यह एक ऐसी तपस्या है जो कि सामाजिक कल्याण के खास उद्देश्य को प्राप्त करना है तथा सत्ता को एक नैतिक संदेश देना है।

क्यों है वांगचुक का अनशन-

वर्तमान समय में सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् शिक्षाविद् सोनम वांगचुक 28 जून से नई दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चित कालीन आमरण अनशन पर हैं। उनके उपवास को बीस दिन से ऊपर हो चुके हैं। वे विगत माह विशेषकर नीट यूपी 2026 में हुई अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ देश भर के बच्चों के द्वारा किये जा रहे आंदोलन में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

आन्दोलन के उद्देश्य-

आरम्भ में यह आंदोलन मुख्य रूप से हाल ही में बनी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा शुरू किया था। शुरू में यह आंदोलन सिर्फ बच्चों के विरोध के रूप में दिखाई दे रहा था, बाद में वांगचुक और अखिल भारतीय छात्र संघ के सम्मिलित होने से एक बहुत बड़े आंदोलन के रूप परिवर्तित हो गया। सोनम वांगचुक द्वारा धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है। उनका वजन लगातार कम हो रहा है जोकि चिन्ताजनक है। डाॅक्टरों ने चेतावनी दी है कि आगे आने वाला समय उनके जीवन के लिए खतरनाक है। लेकिन अत्यन्त कमजोर होने के बावजूद सोनम वांगचुक ने अन्न ग्रहण करने से मना कर दिया है और सामने आकर ऐलान किया है कि वे किसी भी कीमत पर 20 जुलाई तक जीवित रहेंगे और अपने समर्थकों के साथ मिलकर संसद तक शान्तिपूर्ण मार्च करेंगे।

परीक्षा प्रणाली में अनियमितताओं के दुष्परिणाम-

लाखों की संख्या में हमारे भारतीय छात्र परीक्षाओं की तैयारी करते हैं उसमें बैठते हैं और फिर जब पेपर लीक की खबर आती है तो वे और उनके माता-पिता सदमे में आ जाते हैं। सालों से की गई मेहनत और पैसे के बर्बाद होने से दुःखी बीस से अधिक होनहार छात्र-छात्राओं ने आत्महत्याएं कीं जो किसी भी समाज के लिए दुःखद है। पीड़ित छात्रों का कहना है कि जो शिक्षा मंत्री परीक्षाओं की व्यवस्थाओं को ही नहीं समझ पा रहे हैं उन्हें अपने पद पर बने रहने का भी अधिकार नहीं होना चाहिये। उन्हें तो नैतिक आधार पर ही अपनी जिम्मेदारी समझते हुए स्वयं इस्तीफा दे देना चाहिये था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि शासन की तरफ से भी कोई जिम्मेदाराना बयान अभी तक नहीं आया। इससे स्थिति और बिगड़ती ही जा रही है। निश्चित ही सोनम वांगचुक के आंदोलन में शामिल होने और आमरण अनशन पर बैठने से न्याय की गुहार लगा रहे छात्रों के इस आंदोलन को एक सार्थक गति मिली है।

सोनम वांगचुक ने कहा-

एक साक्षात्कार में सोनम वांगचुक ने कहा था ‘‘जनता को जागरूक करना और सत्ता में बैठे लोगों को समझाना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब आप जनता को जागरूक करते हैं तो सरकारों में बदलाव आता है उन्हें जनमत की परवाह होती है, हो सकता है कि उन्हें मेरी सेहत की परवाह ही न हो।’’

वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर प्रतिक्रियाएं-

प्रवासी भारतीयों की संस्था ‘हिन्दूज फाॅर स्यूमन राइट्स’ ने आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर चिन्ता जताते हुए शिक्षक वर्ग ने कहा है कि ‘‘सरकार को सोनम वांगचुक से मिलना चाहिए और परीक्षा प्रणाली की अव्यवस्थाओं और अनियमितताओं पर जवाबदेही तय करते हुये भरोसेमंद प्रक्रिया प्रारम्भ करनी चाहिये। सोमन वांगचुक से मिलने उनका हाल-चाल लेने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियांे ने उनके पास जाकर उनसे बात की। इसके अतिरिक्त अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, अभिनेता और अभिनेत्रियां उनसे मिलने पहुंचे।

बिगड़ी सेहत के कारण वांगचुक अस्पताल में भर्ती-

तेजी से बिगड़ती परिस्थितियों के मद्देनजर 18 जुलाई को वांगचुक को अस्पताल ले जाया गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि अस्पताल जाने से एक दिन पहले उन्होंने देश की जनता से रूबरू होकर यह कहा था कि उन्हें विश्वास है कि वे 20 जुलाई तक जीवित रहेंगे और संसद तक शांतिपूर्ण मार्च करेंगे। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि वांगचुक की इच्छा शक्ति और देश भर के बच्चों का जुनून क्या रंग लाता है। 17 जुलाई को इस आंदोलन मंे वांगचुक के सहयोग के लिए उनकी पत्नी गीतांजलि भी सम्मिलित हो गई थीं।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

 

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