डोभाल की सच बयानी पर सवाल क्यों ?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के प्रतिशोध लेने वाले एक बयान को लेकर देश भर में बहस छिड़ी है। डोभाल ने बीते शनिवार अर्थात् 10 जनवरी को राजधानी दिल्ली में आयोजित ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से कहा कि भारत को अपनी गुलामी, हमलों और अधीनता के इतिहास का बदला लेना चाहिए लेकिन यह बदलाव सशक्त और महान भारत के पुनर्निर्माण के रूप में होना चाहिए। अब डोभाल के इसी संबोधन के कुछ लाइन व शब्दों को लेकर देश की विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने गंभीर आपत्ति और आलोचना शुरू कर दी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के इतिहास के लिए ‘बदले’ से जुड़े बयान पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि इस तरह की भाषा नफरत को बढ़ावा देती है और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने का काम करती है, जिससे एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं।
दिल्ली में विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग के उद्घाटन समारोह में डोभाल ने कहा, आज का स्वतंत्र भारत हमेशा से उतना स्वतंत्र नहीं था, जितना अब दिखाई देता है। इसके लिए हमारे पूर्वजों ने बड़े बलिदान दिए। उन्होंने गहरे अपमान सहे और लंबे समय तक बेबसी के दौर देखे। कई लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। हमारे गांव जलाए गए। हमारी सभ्यता को नष्ट किया गया। हमारे मंदिरों को लूटा गया और हम मूक दर्शक बनकर देखते रह गए। यह इतिहास आज के भारत के हर युवा के सामने एक चुनौती रखता है, जिसके भीतर यह आग होनी चाहिए। अजित डोभाल ने कहा, बदला शब्द शायद सही न लगे, लेकिन बदला अपने आप में एक बड़ी ताकत है। हमें अपने इतिहास के लिए बदला लेना होगा। हमें इस देश को उस स्थिति तक वापस ले जाना है, जहां हम अपने अधिकारों, अपने विचारों और अपने विश्वासों के आधार पर एक महान भारत का निर्माण कर सकें।
उन्होंने आगे कहा, हमारी सभ्यता बेहद विकसित थी। हमने कभी किसी के मंदिर नहीं तोड़े। हमने कहीं जाकर लूटपाट नहीं की। जब दुनिया का बड़ा हिस्सा बेहद पिछड़ा हुआ था, तब हमने किसी देश या किसी विदेशी लोगों पर हमला नहीं किया। लेकिन हम अपनी सुरक्षा और खुद पर मंडराते खतरों को समझने में असफल रहे। जब हम उनके प्रति उदासीन बने रहे, तब इतिहास ने हमें एक सबक सिखाया। क्या हमने वह सबक सीखा। क्या हम उस सबक को याद रखेंगे। अगर आने वाली पीढ़ियां उस सबक को भूल गईं, तो यह इस देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी।
इस यूथ सम्मिट में अजीत डोभाल ने यह भी कहा कि युद्ध राष्ट्र की इच्छाशक्ति के लिए लड़े जाते हैं। हम साइकोपैथ (मनोरोगी) नहीं हैं, जिन्हें दुश्मन के शव या कटे हुए अंग देखकर संतोष या सुकून मिले। लड़ाइयां इसके लिए नहीं लड़ी जातीं। उन्होंने कहा कि युद्ध किसी देश का मनोबल तोड़ने के लिए लड़े जाते हैं, ताकि वह हमारी शर्तों पर आत्मसमर्पण करें और हम अपने लक्ष्य हासिल कर सकें। अजीत डोभाल ने सादगी और आत्मीयता के साथ युवाओं से कहा कि उनका कार्यक्षेत्र और अनुभव युवाओं से अलग है और उम्र का अंतर भी बड़ा है। डोभाल ने कहा, “आपमें से अधिकांश मुझसे 60 साल से ज्यादा छोटे हैं। मेरा जन्म स्वतंत्र भारत में नहीं, बल्कि आजादी से पहले हुआ था। मेरी जवानी तो कब की बीत चुकी है। इसलिए मैं यह सोचकर असमंजस में था कि यहां आऊं या नहीं।” उन्होंने स्वीकार किया कि आज के बदलते दौर में तकनीक, सोच और जीवनशैली इतनी तेजी से बदल रही है कि वह सब कुछ जानने का दावा नहीं कर सकते, लेकिन कुछ मूल बातें ऐसी हैं, जो हर पीढ़ी को जोड़ती हैं।
युवाओं को संबोधित करते हुए एनएसए डोभाल ने निर्णय लेने की क्षमता को जीवन का सबसे अहम कौशल बताया। उन्होंने कहा कि चाहे समय बदले या तकनीक, इंसान के फैसले ही उसकी पहचान बनाते हैं। उनके शब्दों में, “एक छोटी सी बात है जो आपके पूरे जीवन की दिशा तय करती है- आपकी निर्णय लेने की क्षमता। आप रोज छोटे-बड़े फैसले लेते हैं। जैसे-जैसे आपकी उम्र और जिम्मेदारियां बढ़ेंगी, फैसलों का महत्व और बढ़ता जाएगा।” डोभाल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के भविष्य को लेकर उन्हें किसी तरह का संदेह नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “भारत विकसित होगा, यह निश्चित है। इस पर कोई सवाल नहीं है।”
अपने संबोधन में अजीत डोभाल ने वैश्विक हालात और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में चल रहे अधिकांश युद्ध और टकराव इस बात का नतीजा हैं कि कुछ देश दूसरों पर अपनी इच्छा थोपना चाहते हैं। डोभाल ने कहा, “अगर आप शक्तिशाली हैं, तो आप स्वतंत्र रहेंगे लेकिन अगर आत्मविश्वास नहीं है, तो आपकी सारी शक्ति, हथियार और संसाधन बेकार हैं।” उन्होंने भारत के वर्तमान नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि देश को ऐसा नेतृत्व मिलना सौभाग्य की बात है, जिसकी प्रतिबद्धता, समर्पण और कड़ी मेहनत पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा है।
डोभाल ने नेतृत्व के महत्व को समझाने के लिए फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “नेपोलियन ने एक बार कहा था, मैं एक भेड़ के नेतृत्व में 1000 शेरों से नहीं डरता, लेकिन एक शेर के नेतृत्व में 1000 भेड़ों से डरता हूं।” इस कथन के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया कि नेतृत्व केवल पद या शक्ति का नाम नहीं है, बल्कि दिशा, आत्मविश्वास और साहस देने की क्षमता का नाम है। ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ में डोभाल ने इतिहास का उदाहरण देते हुए बताया कि भारत का वैश्विक नेतृत्व कोई नई बात नहीं है। उन्होंने ‘विश्व अर्थव्यवस्था का इतिहास’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक का उल्लेख किया, जिसे म्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने लिखा था। डोभाल के अनुसार इस पुस्तक में पहली से उन्नीसवीं शताब्दी तक का आर्थिक इतिहास दर्ज है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि करीब 1700 वर्षों तक भारत और कभी-कभी चीन विश्व अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करते रहे।
एनएसए ने कहा कि उस दौर में भारत और चीन मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था का 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा रखते थे। डोभाल ने कहा कि हम कभी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था के शिखर पर थे। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत का पतन हुआ, क्योंकि कोई भी सफलता स्थायी नहीं होती। यह एक निरंतर संघर्ष है। राष्ट्र को मजबूत बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास जरूरी है। यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। अपने भाषण के भावनात्मक हिस्से में अजीत डोभाल ने स्वतंत्रता संग्राम और शहीदों के बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि आज का भारत वैसा स्वतंत्र नहीं था जैसा आज दिखाई देता है। डोभाल ने कहा, “हमारे पूर्वजों ने अपमान सहे, बलिदान दिए और कई लोगों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। भगत सिंह को फांसी दी गई, सुभाष चंद्र बोस ने जीवन भर संघर्ष किया और महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।” उन्होंने यह भी कहा कि अनगिनत लोगों ने अपनी जान गंवाई ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्र भारत में सांस ले सकें। एनएसए ने भारत के इतिहास के उन अध्यायों का भी जिक्र किया, जिनमें देश ने अपमान और अत्याचार सहे। उन्होंने कहा कि हमारे मंदिर तोड़े गए, गांव लूटे गए और हमारी सभ्यता को कुचल दिया गया, जबकि हम असहाय मूक दर्शक बने रहे। हालांकि डोभाल ने यह भी स्पष्ट किया कि इतिहास का उद्देश्य केवल दुख याद करना नहीं, बल्कि उससे सीख लेना है। इतिहास हमें चुनौती देता है। अपने संबोधन के अंत में डोभाल ने युवाओं से आह्वान किया कि वे नकारात्मक भावना के बजाय सकारात्मक राष्ट्रनिर्माण की सोच अपनाएं।
अब एनएसए के बयान की सिर्फ बदला वाले अधूरी लाइन को लेकर कुछ राजनीतिक विरोधी इस बयान के अपने मत अनुसार अलग-अलग अर्थ निकाल कर हंगामा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वास्तव में अपने इतिहास को भुला कर बिना कोई सबक लिए हम सुरक्षित वर्तमान और विकसित संरक्षित भविष्य की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। हमें उनसे सबक लेकर ही भविष्य की तैयारी करनी होगी और एनएसए डोभाल सिर्फ यही कहना चाहते हैं वह खून-खराबा वाले प्रतिशोध की नहीं बल्कि विकास और प्रगति के बल पर तरक्की का मूलमंत्र दे रहे हैं। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)


