छत्तीसगढ़ की अमिता को सलाम

आज भी बेटियों को कमतर आंकने वालों को छत्तीसगढ़ की अमिता श्रीवास के साहस और लगन से शिक्षा लेनी चाहिए। बिना जूतों के पर्वतारोहण का अभ्यास किया और गांेद के लड्डू, ठेठरी और सलौनी खाकर एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। यह 22 मई 2026 की तारीख थी जब अमिता ने केवल एवरेस्ट ही नहीं जीता बल्कि सामाजिक और आर्थिक सोच के पहाड़ों पर भी विजय प्राप्त की थी।
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई को छू लेना ही एवरेस्ट फतह नहीं माना जाता, बल्कि उस ऊंचाई को छूकर सकुशल लौटने वाले को ही वास्तविक एवरेस्ट विजेता कहा जाता है। यह कठिन परीक्षा हाल ही में छत्तीसगढ़ की बेटी अमिता श्रीवास ने भी पूरी की। अमिता के लिए यह सफर केवल बर्फीली चोटियों को पार करने का नहीं, बल्कि मौत को बेहद करीब से देखने का भी था।एवरेस्ट फतह करने वाली अमिता श्रीवास की कहानी किसी संपन्न परिवार से नहीं, बल्कि जांजगीर-चांपा जिले के एक अत्यंत गरीब और विपरित परिस्थितियों से शुरू होती है। उनके पिता जैतराम श्रीवास चांपा के लोहारपारा में एक छोटी-सी सैलून चलाते हैं, उसी आय से उन्होंने पांच बेटियों और दो बेटों का पालन-पोषण हुआ।वर्ष 2008 में उन्होंने शासकीय लक्ष्मीबाई गर्ल्स स्कूल, चांपा से बारहवीं उत्तीर्ण की और इसके बाद बी.कॉम की पढ़ाई पूरी की। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए वर्ष 2011 में वे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बन गईं।
चांपा नगर पालिका के वार्ड 4 में छोटे से आंगनबाड़ी भवन में नन्हें मुन्ने बच्चों को संभालते हुए अमिता अक्सर अपने भविष्य के सपने बुनती थीं। उनकी नजर अक्सर कुछ दूर स्थित अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत संयंत्र, मड़वा पर पड़ती थी। उन्हें कल्पना भी नहीं थी कि एक दिन यही विद्युत परियोजना उनके पर्वतारोहण के सपनों को नई उड़ान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी का यह इस ताप विद्युत केवल बिजली पैदा नहीं करता, बल्कि अपने कोरे में पल रही बेटी अमिता श्रीवास के सपनों को भी नई ऊर्जा दे रहा है। किसी औद्योगिक परियोजना का लाभ स्थानीय लोगों के जीवन को कैसे नई दिशा दे सकता है, अमिता इसका सशक्त उदाहरण हैं।
वैसे तो अमिता श्रीवास की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर्वतारोही वाली नहीं रही है, परन्तु पहली बार उनकी सहेली क्षमा राजपूत के साथ माउंट आबू में उन्होंने पर्वतारोहण का अनुभव लिया और वहीं से ऊंचे पर्वतों को लांघने के बड़े सपने देखने लगी। सपने को मंजिल तक पहुंचाने के लिए उन्होंने वर्ष 2018 में पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स किया। इसके बाद सिक्किम में 28 दिन के एडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण में प्रवेश मिला। महज कुछ हजार रुपये का मानदेय पाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए प्रशिक्षण की फीस जुटाना आसान भी नहीं था। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और किसी तरह प्रशिक्षण पूरा किया। एवरेस्ट के लिए 9 अप्रैल को ट्रेन से दिल्ली के लिये निकली, वहां से काठमांडू और एवरेस्ट के बेस कैंप पहुंची। एवरेस्ट की चोटी पर फहराया गया तिरंगा केवल एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं है। यह उस छत्तीसगढ़ी बेटी के अदम्य साहस, संघर्ष और संकल्प की कहानी है, जिसने अभावों को अपनी मंजिल के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



