अध्यात्म

पूर्ण पुरुष क्यों हैं कृष्ण

कृष्ण एक ऐसे भगवान हैं, जिन्होंने जीवन को स्वीकार किया। कृष्ण को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँध सकते। संसार में अनेक महापुरुष हुए, अवतार हुए पर कृष्ण जैसा कोई नहीं हुआ। कृष्ण सब कुछ हैं और सबसे परे भी हैं। कृष्ण रणभूमि में योद्धा हैं तो बांसुरी की धुन में प्रेम हैं वे रास में भी हैं और ध्यान में भी हैं वे शरारत करते हैं छल करते हैं फिर भी निर्विकार हैं। वे कहते हैं, मैं जो कुछ भी करता हूँ उसमें मैं नहीं हूँ। यही वह रहस्य है जो कृष्ण को पृथक बनाता है वे कर्ता नहीं साक्षी हैं। उनका हर कर्म एक नृत्य हैं क्योंकि वे उसमें खोते नहीं उसे साक्षी भाव से देखते हैं। वे कहते हैं कर्म कर पर फल की चिन्ता मत कर। मैं को हटाकर सब कार्य करना, साक्षी भाव से अपने भीतर की ओर देखना ही ध्यान है। ध्यान का मतलब मात्र आँखें बंद करना नहीं है बल्कि अपने अन्तर्मन में उतरना है। कृष्ण ने कहा है जीवन में उतर जाओ। कृष्ण की सुन्दरता इसी में है कि वे विरोधाभास में रहते हैं। जीवन एकरसता में नहीं बहता वह एक नदी के बहाव की तरह ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होता हुआ अनेक अन्तर्विरोधों के साथ सहजता के साथ बहता है। गीता में दिया गया उपदेश भी हमें जीवन और मृत्यु दोनों को स्वीकारने का स्पष्ट संदेश देता है।
श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। वे देवकी और वसुदेव के पुत्र थे पर उनका पालन-पोषण माता यशोदा ने किया था। भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कहा जाता है कि वे सोलह कलाओं और चैंसठ विधाओं में निपुण थे, जो उन्होंने उज्जैन में स्थित सांदीपनी गुरू के आश्रम में रहकर मात्र 64 दिनों में सीखी थी। यहां यह जानना रुचिकर होगा कि हमारी प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था अत्यन्त व्यापक थी। पुरानी शिक्षा प्रणाली में केवल शास्त्रीय या किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने के लिए उपयोगी लौकिक ज्ञान का भी सम्यक समावेश होता था। लौकिक ज्ञान के अन्तर्गत कलाओं का भी विशेष महत्व था। पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम ने अवन्तिकापुरी उज्जैन में स्थित महर्षि सांदीपनी के आश्रम में इन 16 विधाओं और 64 कलाओं की शिक्षा बहुत कम समय में ग्रहण की थी। कहते हैं वे प्रतिदिन एक नई कला या विद्या सीखते थे और उसमें पारंगत हो जाते थे। यह प्राचीन गुरुकुल पद्धति की उत्कृष्टता और कृष्ण के अलौकिक जिज्ञासु शिक्षार्थी होने को दर्शाता है। यूँ तो कलाएं अनन्त हैं लेकिन प्राचीन भारतीय संस्कृति में एक सुसंस्कृत और परिपूर्ण व्यक्ति में ये 64 कलाएं आवश्यक मानी जाती हैं जो कृष्ण को पूर्णतः आती थीं इसी कारण कृष्ण को पूर्ण पुरुष कहा गया।
राधा भी हैं पूर्ण स्त्री
प्राचीन धार्मिक और पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार श्री राधा रानी भगवान कृष्ण की आन्तरिक शक्ति हैं, कहते हैं उन्हें भी पूर्ण स्त्री और सर्वोच्च शक्ति माना जाता है तभी तो कृष्ण जो कि पूर्ण पुरुष हैं उनकी मित्र राधा बनती हैं क्योंकि वो भी पूर्ण हैं सर्वोच्च हैं।
पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार राधा और कृष्ण दो अलग-अलग सत्ता नहीं बल्कि एक ही चेतना के दो रूप हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा भगवान कृष्ण की आदि शक्ति स्वरूपा हैं। राधा की पहली उपस्थिति साहित्य में 12वीं शताब्दी में जयदेव द्वारा रचित गीत गोविन्द के अतिरिक्त निम्बार्काचार्य की दार्शनिक रचनाओं में मिलती है। राधा का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। ब्रह्मवैर्वत पुराण में कृष्ण की सर्वोच्च शक्ति के रूप में, मत्स्य पुराण में देवी के रूप में, लिंग पुराण में लक्ष्मी के रूप में कृष्ण की प्रेमिका के रूप में तथा अन्य पुराणों में प्रेम की देवी के रूप में राधा का उल्लेख मिलता है।
कृष्ण के प्रति राधा का प्रेम भौतिक या सांसारिक स्वार्थ से परे, पूर्णतः निष्काम और आध्यात्मिक था। इसे प्रेम और भक्ति की सर्वोच्च स्थिति कहते हैं जिसमें प्रेम और प्रिय का भेद मिट जाता है। राधा ने अपने अहं को त्यागकर कृष्ण को अपना सर्वस्व माना था। उनके समर्पण पूर्ण रूप से आत्मा और परमात्मा के प्रति मिलन था। शास्त्रों में कृष्ण और राधा को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। राधा के बिना कृष्ण और कृष्ण के बिना राधा अधूरे हैं। हमारी भारतीय धार्मिक परम्परा में राधा-कृष्ण लिखा जाता है जो यह रेखांकित करता है, कि हमारी संस्कृति में ईश्वर के नाम से पहले शक्ति का नाम लिया जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है कल चार सितम्बर को। हम सभी भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं ठाकुर जी को झूला झुलाते हैं प्रसाद बनाते हैं, नए कपड़े पहनाते हैं भगवान को, गीत गाते हैं, खुश होते हैं, यह सब अच्छा है मगर हम यह नहीं जानते कि कृष्ण का जन्म एक संयोग नहीं है, न ही वे साधारण अवतार हैं। जन्माष्टमी कोई एक साधारण तिथि नहीं है जिसे हम शोर मचा कर उत्सव मनाकर बिता दें। कृष्ण जीवन के सबसे बड़े रहस्य का नाम है। जन्माष्टमी घोर अंधकार के बीच चेतना के विस्फोट का उत्सव है। यह संकेत है इस बात का कि परमात्मा हमेशा वहीं जन्म लेता हैं जहां अंधकार होता है। कंस का कारागार भी कोई साधारण जेल नहीं है। इस जेल में पहरेदार थे मृत्यु का भय हर पल सता रहा था ऐसे समय में कृष्ण का जन्म होता है। यह संकेत है इस बात का कि जब भी हमारा मन परेशान होता है हम हारा हुआ महसूस करते हैं ठीक उसी समय हमारे भीतर एक चेतना जन्म लेने के लिए तैयार रहती है हमें उस चेतना को जाग्रत करने के लिए सचेत रहना होगा। अपने हृदय को खुला रखना होगा ताकि परमात्मा उतर सके, जन्म ले सके हमारे भीतर। कृष्ण जन्म की कहानी में जब वसुदेव कृष्ण को लेकर नंद गांव जाने के लिए निकलते हैं तो पहरेदार सो जाते हैं हथकड़ियाँ खुल जाती हैं। यमुना उफान पर हैं पर उनका पैर पड़ते ही वे थम कर नीचे हो जाती हैं। यह सब एक प्रतीक है चमत्कार की कहानी नहीं है। क्योंकि यही सच है कि जब चेतना जाग्रत होने को होती है तो बाहर के सारे बन्धन शिथिल पड़ने लगते हैं। कृष्ण की हर कहानी हमें जीवन का एक गहरा संदेश देती है कि यदि कोई जागना चाहता है तो मन और अहंकार की मजबूत दीवार भी अपने आप ढहने लगती हैं। यमुना का प्रतीक मन की धारा के रूप में हैं। चेतना यदि अपने पूर्ण रूप में जाग्रत हो तो बाहरी सभी शोर कम हो जाता है। कृष्ण का माखन चुराना भी हमें यही बताता है कि परमात्मा किसी नियम कानून में नहीं बंधता उसे पाने के लिये सहज और सरल होना जरूरी है। कृष्ण अपनी समस्त लीलाओं के माध्यम से हमें बताते हैं कि समाज ने जो सीमाएं, मर्यादायें…..हैं वे जीवन के सहज प्रवाह को रोकती हैं अतः कृष्ण उस सहजता के प्रतीक हैं जो नियमों में न बंधकर भी अधर्म नहीं करते। उनकी रास लीला अस्तित्व के साथ परम नृत्य की
कथा है जो यह संदेश देती है कि परमात्मा हर व्यक्ति के साथ है अपने पूर्ण रूप में हैं।
गीता में अर्जुन को दिया गया उपदेश मात्र युद्ध के लिए अर्जुन को उकसाना नहीं है अपितु वह एक समग्र जीवन दर्शन है, वे कहते हैं कर्म करो फल की चिन्ता मत करो। यह जितना सरल दिखाई देता है उतना ही कठिन है इसे जीवन में उतारना। कृष्ण कहते हैं कि कर्म को डूबकर करो, पूरी लगन और निष्ठा से। कर्म करते समय सिर्फ कर्म के बारे में सोचो फल अपने आप आयेगा। यह कोई अकर्मण्यता की शिक्षा नहीं है बल्कि यह अनासक्त कर्म की शिक्षा है। जिसे सही तरीके से समझ लें तो जीवन आसान हो जायेगा। बिना भविष्य की चिन्ता किये बिना अतीत को याद किये, वर्तमान में रहने की बात सिखाते हैं कृष्ण। जो जीवन जीने की सच्ची कला है। कृष्ण जब अर्जुन से कहते हैं कि डरो मत युद्ध करो, आत्मा तो अजर अमर है न वह जन्म लेती है और न मरती है, तो यह मात्र एक आमंत्रण है भय से मुक्त होने का। कृष्ण इसीलिये पूर्ण अवतार हैं, पूर्ण पुरुष हैं क्योंकि वे जीवन से भरे हुये हैं, सहज हैं, सरल हैं।

(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

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