अध्यात्म

रक्षा सूत्र परम्परा, महत्व और कुछ कहानियाँ

सावन के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला त्यौहार रक्षाबन्धन मनाते तो हम सभी हैं लेकिन क्या आप जानते हैं इस रक्षा- सूत्र के महत्व को और इसके इतिहास को। तो आइये आज हम जानते हैं कि क्यों मनाते हैं हम यह त्यौहार और रक्षा-सूत्र के पीछे की कहानी क्या है। सबसे पहले किसने बाँधी थी राखी। पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बाँधा था।
माता लक्ष्मी और राजा बलि की कथा
भविष्य पुराण और श्रीमदभागवत पुराण में एक महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर असुरराज बलि से तीनपग भूमि दान में मांगी थी, तब भगवान विष्णु के आग्रह पर दैत्य राज बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया था। विष्णु जी ने राजा बलि के त्याग और समर्पण से प्रसन्न होकर वरदान मांगने के लिए कहा। राजा बलि ने भगवान से वरदान स्वरूप सदैव अपने सामने रहने की प्रार्थना की। भगवान वचनबद्ध हो गये थे अतः अब वे पाताल में राजा बलि के द्वार पर पहरा देने लगे। यह बात माता लक्ष्मी को बिलकुल अच्छी नहीं लगी। अब वे अपने पति विष्णु को बैकुंठ में वापस लाने के बारे में विचार करने लगीं। उन्होंने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंच कर श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षा सूत्र बाँधकर उसे अपना भाई बना लिया। बलि ने भी उन्हें अपनी बहन के रूप में उन्हें स्वीकार किया और उपहार स्वरूप कुछ माँगने के लिए कहा। तब लक्ष्मी जी ने इनसे भगवान विष्णु को माँग लिया। पाताल लोक से शुरू होने वाली यह पहली कहानी है रक्षाबन्धन की। अतः सर्व प्रथम राखी माता लक्ष्मी ने राजा बली को बाँधी थी।
इन्द्र और इन्द्राणी की कथा
पुराणों में रक्षाबन्धन से सम्बन्धित इन्द्र और इन्द्राणी की एक कथा और मिलती है। भविष्य पुराण के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच बारह वर्षों तक एक लम्बा युद्ध चला, जिसमें दानव हावी होने लगे और देवता पराजित होने लगे। देवताओं की पराजय से चिन्तित होकर देवराज इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी देवगुरु बृहस्पति के पास गईं और उनसे देवताओं की विजय का उपाय पूछा। गुरु बृहस्पति ने इन्द्राणी को एक पवित्र अभियंत्रित रक्षा सूत्र दिया और उसे इन्द्र की कलाई पर बाँधने के लिए कहा। इन्द्राणी ने श्रावण मास की पूर्णिमा
के दिन वही धागा इन्द्र को बांधा जिससे उन्हें आध्यात्मिक शक्ति और सुरक्षा मिली और उन्होंने युद्ध में राक्षसों को परास्त किया। ऐसा माना जाता है कि इसी पौराणिक घटना
के बाद से ही रक्षाबन्धन पर्व की शुरुआत हुई।
श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा
भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का रिश्ता सखा भाव वाला था। महाभारत मंे प्राप्त कथा के अनुसार एक बार युद्ध में भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र के अनुसार एक बार युद्ध में भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र से शिशुपाल वध करते समय उनकी अँगुली कट गई और उससे खून बहने लगा। यह दृश्य द्रौपदी से नहीं देखा गया अतः उसने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी अँगुली पर बाँध दिया। उनके इस प्रेम भरे व्यवहार से भगवान प्रसन्न हुये और उन्होंने द्रौपदी को हमेशा सुरक्षा का वचन दे दिया जिसे उन्होंने चीरहरण के समय में पूरा किया गया। तभी से रक्षाबन्धन का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है।
इतिहास में रक्षाबन्धन
मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ की राखी बाँधने की कहानी, भारतीय इतिहास की एक लोकप्रिय घटना है। इसे हमारे पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाया गया है। कुछ लोग इसे एक लोककथा या मिथक भी कहते हैं।
1534 की बात है जब पति की मृत्यु के बाद मेवाड़ की राज माता और राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती अपने अल्पवयस्क पुत्र और राज्य की रक्षा के लिये चिन्तित थीं। तभी गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया रानी संकट में पड़ गईं तब उन्होंने मुगल सम्र्राट हुमायूँ को राखी और पत्र भेज कर उन्हें अपना भाई बनाकर उनसे अपनी और राज्य की रक्षा की गुहार लगाई थी। तब हुमायूँ राखी का मान रखते हुए बहन कर्णावती की रक्षा के लिए अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की ओर निकल पड़े थे। कहते हैं सेना के समय पर न पहुँच पाने के कारण रानी कर्णावती ने साहस के साथ अपने राज्य की रक्षा की फिर बाद में अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए जौहर कर लिया था।
यम और यमी की कथा
यम और यमी की कथा सूर्यदेव और देवी संज्ञा की जुड़वा्र संतान भाई-बहन के रूप में ऋग्वेद से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा है। लोक-कथाओं में यम अर्थात यमराज और यमी यानी यमुना नदी के रूप में जाने गये। कहते हैं 12 वर्षों तक यमुना अपने भाई यमराज को राखी नहीं बाँध पाई थीं वह अपने भाई यमराज को आमंत्रित करती हैं तब यमराज अपनी बहन यमुना के घर जाते हैं जहाँ वह उन्हें तिलक लगाकर राखी बाँधती हैं तब यमराज प्रसन्न होकर अमरता एवं हमेशा उसकी रक्षा का वरदान देते हैं।
हमारी हिन्दू संस्कृति और परम्पराओं में अनेक त्यौहार और रीति-रिवाज हैं जिनका हमारे जीवन मूल्यों में अत्यधिक महत्व है। रक्षाबन्धन भाई-बहन के पवित्र प्रेम विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के वचन का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। रक्षा का अर्थ है सुरक्षा और बंधन का अर्थ है रिश्ता अर्थात भाई की कलाई पर बाँधा जाने वाला पवित्र रक्षा सूत्र संकट के समय में बहन की रक्षा के संकल्प की याद दिलाता है।

(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

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