अध्यात्म

तुलसी की महिमा

'जिस घर हो तुलसी औ गाय, उस घर रोग कभी न जाय।’

गुणकारी वनस्पति (तुलसी)

तुलसी की तीन प्रमुख प्रजातियाँ हैं—

1. कृष्णतुलसी — इसे श्यामा तथा काली तुलसी भी कहते हैं। इसकी पत्तियाँ साँवले (श्याम) रंग की होती हैं और इसमें कफनाशक गुण अधिक होते हैं।

2. रामतुलसी — रामतुलसी की पत्तियाँ हरे (हरित) रंग की होती हैं। रामतुलसी एक विशिष्ट सुगंध वाली तुलसी है। इसकी पत्तियों से हाथों में मलने से अन्य तुलसियों की अपेक्षा अधिक सुगंध निकलती है। ‘रामतुलसी’ की अपेक्षा ‘श्यामतुलसी’ अधिक औषधीय गुणों वाली है।

3. वनतुलसी — यह उत्तर भारत के जंगलों में स्वयं उग आने वाला पौधा है। इसके पत्ते बड़े तथा तना अपेक्षाकृत मोटा होता है। तनों का उपयोग प्रायः मंजन बनाने में किया जाता है। इसका सुगंधीय या औषधीय उपयोग प्रायः अल्प है।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रजातियाँ भी प्रसिद्ध हैं।

तुलसी का उपयोग

तुलसी के बीजों से उड़ते रहनेवाला तेल त्वचा को छूकर रोम-रोम के विकारों को दूर कर देता है। प्रातः और सायं तुलसी के बिरवे के आगे धूप-दीप जलाने से आँखों की ज्योति बढ़ती है, श्वास के कष्ट मिटते हैं; क्योंकि तुलसी से उड़ते रहनेवाला तेल अदृश्य रूप से कांति, ओज और शक्ति से भरा रहता है।

तुलसी का पौधा आँगन में लगाने से वातावरण शुद्ध रहता है, मच्छर नहीं आते, व्यायाम करते समय श्वसन-क्रिया बढ़ जाती है और प्राणवायु भी अधिक मिलती है।

तुलसी में रोग-कीटाणुओं का नाश करने की विशेष शक्ति है। तुलसी-पत्र में पाए जाने वाला पीले रंग का तेल कीटनाशक होता है, वह उद्भ्रांतशील होने से पत्तियों से बाहर निकलकर हवा में फैल जाता है। इसीलिए तुलसी का स्पर्श करने वाली हवा जहाँ भी जाती है, वहाँ वह स्वास्थ्य के लिए लाभदायी सिद्ध होती है तथा मलेरिया और तपेदिक के कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायक होती है।

 

जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी की पत्तियों का सेवन करते हैं, वे अनेक प्रकार के रोगों से सुरक्षित रहते हैं। सामान्य रोग तो अपने-आप दूर हो जाते हैं। खाँसी, जुकाम, ज्वर, दाँत का दर्द, पेट का दर्द, सिर का दर्द, गले का दर्द, नाक का दर्द, आँखों के रोग, सूजन, खुजली, मन्दाग्नि, अजीर्ण, वमन, दस्त, पेचिश, हृदय-रोग, कृमि, सन्धिवात, फोड़े, घाव, चर्मरोग, मुँहासे, जलन (दाह), बालतोड़, लू लगना, स्नायुपीड़ा, स्वप्नदोष, मूर्च्छा, विष आदि तथा स्त्रियों और बच्चों के सामान्य रोगों में तुलसी के यथोचित उपयोग से आशातीत लाभ होता है। तुलसी-चिकित्सा की जानकारी होने पर सामान्य रोगों की चिकित्सा स्वयं भी की जा सकती है।

तुलसी में एण्टीस्ट्रेस गुण हैं — आरोग्य की दृष्टि से तुलसी की चाय प्रतिदिन पीने से या नियमित रूप से उसकी ताजी पत्तियाँ चबाकर खाने से प्रतिदिन के मानसिक तनाव की तीव्रता कम हो जाती है। चाय में स्फूर्तिदायक गुण होने पर भी उसमें कैफीन और टैनिन नामक हानिकारक तत्त्व भी होता है, किंतु ‘तुलसी’ की चाय में ऐसा कोई तत्त्व नहीं होता। अतः सुबह, दोपहर, शाम के समय तुलसी की चाय का उपयोग हितकारी है।

ऋतु-परिवर्तन के समय जब दुर्बलताजनित रोग, मलेरिया, हैजा आदि बीमारियाँ फैली हुई हों, उन दिनों सुबह-शाम तुलसी की परिक्रमा करने से इन रोगों का भय नहीं रहता। तुलसी विशेषतः विषमज्वर (मलेरिया) की शत्रु है। तुलसी के पौधे से निकलने वाली विशेष प्रकार की सुगन्ध में मच्छरों का नाश करने वाली शक्ति है। अपने दैनिक आहार में तुलसी की पत्तियों का यथेष्ट उपयोग करना चाहिए। ईश्वर से युक्त होने के कारण तुलसी की पत्तियाँ बैक्टीरिया का नाश करती हैं।

जिस प्रकार आजकल सब्जियों में छौंक दी जाती है, उसी प्रकार प्राचीन युग में तुलसी की पत्तियों का रस निकालकर उससे छौंक दिया जाता था।

तुलसी की महिमा

‘जिस घर हो तुलसी औ गाय, उस घर रोग कभी न जाय।’

संसार में जितनी भी वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, तुलसी का पौधा उन तमाम पौधों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पौधा है। धार्मिक दृष्टि से भी और गुणों की दृष्टि से भी। यदि कार्तिक मास में प्रातःकाल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाय तो वर्षभर मनुष्य रोगों से मुक्त रहता है।

कभी आपने अमृत पिया है—
अगर आप मंदिर जाते हैं तो आपने जरूर अमृत पिया होगा। मंदिरों में आरती के बाद जो चरणामृत पिलाया जाता है, उसमें एक साथ पाँच अमृत मिले होते हैं—दूध, दही, घृत, शहद, शक्कर और तुलसीदल। हमारे बुद्धिमान ऋषि-मुनियों ने अमृतपान की यह परम्परा सम्भवतः इसीलिए बनायी होगी कि सभी को ये पाँचों अमृत आसानी से मिल सकें और हर कोई इसे भगवत्प्रसाद समझकर ग्रहण करे, ताकि सभी को भौतिक तथा आध्यात्मिक लाभ मिल जाय।राम को जन-जन तक पहुंचाने वाले तुलसीदास

तुलसी विद्युत् की अवरोधक है—
तुलसी विद्युत्-शक्ति की अवरोधक मानी जाती है। इसीलिए तुलसी की लकड़ी से बनी माला, गजरा, पाजेब और कड़ा पहनने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है; क्योंकि इससे विद्युत् तरंगें निकलकर रक्तसंचार में रुकावट नहीं आने देतीं।

तुलसी के पर्यावरणीय गुण—
तुलसी की गन्ध नथुनों और श्वास की नलिकाओं में संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायक होती है।

 

तुलसी कब न तोड़ें

संक्रमेषु चतुर्दश्यां द्वादश्यां पातवस्यु।
तुलसी न हरेत् संध्याभ्यां राहुकाले ॥
नष्टे सूर्येन्द्रग्रहणे प्रसूतिमरणे तथा।
द्वादश्यां तुलसीपत्रं त्यजेद् यो नरः ॥
अकालं तुलसीपत्रं छेदयन्ति स्त्रियो नराः।
पञ्चमे ब्रह्महत्यायां समानं पापमाप्नुयात् ॥

(आनन्दरामायण, राजकाण्ड २१।४४–४५)

 

मेषादि संक्रान्तियों के दिन, चतुर्दशी, द्वादशी, पातवर्ष, दोनों संध्याकालों, शुक्रवार, मंगलवार, अपराह्नकाल,
सूर्य एवं चन्द्रग्रहण, जन्माशौच तथा मरणाशौच में जो तुलसी तोड़ते हैं, वे मानो भगवान के सिर का ही छेदन करते हैं।
जो मनुष्य द्वादशी तिथि को तुलसीपत्र और कार्तिक मास में आँवलेपत्र तोड़ता है, वह (मरने के बाद) अत्यन्त गहन नरकों में जाता है।
जो स्त्री अथवा पुरुष वर्जित समय में तुलसी का एक भी पत्ता तोड़ते हैं, उस पाप को विद्वानों ने ब्रह्महत्या के पाप के समान बताया है।

 

तुलसीदल तोड़ने का मन्त्र—

तुलस्युमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया।
चिन्मये केशवायार्थं वरदा भव शोभने ॥
त्वददर्शसम्भवः पत्रैः पूजयामि यथा हरिम्।
तथा कुरु पवित्राणि कलौ मलविनाशिनि ॥

(पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ६२।२२–२३)

 

हे तुलसी माता! तुम अमृत से उत्पन्न हो और केशव को सदा ही प्रिय हो।
कल्याणी! मैं भगवान की पूजा के लिये तुम्हारे पत्तों को चुनता हूँ।
तुम मेरे लिये वरदायिनी बनो। तुम्हारे श्रीअंगों से उत्पन्न होने वाले पत्रों और मंजरीयों द्वारा मैं सदा ही श्रीहरि का पूजन कर सकूँ—ऐसा उपाय करो।
पवित्रांगि तुलसी! तुम कलिमल का नाश करने वाली हो।

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