तेजस्वी पर लालू का भरोसा

राजनीति में यदि कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता तो खून के रिश्तों पर भी पूरा भरोसा नहीं किया जाता है। बिहार में लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर एक बार फिर 2001 की कहानी दोहरा दी है। चारा घोटाला के मामले में लालू यादव जेल चले गये थे। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बैठा दिया था लेकिन पार्टी की कमान अपने भरोसेमंद रंजन यादव को सौंप दी थी। रंजन यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। लालू यादव जेल के अंदर रहते भी सरकार और संगठन पर निगाह रखे हुए थे। लालू को पता चला कि पार्टी की कमान रंजन यादव अपने हाथ में लेना चाहते हैं और विधायकों की बैठक बुलाकर कोई खेला कर सकते हैं। इतनी जानकारी मिलते ही लालू यादव ने 2001 में अचानक रंजन यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया था। इस प्रकार सरकार और संगठन पर लालू यादव ने पुख्ता नियंत्रण बनाये रखा था। आज भी लालू इसी सिद्धांत पर चल रहे हैं। इसलिए बेटे पर भी पूरा भरोसा नहीं जताया और तेजस्वी को 25 जनवरी को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बनाया है।
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को पार्टी और सत्ता पर मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता है और अब उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। राजद की राजनीति की दृष्टि से देखिए तो वर्तमान में तेजस्वी यादव राजद का सबसे बड़ा चेहरा हैं। वे बिहार विधानसभा नेता प्रतिपक्ष हैं और इससे पहले वह बिहार के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बिहार में सरकार चला चुके हैं और पार्टी का जनाधार उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। इसके बावजूद उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं, बल्कि कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। साफ है कि राजद की वास्तविक (आधिकारिक) कमान अभी भी औपचारिक रूप से लालू प्रसाद यादव के पास है। राजनीति के जानकार 2001 का एक वाकया सुनाते हैं जब लालू यादव को अपनी गलती का अनुभव हुआ और उन्होंने तत्काल भूल सुधार किया था। दरअसल, बहुत कम लोग जानते हैं कि वर्ष 2001 में एक ऐसा वक्त भी आया था, जब जेल में रहते हुए लिया गया उनका एक फैसला राजद के लिए बड़ा संकट बन गया। यह किस्सा है डॉ. रंजन प्रसाद यादव से जुड़ा हुआ जिन्हें लालू यादव ने राजद का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था और फिर कुछ ही महीनों में उनको खुद हटाना पड़ा था। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना लालू यादव का एक संतुलित कदम है। इससे संगठन में उनका कद तो बढ़ा है पर सत्ता का पूरा नियंत्रण एक हाथ में नहीं गया। बिहार में चारा घोटाला मामला 1996 से चल रहा था। लालू प्रसाद यादव को अलग-अलग मामलों में जेल और जमानत के दौर से गुजरना पड़ा। साल 2000-2001 के बीच एक समय ऐसा आया जब लालू जेल में थे और बिहार की सत्ता राबड़ी देवी के हाथ में थी लेकिन असली नियंत्रण लालू के पास ही था। जेल से ही वे सरकार और पार्टी दोनों को निर्देश देते थे। लालू यादव यह जानते तो थे कि सत्ता का विकेंद्रीकरण उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन उनके सामने विकल्प नहीं था। ऐसे भी छात्र राजनीति के दिनों से ही डॉ रंजन यादव पर वह भरोसा करते रहे और रंजन यादव भी उनके विश्वसनीय बने रहे थे। इसी दौर में लालू ने रंजन प्रसाद यादव को राष्ट्रीय जनता दल का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। डॉ. रंजन यादव कोई साधारण नेता नहीं थे। वे पटना यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुके थे और छात्र राजनीति के समय से ही लालू यादव के करीबी सहयोगी और कई मामलों में मार्गदर्शक माने जाते थे। वर्ष 1990 के दशक में उन्हें सरकार के भीतर एक तरह से ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था जो पर्दे के पीछे फैसले करवाते थे। उस दौर में लालू यादव को भरोसा था कि रंजन जेल के बाहर पार्टी को संभाल लेंगे। बिहार की राजनीति के जानकार बताते हैं कि कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही रंजन यादव की राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई थी। उन्होंने विधायक दल की बैठक बुलाने की तैयारी शुरू कर दी। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री पद पर राबड़ी देवी थीं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि डॉ रंजन यादव की कोशिश थी कि सत्ता की असली कमान अपने हाथ में ली जाए। यह बात धीरे-धीरे लालू यादव तक पहुंचने लगी। राजनीतिक गलियारों में तब यही चर्चा थी कि इस खबर को जानने के बाद लालू यादव की टेंशन बढ़ने लगी थी। यह मामला सार्वजनिक तौर पर लोगों ने तब जाना जब राजद के वरिष्ठ नेता और लालू यादव के करीबी शिवानंद तिवारी ने बाद के दौर में इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तब उन्होंने बताया था कि लालू यादव ने उनसे जेल से पूछा था कि क्या रंजन यादव विधायक दल की बैठक बुला सकते हैं। इस पर शिवानंद तिवारी ने जवाब दिया कि हां, यह उनके अधिकार में आता है। बस यही जवाब लालू यादव के लिए खतरे की घंटी बन गया और वह सतर्क हो गए। संभावित खतरे को भी लालू यादव खत्म कर देना चाहते थे और इसी कड़ी में उन्होंने बड़ा फैसला ले लिया। अप्रैल 2001 में लालू प्रसाद यादव ने अचानक डॉ. रंजन यादव को राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटा दिया।
अब 25 जनवरी को पटना के होटल मौर्या में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की हाई-प्रोफाइल बैठक में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए तेजस्वी यादव को सर्वसम्मति से आरजेडी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की गरिमामयी उपस्थिति में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस प्रस्ताव पर अपनी अंतिम मुहर लगाई। बैठक के दौरान आरजेडी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने तेजस्वी यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का औपचारिक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा के बाद वहां मौजूद सभी डेलीगेट्स और वरिष्ठ नेताओं ने एकमत होकर इसका समर्थन किया। जैसे ही नियुक्ति की घोषणा हुई, पूरा सभागार नारों से गूंज उठा। मंच पर लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, राज्यसभा सांसद मीसा भारती और पार्टी के कई दिग्गज नेता मौजूद रहे, जिन्होंने इस फैसले का स्वागत किया। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लालू प्रसाद यादव के गिरते स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र को देखते हुए यह फैसला लंबे समय से अपेक्षित था। अब इस औपचारिक घोषणा के बाद पार्टी की पूरी कमान तकनीकी और व्यावहारिक रूप से तेजस्वी यादव के हाथों में आ गई है।
हालांकि राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक से ठीक पहले लालू प्रसाद यादव की पुत्री रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक बेहद आक्रामक और भावुक पोस्ट साझा कर सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। रोहिणी ने बिना नाम लिए पार्टी की कमान संभाल रहे लोगों और उनके इर्द-गिर्द मौजूद सलाहकारों पर सीधा हमला बोला है। रोहिणी का सबसे तीखा हमला नेतृत्व (तेजस्वी यादव की ओर इशारा) की कार्यशैली पर रहा। उन्होंने कहा कि नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने वालों को सवालों से भागने और भ्रम फैलाने के बजाय अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। रोहिणी ने लिखा कि अगर नेतृत्व चुप्पी साधता है, तो उस पर साजिश करने वाले गिरोह के साथ मिलीभगत का आरोप स्वतः ही साबित होता है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



